Satire

व्यंग्य – गांव का टशन

“कुछ तो तेरे मौसम ही मुझे रास कम आये ,

और कुछ मेरी मिट्टी में  बगावत भी बहुत थी ”

 ये शेर पढ़ते हुए तबियत की नासाजी की वजह से दिल्ली को मैंने अलविदा कहा।

दिल्ली के रेलवे स्टेशन से ट्रेन में सीट न मिलने की वजह आनंद विहार से यूपी रोडवेज की बस पकड़ी और फिर बस अड्डे से बस के बाहर आते ही “वेलकम टू यूपी”।

  ।मैं मन ही मन दिल्ली में बुदबुदाता “हे भगवान, ये दिल्ली जो कॉलोनी और पुरी के उपनामों से भरी हुई थी। वहाँ पर मेरे हिस्से में गांव का ही निवास आना था”। जिस गांव शब्द से ही मुझे इतनी चिढ़ थी आज मैं उसी गाँव की पनाह में था। गांव, गंवईपन, ग्रामीण और देहातीपन से मुझे एक खास किस्म की खीझ रहा करती थी।

वही गांव जो मेरे लिए शर्म था मगर गांव के अपने कुनबे के लोगों के लिये अब मैं गर्व था। गांव में मुझे मिले रामजस काका जो मेरे ही समवय थे मगर रिश्ते में काका लगते थे। मेरे स्वास्थ्य की समस्या के बारे में जानकर उन्होंने मुझे तसल्ली दी कि शुद्ध हवा, पानी ,भोजन का प्रबंध तो वह कर देंगे मगर गांव की पॉलिटिक्स और परसेप्शन में अगर मैं उलझा तो मैं शहरों के रास्तों से ज्यादा कन्फ्यूज हो जाऊंगा। गांव का अपना रंग-ढंग और चलन और एक खास किस्म का टशन होता है। आज के गांव न तो यश चोपड़ा की फिल्मों की तरह सुंदर और हरे-भरे हैं और न ही मैथली शरण गुप्त के “अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है ” की तर्ज पर सहज-सरल रह गए हैं। गांव में खूंटा और नाली के विवाद के मुकदमे ढोते -ढोते दो पीढियां गश्त हो जाती हैं। गांव में सब कुछ सहज -सरल नहीं होता यहाँ की बौद्धिक जुगाली “लुटियंस जोन” के स्तर की होती है । जिस तरह वहाँ एक ड्रिंक पर सरकार बनाने या गिराने के दावे किए जाते हैं वैसे ही गाँव में जो  बंदा कभी जनपद मुख्यालय से बाहर नहीं गया हो वह देश के किसी भी सेलेब्रिटी और वीआईपी से अपनी अंतरंगता के किस्से सुना सकता है । मैंने उनकी बातों को सजगता से सुना और गांठ बांध ली कि किसी भी घटना या वक्तव्य पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देनी है ।न ही अच्छी और न ही बुरी बस तटस्थ रहना है ।

अलसुबह मुझे रामजस काका अपने साथ घुमाने निकले। उन्होंने कहा “गाँव में कोई मेरा नाम नहीं लेता। बहुत सारे लोग मुझे रामजस के शार्ट फार्म में आरजे बुलाते हैं।कुछ लोग प्रधान जी भी कहते हैं। आओ तुम्हे गाँव के कुछ रंग-ढंग और परशेप्शन बताता हूँ ” ।

मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखा तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा – 

“गांव में अगर तुम्हारे जैसे महानगर से आया हुआ आदमी महीने भर से ऊपर ठहर जाए तो गांव वाले यही समझेंगे कि इस आदमी की नौकरी चली गई है।भले ही तुम्हारे खर्चों में उन्हें कोई कटौती नजर न आये मगर वह तुम्हे बेरोजगार ही समझेंगे ”।

अपने को लेकर मैं कुछ जवाब दे पाता इससे पहले उन्होंने आगे कहा –

“और अगर रोज सुबह दौड़ने निकल जाओ तो गांव के लोग मान जाएंगे कि इस बंदे को शुगर हो गया है । यहाँ सुबह की दौड़ को फिटनेस से नहीं बल्कि शुगर से जोड़ा जाता है “।

अब तो मुझे भी उनकी गंवई बातों में दिलचस्पी आने लगी। मुझे मुस्कराते हुए देखकर उन्होंने उत्साह से आगे कहा –

“ अगर कम उम्र में ही ठीक- ठाक कमा कर औऱ लौट कर गांव में पर्याप्त  खर्चा करने वाले इंसान के बारे में   आधा गाँव मान लेता है कि शहर में जरूर यह आदमी दो नंबरी काम करता होगा।और अगर उस इंसान ने जल्दी शादी कर ली तो गांव में यह आम धारणा बन जाती है कि उस शख्स का बाहर कुछ इंटरकास्ट चक्कर चल रहा होगा इसीलिए घर वाले फटाफट शादी कर दिए”।

यह बात भी मुझे काफी मजेदार लगी।

रामजस काका ने मुस्करा कर कहा “ अगर लड़के की नौकरी लगी है और लड़का किसी वजह से  शादी में देर कर रहा है तो लोगों का मेन आक्षेप यह रहेगा कि या तो लड़के के घर में  बरम है या तो लड़का मांगलिक है। लोग बाग किसी गृहदोष या हैसियत से ज्यादा दहेज मांगने की बातें बनाने लगते हैं”।

मुझे उनकी बातों में काफी लुत्फ आया ।

रामजस काका ने उनकी बातों से मुझे मिले लुत्फ को भांपकर आगे कहा –

“और अगर कोई शादी बिना दहेज़ का कर लिये तो ज्यादातर गांव में कहेंगे कि लड़की प्रेगनेंट थी पहले से ही इज़्ज़त बचाने के चक्कर में लव मैरिज को अरेंज मैरिज में कन्वर्ट कर दिये लोग”।

रामजस काका की इस बात से मुझे काफी मजा आया । गांव की पहली सुबह में ही सतत मुस्कान मेरे अधरों पर खेलने लगी थी।

रामजस काका ने कहा 

“गांव के युवकों के बारे में दो चार मजेदार बातें और सुनो जिनसे वो दो -चार होते हैं ।

पहला अगर कोई युवक खेत के तरफ झाँकने नही जाता तो गांव में लोग कहते हैं कि अभी बाप का पैसा है तभी उधर खेत -वेत झांकने नहीं जाता।दूसरे कुछ बरस बाद जब गांव वालों के तानों से आजिज होकर वही लड़का खेती -किसानी में रुचि लेने लगता है तब लोग कहते हैं कि देखा धीरे -धीरे चर्बी उतरने लगा है”।

यह विरोधाभास सुनकर मेरी हंसी छूट गई।

रामजस काका ने भी हंसते हुए कहा –

“ज्यादा हंसो मत । तुम जैसे शहर से गांव लौटे लोगों के बारे में भी आमतौर गाँव के लोग क्या समझते हैं ?यह भी सुनो ध्यान से ।अगर महानगर से मोटे होकर गांव आये तो गांव में यह आम राय होती है कि जरूर यह बंदा शहर में बीयर पीता होगा। और कहीं बंदा दुबला  होकर गांव आये तो मान लेते हैं जरूर बंदा शहर में गांजा- चिलम पीता रहा होगा तभी उसे टीबी हो गया है और अब अपनी सेहत सुधारने गांव आया है।

मुझे अपनी दुबली-पतली सेहत का ख्याल आया तो थोड़ा अजीब भी लगा कि गाँव में लोग मुझे चिलमची या टीबी का मरीज समझेंगे।

रामजस काका ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा “और सुनो, अगर बाल बढ़ा के गांव लौटो तो गांव में काफी सारे लोगों को लगता है यह बंदा किसी ड्रामा कंपनी में नचनिया का काम करता है। हालांकि अपनी दरवाजे पर होने वाली नौटँकी नाच को भी गांव वाले आर्केस्ट्रा कहते हैं और वहीं दूसरा कोई किसी बड़े आर्केस्ट्रा में भी काम करे तो उसे नचनिया पुकारेंगे।कुल मिलाकर गाँव में बहुत मनोरंजन है। यहां कोई डिप्रेशन में नहीं आता और ये बतकहियां ही मनोचिकित्सक का काम करके मन की पीड़ा सोख लेती हैं”।

तब तक किसी ने उधर से कहा “गुड़ मॉर्निंग आरजे । हू इस दिस कूल ड्यूड विथ यू “ यह कहते हुए उन्होंने मेरी तरफ हैंडशेक के लिए हाथ बढ़ाया।

“पाँय लागी मास्टर जी ,यह घर का ही लड़का है कूल ड्यूड नहीं। आपके प्रिय शिष्य रामकिशोर का बेटा राम प्रकाश है।दिल्ली से हवा-पानी बदलने गांव आया है” कहते हुए रामजस काका ने मुझे उनके पैर छूने का इशारा किया ।

मैं उनके पैरों पर झुकने लगा तो उन्होंने मुझे बीच में रोकते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया और हंसते हुए कहा।

“हाथ मिलाओ यंग मैन । आई एम वेरी मॉडर्न। ये गांव का टशन है”।

उनकी बात सुनकर हम तीनों खिलखिलाकर हंसने लगे।

समाप्त 

कृते -दिलीप कुमार

कृते -दिलीप कुमार

दिलीप कुमार
स्थायी सम्पर्क
मॉलती कुंज कालोनी
आनन्द बाग, बलरामपुर
उत्तर प्रदेश 271201
मोबाइल 9956919354

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