व्यंग्य
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सैंया मेरे ऐबले
यह व्यंग्य एक आम भारतीय गृहस्थ जीवन की हल्की-फुल्की लेकिन सच्ची झलक पेश करता है, जहाँ सैंया जी की अतरंगी…
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खुश तो बड़े होंगे तुम
बरसात, व्यवस्था और रोज़मर्रा की विडंबनाओं पर डॉक्टर–साले के संवाद में बुना तीखा व्यंग्य।
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“सैयारा का तैयारा” (व्यंग्य)
आधुनिक रिश्तों की उलझनों को लेखक ने बड़े ही विनोदी ढंग से पेश किया है।
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व्यंग्य – गांव का टशन
“कुछ तो तेरे मौसम ही मुझे रास कम आये , और कुछ मेरी मिट्टी में बगावत भी बहुत थी ”…
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व्यंग्य – ससुराल गेंदा फूल
कलजुग की तीसरी नियामत ससुराल मानी गई थी। स्त्री-पुरूष के लिये ससुराल के अलग -अलग मायने हैं ।
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व्यंग्य – नॉट आउट @हंड्रेड
“ख्वाबों, बागों, और नवाबों के शहर लखनऊ में आपका स्वागत है” यही वो इश्तहार है जो उन लोगों ने देेखा…
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व्यंग्य – प्रयोगशाला से प्रेमपत्र
तो देवियों और सज्जनों। मसला -ए-खास यह है कि हिंदी माध्यम से पढ़े विद्यार्थी को विज्ञान संकाय में साथ पढ़…
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व्यंग्य- ये कैसे हुआ
इतना सस्ता प्याज चलते चलते इतना महंगा होने की गुत्थी कोई नहीं सुलझा पा रहा है
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व्यंग्य – और क्या चाहिए
पागल हो क्या तुम ? मैं लड़के से शादी कर रही हूं ये क्या कम है । और क्या चाहिए…
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