योर सिक्स, माई नाईन – व्यंग्य
— दिलीप कुमार
तब के अभिनेता और अब के साबुन-मंजन के सबसे बड़े विक्रय प्रतिनिधि अमिताभ बच्चन की बहुत साल पहले एक फिल्म आई थी, जिसका नाम था “सुहाग”। इस फिल्म का लंबू हीरो अपनी कोल्हापुरी चप्पल सामने वाले को उल्टी दिखाता है और फिर पूछता है कि “ये चप्पल कितने नंबर की है?” सामने वाला उल्टी चप्पल को देखकर कहता है कि 6 नंबर की है।

यह सुनते ही फिल्मी नायक चप्पल को सीधा करके दिखाता है और कहता है कि चप्पल 6 नहीं, बल्कि 9 नंबर की है। यह कहते हुए नायक सामने वाले को चप्पल के नंबरों के खेल में बेवकूफ बनाते हुए उसे चप्पलों से पीटने लगता है। यानी किसी का सिक्स, किसी का नाईन भी हो सकता है।
यही हाल भारत में हाल ही में हुए एआई समिट में हुआ। दुनिया भर की निगाहें इस समिट पर लगी हुई थीं। और इस समिट में भारतीय घरों में बोली जाने वाली कुछ कहावतें चरितार्थ हो गईं। जिसमें पहली बात तो ये थी कि “नकल के लिए भी अक्ल” होनी चाहिए।
क्योंकि समिट में “ओरियन” नामक जिस कृत्रिम मेधा वाले डॉग को एक निजी यूनिवर्सिटी की प्रतिनिधि ने अपने संस्थान का “प्रोडक्ट” बताकर हवा-हवाई दावे किए, उस पर तब भी चीन की कंपनी का लेबल लगा हुआ था, जिसे मैडम शायद हटाना भूल गई थीं।
इसी बात पर थुक्का-फजीहत शुरू हुई। विवाद बढ़ा तो उस पर चीन वालों की नजर पड़ गई। चीन की कंपनियां इस बात से बहुत नाराज हो गईं कि दुनिया भर की कंपनियों से थीम चुराकर और उसकी नए सिरे से पैकेजिंग करके दुनिया को अपना प्रोडक्ट बताकर बेच देते हैं चीनी लोग।

इसीलिए चीनी माल पर गारंटी की कोई अवधि नहीं होती, क्योंकि उन्हें खुद नहीं पता होता। काहे कि दूसरे के बनाए माल को अपना बताकर बेचेंगे तो उन्हें कैसे पता होगा कि ये माल कब तक चलेगा?
इसीलिए चाइनीज माल के बारे में कहा जाता है कि “चल गया तो चाँद तक, नहीं तो फिर शाम तक।”
सो, दूसरों के माल को अपना बनाकर बेचने वाले चीन के लोगों को जब पता लगा कि भारत में हो रही एआई समिट में उनके माल को किसी ने अपना विकसित प्रोडक्ट कहा है, तो उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया। क्योंकि ये तो “चोर पे मोर” नामक कहावत चरितार्थ हो गई।
अब जिस निजी यूनिवर्सिटी ने यह किया था, उसे “बड़े बेआबरू” करके भारत मंडपम से निकाला गया, बिजली काटकर। लोग तो इंटरनेट पर यहां तक कहते हैं कि इस संस्थान में बच्चों को पढ़ाने पर माता-पिता के कपड़े तक बिक सकते हैं, क्योंकि इतना ज्यादा फीस चार्ज करते हैं।
350 करोड़ रुपये एआई में निवेश करने का दावा करने वाली यूनिवर्सिटी डेढ़-दो लाख के चीनी रोबोट कुत्ते को अपना बता रही है। उसके बारे में कुछ मुख्तलिफ मालूमात हैं।
उस देश में, जहां के 97 प्रतिशत परिवारों की मासिक आय पचास हजार रुपये से कम है, तो इससे सुंदर और सस्ती यूनिवर्सिटी तो इस देश में नहीं हो सकती।
काहे कि ये मात्र 1,64,000 रुपये में इंजीनियर बना रहे हैं।
बस 20,000 रुपये परीक्षा फीस और देनी पड़ती है।
और सावधानी शुल्क के नाम पर 20,000 रुपये भी लेते हैं। चिंता मत करें, खाली वन-टाइम में देना है।
और आई-कार्ड के 1,000 रुपये भी देने हैं।
और अगर हॉस्टल में रह रहे हो तो 1,71,000 रुपये अलग से देने हैं। सनद रहे कि ये सबसे बेसिक दर्जे का चार्ज है। अच्छी सुविधा के अच्छे चार्ज देने होंगे।
एक कैंपस से दूसरे कैंपस तक जाने के लिए बस की सेवा उपलब्ध है, पर ज्यादा नहीं, उसके सिर्फ 10,000 रुपये अलग से देने पड़ते हैं।
और ये सब एक साल का है, जबकि इंजीनियरिंग के लिए आपको 4 साल लगने हैं।
यानी आपको फीस देने के समय सिर्फ सिक्स के आकार की फीस बताई जाएगी, मगर एक बार यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेने के बाद आपको फीस नाईन के आकार की देनी पड़ेगी।
यानी अब यूनिवर्सिटी का ध्येय वाक्य “Your Six Can Be My Nine” लोगों को समझ में आया कि क्या कहते हैं और क्या देना है?
यानी मात्र 14,65,600 रुपये की इनवेस्टमेंट और आपका होनहार बच्चा यूनिवर्सिटी के शानदार कैंपस में 2 लाख के चीनी कुत्ते के साथ खेलने का मौका पा सकता है! है ना ये दिलफरेब ऑफर?
ज्ञात हो कि हॉस्टल फीस में मेस का भोजन के साथ-साथ जिम, स्क्वैश, फुटबॉल, टेबल टेनिस, लूडो, गिल्ली-डंडा, कंचे, छुपन-छुपाई, पुगम-पुगाई, फूसबॉल, बास्केटबॉल, रोबोट की बॉल आदि खेलने की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।
इसके सालाना जलसे में फिल्म स्टार और यूट्यूबर आते हैं। अब बोलो! अब तो लोगे ना एडमिशन।
इतना ही नहीं, और सुनो…

संस्थान हर बच्चे को 100% जॉब प्लेसमेंट दे रहा है। अब भी मन नहीं माना हो तो बता दूं कि प्लेसमेंट होगा जरूर, भले ही आपको बीटेक करके कैफे कॉफी डे में नौकरी दिला दें, पर प्लेसमेंट की पक्की गारंटी है।
कैंपस में फिल्म प्रमोशन भी किया जाता है। अक्षय कुमार, रणबीर कपूर और इमरान हाशमी भी संस्थान में आकर ठुमके मारकर गए हैं। मल्लब, आगे चलकर बच्चा फिल्मों में जाना चाहे तो यहां से रास्ते खुल सकते हैं।
कितनी अच्छी बात है कि 50-60% मार्क्स पर भी टॉप के कोर्स में एडमिशन दे रहे हैं। बताइए, इतनी दयालु यूनिवर्सिटी मिलेगी कहीं?
अब तो कभी-कभार ऐसा लगता है कि स्टूडेंट ऑफ द ईयर के टाइगर, आलिया और वरुण भी इसी यूनिवर्सिटी से पास आउट हुए होंगे।
इतनी सब इंक्वायरी के बाद जब सोशल मीडिया पर निजी यूनिवर्सिटी की लानत-मलानत कायदे से हुई, तब निजी यूनिवर्सिटी की तरफ से एक चुटीली तंज भरी पोस्ट की गई कि—
“एक बार एक आदमी मुझे अंबुजा सीमेंट की कमियां बता रहा था, बाद में पता चला कि वो बांगर सीमेंट का दलाल है। जो इस संस्थान की बुराई करते नहीं थक रहे हैं, देखना पक्का वो लोग एक कमरे वाली यूनिवर्सिटी के डिप्लोमा-धारी निकलेंगे।”
यह पढ़कर निजी यूनिवर्सिटी के समर्थक एक तुकबंद-प्रेमी कवि ने फेसबुक पर यूनिवर्सिटी के समर्थन में एक कविता पोस्ट की—
“हावर्ड के बच्चे सुधारे ये संस्थान,
ऑक्सफोर्ड को भी पछाड़े संस्थान,
डीयू-जेएनयू में हो सकता है भेदभाव,
मगर सबको अपना बना ले ये संस्थान।”
जिस-जिस के खाते में 15 लाख आ चुके हैं, कम से कम वो लोग तो कंजूसी न करें। आज ही 14 लाख 65 हजार रुपये देकर अपने या अपने बच्चों की इस नामी संस्थान में सीट कन्फर्म करें।
नेपथ्य में कोई “बिग बॉस” का पुराना एपिसोड देख रहा है, जिसमें आवाज आ रही है—
“त्वाडा कुत्ता टॉमी, साडा कुत्ता, कुत्ता…”
समाप्त
— दिलीप कुमार





