सैंया मेरे ऐबले

राजभाषा हिंदी सम्मान प्रतियोगिता2024 विजेता व्यंग्य
शीर्षक थोड़ा अजीब है न…। जिस देश में अपने सैंया को भगवान का रूप मानकर उनका गुणगान करने का ही रिवाज हो, तो ऐसा सोचना भी गुनाह जैसा है। लेकिन… अब क्या करूं, रहा ही नहीं जा रहा… मौका मिला है तो दिल की भड़ास निकाल ही लेती हूं…। सुनकर आप भी मान जाओगे कि मेरे सैंया सचमुच ही हैं… एक नंबर के ऐबले।
अच्छा सुनो… आज की ही बात सुनाती हूं। कितनी ठंड थी सुबह। रजाई से उंगली भी बाहर निकलने को तैयार नहीं थी। अलसाते-अलसाते आठ बज गए, पर रजाई छोड़ने की हिम्मत नहीं हो रही थी। अचानक आइडिया आया… क्यों न जोमैटो से गर्मागर्म नाश्ता ऑर्डर कर लूं… कौन ठंड में हाथ-पैर ठंडे करे।
अभी हाथ बढ़ाकर फोन उठाने ही वाली थी कि बगल में से सैंया जी ने गले में हाथ डालकर स्वर में मिश्री घोलते हुए कहा—
“मीनू डियर, नाश्ता-वास्ता कराने का इरादा नहीं है क्या? अच्छा बताओ… कितना समय हो गया तुम्हें अपने हाथ से स्वादिष्ट समोसे नहीं खिलाए… आज तो सचमुच गरमा-गरम समोसे खाने का बहुत क्रेविंग हो रही है। वो क्या है न मीनू… जो स्वाद तुम्हारे बनाए समोसे के मसाले में है, मंगलू हलवाई के हाथ में कहां… और हां… चाय में अदरक थोड़ा तेज कर देना… ठंड में मजा ही आ जाएगा।”
अब बोलो, क्या कहूं इन्हें। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि इन्हें समोसे बहुत पसंद हैं। अभी गए महीने दीदी घर आईं तो मैंने समोसे बनाए, मस्त खट्टी-मीठी चटनी के साथ। जीजाजी तो उंगलियां चाटते रह गए। पर सैंया जी के सामने जैसे ही प्लेट रखी, छूटते ही बोले—
“अरे मीनू, समोसे कहां खाता हूं मैं… मूड नहीं है फ्राइड खाने का। खमण बना दोगी क्या थोड़ा सा?”
अब बोलो, ऐबला न कहूं तो क्या कहूं इन्हें। ये आज का नहीं, रोज का किस्सा है। कितना ही सोचकर उनकी पसंद का खाना बनाओ… उस दिन तो पक्का नहीं खाएंगे। कुछ अतरंगी चीज ही मांगेंगे, जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की होगी और जिसे उस समय बनाने का साधन भी न हो। और हां… जिस दिन कोई सब्जी कम बनी होगी, उस दिन वो बहुत ही स्वादिष्ट बनती है… भले ही पसंद की लिस्ट में न हो तब भी।
अभी उसी दिन घर पर अचानक मेहमान आ जाएं और मेरी तबियत कुछ नासाज थी। वैसे हम औरतों की छोटी-मोटी बीमारी कहां मायने रखती है। मैं थोड़ा हल्का-फुल्का बनाकर पल्ला झाड़ने की कोशिश में थी, लेकिन कहां…
सैंया जी अंदर आकर फरमाते हैं—
“मीनू, ज्यादा परेशान मत हो। ऐसा करो, बस दाल, चावल, रोटी, एक सब्जी, रायता, थोड़ा सा हलवा… या नहीं बना सको तो मीठे चावल कर देना और बस एक घान के भजिए निकाल लेना… बस इतना ही काफी होगा।”

अब बताओ, क्या बाकी रह गया…। और उस पर भी कुछ मदद करने की उम्मीद तो दूर, अंदर किचन में झांकने भी नहीं आएंगे। गोया मेहमान कहीं जोरू का गुलाम न समझ लें।
बात सिर्फ खाने तक ही नहीं है। कपड़ों में भी कुछ ऐसा ही किस्सा है। रोज सुबह से जो भी कपड़े निकालकर रखो, कुछ न कुछ नखरे निकालकर उन्हें हटा देंगे और कुछ अलग ही पहनकर चल देंगे। अलमारी में एक ही रंग की दस-दस कमीजें हैं, लेकिन जिस समय जो पहनना है, वही पहनना है। उसी के जैसी दूसरी नहीं पहन सकते। और हां… जो कपड़े धुले नहीं हों, उन्हें पहनने की विशेष इच्छा होती है उस दिन।
मूड के भी ऐबले हैं सैंया जी। रोज ऑफिस जाते हैं। कभी जल्दी जाना होता है, कभी देर से। जल्दी यानी 9 बजे… देर यानी सवा नौ से ग्यारह बजे तक।
“सुनो मीनू, आज मुझे जल्दी ऑफिस जाना है…”
“आज मुझे देर से जाना है…”
किस समय ये देर जल्दी में बदल जाती है, भगवान भी नहीं जान सकते। मजाल कि आपको सही समय बता दें— आज इतने बजे जाऊंगा। हां, अगर आपको खाना देने में देर हो गई तो उस दिन अचानक से जल्दी चल देंगे।
बात यहीं तक नहीं है। मेरे सैंया जी की हर बात इतनी ऐबली है कि क्या ही बताऊं। जैसे… मुझे मायके जाना हो तो सैंया जी की तबियत अचानक खराब हो जाती है और तभी ठीक होती है जब जाने वाली बस या ट्रेन निकल जाए या रिजर्वेशन कैंसिल हो जाए।
ऐबलेपन की कहानियां कहां तक सुनाऊं। घर पर सब लोग इकट्ठे बैठकर मौज-मस्ती कर रहे हों या टीवी पर सब साथ बैठकर बढ़िया फिल्म का मजा ले रहे हों, तभी सैंया जी को चाय की क्रेविंग होने लगेगी… या कुछ अतरंगी चीज खाने की इच्छा हो जाएगी… या इतना जरूरी काम याद आ जाएगा कि आपको मन मारकर उठना ही पड़ेगा।
अब कितने किस्से सुनाऊं। सैंया जी के ऐबलेपन के किस्से अनंत हैं… जैसे हरि अनंत, हरि कथा अनंता। पर शब्द सीमा है न, सो यहीं विराम। फिर कभी… जिस दिन मौका मिला, दिल खोलकर सुनाऊंगी।

पर अंत में एक बात जरूर कहूंगी कि मेरे सैंया जी लाखों में एक हैं। चिराग लेकर ढूंढने पर भी उनके जैसा दूसरा नहीं मिलेगा। और हां, उनके इस ऐबलेपन से भी मुझे प्यार है।
राजभाषा हिंदी सम्मान प्रतियोगिता2024
व्यंग्य
व्यंग्य रचना : सैंया मेरे ऐबले
लेखिका : अनुपमा जैन, इंदौर




