यदुनाथ सिंह राजपूत: भारतीय सेना का शूरवीर

“कहीं खेतों में फसलें लहरा रही थीं
और मिट्टी की खुशबू महका रही थी।
कहीं हवाएं वासंती गीत गा रही थीं
और मन में नई उमंगें जगा रही थीं।
तो वहीं देश के इस शूरवीर को
अपनी गोद में भारत माता बुला रही थी।”
खेतों की लहराती हुई फसलें देखकर मन प्रफुल्लित हो जाता है। ये फसलें भले ही शब्दों का उद्गार नहीं कर सकतीं, परंतु इंसान के करीब रहकर उसे अपनापन जरूर देती हैं। खेतों की मिट्टी, मेड़ का किनारा और धरती की गोद से ऊपर आती कोंपली मिट्टी से स्नेह करना सिखाती हैं। जो इस मिट्टी से जुड़ जाता है, वह जीवनभर इसका ऋणी रहता है।
ऐसे ही हैं आज के हमारे व्यक्तित्व, जिनकी जीवनी हम आज पढ़ रहे हैं।
जी हाँ, भारतीय सेना में ब्रिगेडियर के पद पर सेवा देने वाले श्री यदुनाथ सिंह राजपूत की बात कर रहे हैं।
जन्म स्थान और शिक्षा – दीक्षा
ब्रिगेडियर यदुनाथ सिंह एम.वी.सी. भारतीय सेना में 19वीं पैदल ब्रिगेड के कमान अधिकारी थे। उनका जन्म 21 नवंबर, 1916 को खजूरी, शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनके पिता का नाम श्री बीरबल सिंह और माता का नाम श्रीमती यमुना कंवर था। इस किसान पिता के पुत्र के मन में देशभक्ति का सैलाब था।
एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने अपना संपूर्ण जीवन भारत भूमि की सेवा में व्यतीत किया। बचपन से मेधावी रहे श्री यदुनाथ सिंह जी प्रखर बुद्धि के छात्र थे। खेतों में काम करने मात्र से परिवार का गुजारा मुश्किल हो रहा था, इसलिए उन्होंने अपनी शिक्षा को विराम देकर 1941 में ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती होने का निर्णय लिया। इस सेवा से उनकी आर्थिक जरूरतें पूरी हो रही थीं और देश की सेवा करने का अवसर भी मिल रहा था।
सेना में भर्ती
21 नवंबर, 1941 को यदुनाथ सिंह ने फौज में प्रवेश किया। उस समय वे मात्र 26 वर्ष के थे और उन्हें राजपूत रेजिमेंट में शामिल किया गया। जुलाई 1947 में उन्हें लांस नायक के पद पर पदोन्नति मिली।
6 जनवरी, 1948 को वे टैनधार में अपनी टुकड़ी की अगुवाई कर रहे थे। उस दिन नायक यदुनाथ सिंह मोर्चे पर केवल 9 लोगों की टुकड़ी के साथ डटे हुए थे, लेकिन उन्होंने अपनी टुकड़ी की जमावट ऐसी तैयार की कि हमलावरों को हार कर पीछे हटना पड़ा।

1947 का युद्ध
अक्टूबर 1947 में जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तानी हमलावरों द्वारा आक्रमण के बाद, भारतीय कैबिनेट की रक्षा समिति ने सेना के मुख्यालय को सैन्य कार्रवाई का निर्देश दिया। कई अभियानों में हमलावरों को रोकने के लिए 50वीं पैरा ब्रिगेड, जिसमें राजपूत रेजिमेंट भी शामिल थी, को नौशेरा को सुरक्षित रखने हेतु तैनात किया गया।
खराब मौसम ने इस कार्रवाई को चुनौतीपूर्ण बना दिया। 24 दिसंबर, 1947 को झांगर पर पाकिस्तानी सैनिकों ने कब्जा कर लिया। अगले महीने भारतीय सेना ने नौशेरा के उत्तर-पश्चिम में कई अभियान चलाए। टेंढर, जो नौशेरा के उत्तर में स्थित था, श्री सिंह की बटालियन की जिम्मेदारी थी।
6 फरवरी, 1948 की सुबह 6:40 बजे पाकिस्तानी सेना ने टेंढर पर हमला किया। श्री सिंह नौ जवानों की टुकड़ी के कमांडर थे। उन्होंने अपनी टुकड़ी के साथ लगातार तीन हमलों को विफल किया। तीसरे हमले के अंत तक चैकी पर तैनात 27 सैनिकों में से 24 मारे गए या गंभीर रूप से घायल हुए।
इस दौरान श्री सिंह का नेतृत्व “अनुकरणीय” माना गया। यदि उन्होंने दुश्मन को इतने समय तक रोक कर नहीं रखा होता, तो इन स्थानों पर पुनः कब्जा करना असंभव था।

वीरगति
यदुनाथ सिंह ने 31 वर्ष की आयु में 6 फरवरी, 1948 को वीरगति प्राप्त की।
सम्मान
भारत सरकार ने उनकी वीरता और अदम्य साहस के लिए 1950 में मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया।
कैफे सोशल मेगज़ीन ऐसे शूरवीरों के जज़्बे और हौसले को सादर वंदन करती है।
जय हिन्द, जय भारत




