महावीर की गाथा: हवलदार चूनाराम की वीरता

एक – एक सांस मैं लिखूँ वतन के नाम ।
जीवन मेरा सफल, जो आए वतन के काम ।।
आबाद रहे मेरा ये वतन और ये ज़मीं,
इसकी खुशियों पर हो जाऊँ मैं कुर्बान ।।
जी हाँ, आज हम जिस व्यक्तित्व के विषय में पढ़ने जा रहे हैं वो कुछ ऐसी ही सोच रखते हैं। आइए इनका जीवन परिचय पढ़ते नहीं बल्कि जीते हैं ……..
परिचय
हवलदार श्री चूनाराम जी फगेड़िया का जन्म ब्रिटिश भारत में 29 दिसंबर , 1923 को जो वर्तमान राजस्थान के सीकर जिले की लक्ष्मणगढ़ तहसील के डालमास की ढाणी गांव में श्री बीरूराम फगेड़िया एवं श्रीमती किसनी देवी के परिवार में हुआ था। बाल्यकाल से ही श्री चूनाराम जी फगेड़िया मल्लयुद्ध में रूचि रखते थे।
शिक्षा एवम् सेना में भर्ती
आरंभिक शिक्षा के पश्चात्
29 दिसंबर , 1940 को वह ब्रिटिश-भारतीय सेना की राजपुताना राइफल्स रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रारंभिक प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 2 राजरिफ बटालियन में राइफलमैन के पद पर नियुक्त किया गया था।
युद्ध के कारण एवम् परिणाम
स्वतंत्रता के पश्चात कश्मीर पर पाकिस्तान के कबाइली आक्रमण में भारतीय सेनाएं पुंछ-राजौरी की ओर बढ़ रही थी। कुछ पहाड़ियोंं पर शत्रुओं का अधिकार था और इन पहाड़ियों से राजौरी-थाना मंडी सड़क का अवलोकन आसानी से किया जा सकता था। शत्रु वहाँ से प्रभावी गोला वृष्टि एवम् बमबारी कर रहा था। 15 जून, 1948 को 2 राजपुताना राइफल्स की एक रिजर्व कंपनी को उन पहाड़ियों से दुश्मनों को खदेड़ने के आदेश दिए गए।
कंपनी के एक प्लाटून के कमांडर हवलदार श्री चूनाराम फगेडिया को पॉइंट 5460 से फायरिंग कर रही शत्रु की मशीनगन पोस्ट को शांत करने का कार्य दिया गया। उन्होंने बड़ी ही सुनियोजित योजना बनाई एवम् अपनी प्लाटून के दो सेक्शन के साथ आगे बढ़े। जब वे अपने लक्ष्य के निकट पहुँचे , तो पाकिस्तानियों ने उन पर हथगोले फेंके व अंधाधुंध गोलियाँ चलाईं, किंतु, यह विस्फोट भी निडर हवलदार चूनाराम का मार्ग नहीं रोक पाए।

भगवान श्री राम के जयकारे
विपत्ति के समय भगवान से बढ़कर कोई सहारा नज़र नहीं आता और इन संकटों का सामना चातुर्यता पूर्वक करने की क्षमता केवल ईश्वर ही दे सकता हैं। इसलिए उनका स्मरण हर संकट पर विजय प्राप्त कर लेता है। इसीलिए हवलदार श्री चूनाराम जी “राजा रामचंद्र की जय” ” राजा रामचंद्र की जय ” का सिंहनाद करने लगे एवं उन्होंने स्टेनगन से दुश्मन की मशीनगन पोस्ट पर प्रचंड आक्रमण किया। शुरुआत में उन्होंने दो पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया , तीन को घायल कर दिया और धुआंधार फायरिंग कर रही दुश्मनों की मशीनगन को भी चुटकियों में ध्वस्त कर दिया। इस साहसिक कार्रवाई में हवलदार चूनाराम गंभीर रूप से घायल भी हो गए थे और उनके घावों से अत्यधिक रक्त बहने लगा। वह अचेत हो कर वहीं गिर गए। अपनी अचेतावस्था से पूर्व तक वो दुश्मन की गोलियों का सामना करते रहे। अंतत: उनकी प्लाटून ने उस पोस्ट पर अधिकार कर लिया। श्री चूनाराम जी फगेड़िया उपचार के लिए भेजा गया। जिस प्रकार उनकी प्लाटून ने दुश्मनों पर विजय प्राप्त की उसी प्रकार उन्होंने मृत्यु पर भी विजय प्राप्त की और सौभाग्य से उनका जीवन सुरक्षित रह गया।

महावीर चक्र
महावीर चक्र पाना कोई आसान कार्य नहीं है क्योंकि इसको अपनी सांसे भी अर्पित करनी पड़ सकती है और नहीं भी । हवलदार चूनाराम जी को दुश्मनों के समक्ष अदम्य कोटि के नेतृत्व, अदम्य साहस और ऐतिहासिक वीरता प्रदर्शन के लिए भारत सरकार ने “ महावीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
अन्य पदक और पुरस्कार
सूबेदार चूना राम फगेरिया को भारतीय सेना में उनकी सराहनीय सेवा के लिए निम्नलिखित पदक प्राप्त हुए:
स्टार मेडल, युद्ध पदक, भारतीय सेवा पदक, आज़ादी पदक, बर्मा स्टार, महावीर चक्र, रक्षा पदक, शौर्य सेवा पदक, सामान्य सेवा पदक।
विडंबना
गुमनाम हुआ वो नाम , जो कितनों को ही नाम दे गया ।
अपनी सांसे बलीवेदी पर दे , कईं सांसों को अंजाम दे गया ।।
बस तारीखें फड़फड़ाकर कहती है कि हमें बचाया गुलामी से ,
और खाती है कि हम जिंदा है क्योंकि हमको वो वीर विश्राम दे गया ।।
यह सच में बहुत बड़ी विडंबना है कि आज की पीढ़ी को ये नाम परिचित नहीं लगते है। बहुत आवश्यकता हो गई है कि प्रत्येक स्तर के पाठ्यक्रम के सिरमौर , ये वीर शहीद ही होने चाहिए ताकि देश का हर बच्चा – बच्चा इनसे परिचित हों और यह जान सके कि हमारे सैनिक किस प्रकार अपनी जान की बाजी लगाकर दुश्मनों से लड़ते हैं और हमारी रक्षा करते हैं । आज की पीढ़ी को यह एहसास होना बहुत आवश्यक है। यदि हम ऐसा भी करते हैं तो शायद यही इन कीर्तिशेष शहीदों को हमारी ओर से सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।
कैफ़े सोशल मैग्जीन का उद्देश्य यही है कि इस प्रकार की सच्ची जानकारियां आप तक पहुँचाकर अवगत करवाएं और प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्ष रूप से सदैव देश की सेवा करे।
जीवन के विराम के क्षण
29 दिसंबर, 1968 को सूबेदार के रूप में वह सेवानिवृत्त हुए थे। सेना के रिकॉर्ड में उन्हें “अजेय चूनाराम” लिखा गया। यह अजेय सूबेदार सच में अजेय ही रहे क्योंकि वह दिन केवल तारीखों में अंकित हो सकता है , जिस दिन उनकी सांसों ने विश्राम किया हो परंतु उनकी वीरता सदैव भारतवासियों के हृदय में अंकित रहेगी । 30 मई , 1995 को गांव में उनका निधन हुआ था।
सुनने में यह आसान है परन्तु हकीकत में बहुत की कष्ट दायक है ” कुछ लोग मर कर भी मरते नहीं,
खासकर जो शहीद होते हैं क्योंकि उन्हें भारत माता ने अपनी गोद में स्थान दिया हुआ होता है ।। “
कैफे सोशल मैग्जीन ऐसे शूरवीरों को प्रणाम करती हैं।
जय हिंद , जय भारत , वंदे मातरम्

ललिता शर्मा ‘नयास्था’
भीलवाड़ा, राजस्थान




