परमवीर चक्र

मीनू मेरवान ‘इंजीनियर’

तकनीक का वीर

समुद्र किनारे एक सुंदर-सा नन्हा बालक अपनी ही सोच में मग्न बैठा है। उसके मन में उत्साह है, उमंग है और कई सारे सपने। समुद्र की बड़ी-बड़ी लहरें उसे फारसी भाषा में एक कहावत कह रही हैं—

“जो आगे बढ़ने को तैयार है, उसे काँटों से सावधान रहना चाहिए।”

थोड़ी देर में वह तेज लहरों से लगने वाले डर को समुद्र में ही बहा कर एक ऐसे आत्मविश्वास को अपने मन में भरकर लाता है, जिसके कारण जीवन में कभी भी उसका डर से सामना नहीं होता है।

अब उसकी सोच को एक नई दिशा मिलती है। वह सोच है—जीवन को तकनीकी रूप से जानने की।

आसमान में चमकने वाले तारों में चमक कहाँ से आती है? हवाई जहाज कैसे उड़ता है? पंखा कैसे चलता है? धरती के चलने की क्या प्रक्रिया है? किसी मशीन में क्या तकनीक लगाई जाए कि वह और बेहतर चलने लगे…

देश में गद्दार पैदा ही न हो, इसके लिए क्या किया जाए? दुश्मनों को किस गन से मारा जाए? बंदूक की गोली की रफ्तार कैसे बढ़ाई जाए, इत्यादि।

यह प्रश्न कोई सामान्य प्रश्न नहीं है, बल्कि एक ऐसे तीक्ष्ण बुद्धि के बालक के मस्तिष्क में उपजे प्रश्न हैं, जिनके उत्तर की जिज्ञासा उसे उज्ज्वल पथ की ओर अग्रसर करती है।

जी हाँ, आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसे ही तीक्ष्ण बुद्धि, बहादुर और जिज्ञासु बालक की, जिसे उसके तकनीकी मस्तिष्क के कारण जाना जाता है और मित्रगण उसका उपनाम ही ‘इंजीनियर’ रख देते हैं।

एयर मार्शल मीनू मेरवान ‘इंजीनियर’।

आज शायद ही कोई ऐसा भारतीय होगा, जो यह नाम नहीं जानता है।

पारिवारिक परिचय

मशहूर भारतीय वायु सेना अधिकारी व खुशमिजाज व्यक्तित्व के धनी मीनू मेरवान ‘इंजीनियर’ का जन्म 1 दिसंबर, 1921 को लाहौर, पंजाब (तत्कालीन ब्रिटिश भारत) में हुआ था।

मीनू मेरवान आठ भाई-बहनों में से छठे नंबर के लड़के थे और उनकी दो बहनें थीं। उनका जन्म उनके पिता मेरवान ईरानी, जो नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे के एक डिवीजनल इंजीनियर थे, और माता मानेकबाई के घर हुआ था। उनका परिवार असल में कराची और लाहौर के एक पारसी परिवार से था।

उनके भाइयों में एस्पी, जंगू (जहाँगीर) और रॉनी (रॉइंटन) भी इंडियन एयर फोर्स में शामिल हुए, जबकि एक और भाई होमी ने इंडियन आर्मी में सेवाएँ दीं।

इस परिवार की प्रमुख बात यह है कि द्वितीय विश्व युद्ध और भारतीय स्वतंत्रता के बाद के दौर में यह एक दुर्लभ उपलब्धि थी, जहाँ तीन सगे भाइयों—एस्पी, मीनू और रॉनी—को गैलेंट्री अवॉर्ड मिले थे।

उनका परिवार बहुत ही समृद्ध और रिश्तों से मजबूत था।

फौजी विरासत

भले ही तकनीक मन-मस्तिष्क में बसी थी, परन्तु देशभक्ति खून में बसी हुई थी।

उनके परिवार में देशभक्ति और देश सेवा कूट-कूट कर भरी थी। उनका परिवार सदैव देश-सेवा में ही तत्पर रहा।

शैक्षणिक पृष्ठभूमि और जीवन

अपनी आरंभिक शिक्षा के पश्चात एयर मार्शल मीनू मेरवान ‘इंजीनियर’ बॉम्बे के एलफिंस्टन कॉलेज गए।

उन्हें 4 IAF 72 के लॉट के साथ कमीशन मिला, जिसमें कई जाने-माने नाम थे। ट्रेनिंग के बाद, उन्हें जुहू में 2 BFTS में वैपिटिस उड़ाते हुए और 1943 में मेहर सिंह के अंडर Hurricane पर 6 SQN में पोस्ट किया गया।

दिसंबर 1943 में उन्होंने कोहाट में बेस्ड 3 SQN के फ्लाइट कमांडर और मीरानशाह में ऑपरेटिंग डेट्स का काम संभाला और NWFP में आदिवासी इलाकों में एयर एक्शन/बमबारी में सक्रिय रूप से शामिल थे।

अपने रोल के लिए उन्हें Distinguished Flying Cross (DFC) मिला।

उनके साइटेशन में लिखा है—

“फ्लाइट कमांडर के तौर पर, उन्होंने आर्मी के सपोर्ट में कई सफल हमले किए। हर समय उन्होंने अपनी फ्लाइट को लीड करने में शानदार काबिलियत और स्किल दिखाई थी।”

नवंबर 1945 और मई 1947 के बीच उन्होंने मिंगालाडॉन में 8 स्क्वाड्रन और जापान के मिहो में 4 स्क्वाड्रन को कमांड किया, जहाँ वे हरिकेन और स्पिटफायर उड़ा रहे थे।

मई 1947 में उन्हें अपने कोर्स से 5 स्क्वाड्रन में विंग कमांडर के तौर पर प्रमोट किया गया। उन्हें नए बने IAF स्टेशन अर्कोनाम को संभालने के लिए पोस्ट किया गया था।

27 साल के मीनू मेरवान को मार्च 1948 से 1 विंग के पहले कमांडर के तौर पर कश्मीर घाटी के उत्तर में भेजा गया। वे जम्मू में तैनात थे। उस समय J&K के सभी ऑपरेशन्स पर उनका पूरा कंट्रोल था।

ऑपरेशन्स को बहुत ही बहादुरी और निडरता से सफल करने हेतु उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

यहीं से शुरू होती है उनकी पदक चक्र की श्रृंखला।

26 जनवरी, 1950

एयर मार्शल मीनू मेरवान अब सबसे सम्मानित IAF ऑफिसर्स में से एक थे और उन्हें स्टाफ अपॉइंटमेंट्स के लिए तैयार किया जा रहा था।

1 विंग के बाद उन्होंने IAF HQ में विंग कमांडर (ऑप्स) का पद संभाला, जो ऑपरेशन्स डायरेक्टरेट के सेकंड इन कमांड थे।

मई 1949 में उन्हें C.B. लाल के साथ हायर कमांड कोर्स के लिए एंडोवर, UK भेजा गया।

1950 में लौटने पर उन्हें ग्रुप कैप्टन का रैंक मिला। उनके दो लंबे कार्यकाल रहे—4 साल IAF में, Wing Commander के तौर पर और 5 साल 2 Wing, पूना (साथ ही 2 TAC) के तौर पर।

उनके कमांड में IAF Wing ने सभी फ्लाइंग यूनिट्स और पूना में शामिल लिबरेटर्स, वैम्पायर और कैनबरा का चार्ज संभाला।

1962 का दौर

1959 में उन्हें एयर कमांडर के पद पर प्रमोशन मिलने पर Western Command (अब WAC) के AOC के तौर पर पोस्ट किया गया।

1962 में चीनी हमले के बढ़ने के साथ ही वे ईस्टर्न सेक्टर में पहुँच गए। उस समय कमांड कलकत्ता में था और ‘इंजीनियर’ को तेजपुर में एक नया ग्रुप बनाने का काम सौंपा गया था।

यहीं पर मीनू मेरवान ने अपना 1962 का अनुभव हासिल किया—फ्रंट से ट्रांसपोर्ट और हेलीकॉप्टर ऑपरेशन मैनेज करना और खुद सॉर्टीज को लीड करना।

युद्ध के बाद उन्हें एयर वाइस मार्शल के पद पर प्रमोट किया गया और उन्होंने शिलांग में कमांड के AOC-in-C का पद संभाला।

1964 से 1969 तक

1964-69 तक एयर मार्शल मीनू मेरवान ‘इंजीनियर’ डिप्टी चीफ के पद पर थे।

उन्होंने 1965 की लड़ाई को देखा, CAS ऑफिस को बदला और ऑफेंसिव और एयर डिफेंस हथियारों के कॉन्सेप्ट शुरू किए।

उन्हें एयर मार्शल के पद पर भी प्रमोट किया गया।

लेकिन उनका आखिरी सफर अभी बाकी था।

1969 से 1973 — एक और बड़ी जिम्मेदारी

1969-73 के दौरान वे AOC-in-C, WAC थे और 1971 की लड़ाई में पश्चिमी मोर्चे पर संघर्ष का नेतृत्व करते हुए वे एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण स्थिति में थे।

यह उनकी काबिलियत थी कि उन्होंने लंबे समय तक ऐसे मुश्किल और अहम पदों को संभाला।

1971 की लड़ाई में उनकी भूमिका के लिए सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।

3 दिसंबर, 1971 — युद्ध का ऐलान

03 दिसंबर, नई दिल्ली: जब पाकिस्तानी बॉम्बर भारतीय वायु सेना के ठिकानों पर हमले के बाद वापस लौट रहे थे, तभी IAF जवाबी हमले की अपनी योजनाओं पर तेजी से काम कर रही थी।

सूत्रों ने बताया कि आगरा से कैनबरा बॉम्बर पहले ही रात में पाकिस्तान के अज्ञात ठिकानों पर हमला करने के लिए उड़ान भर चुके थे।

3 दिसंबर, 1971 को जारी ‘ऑर्डर ऑफ द डे’ में, वेस्टर्न एयर कमांड के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, एयर मार्शल मीनू मेरवान ‘इंजीनियर’ ने घोषणा की कि भारतीय हवाई अड्डों पर पाकिस्तानी हवाई हमला “युद्ध” है और अपने अधीन इकाइयों को “पाकिस्तान की युद्ध मशीन को नष्ट करने” का निर्देश दिया।

उन्होंने कहा—

“यह उनका तीसरा दौर है और आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारा यह फर्ज है कि हम उस बुरी युद्ध मशीन को नष्ट कर दें, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप में लगातार शांति को भंग किया है।”

लड़ाई के बाद

एयर मार्शल मीनू मेरवान इंजीनियर, DFC, MVC, एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, वेस्टर्न एयर कमांड।

रिटायरमेंट से बस एक महीने पहले, उन्होंने रिपब्लिक डे फ्लाईपास्ट में MiG-21 उड़ाया।

मार्शल मीनू मेरवान एक ‘सच्चे योद्धा’ साबित हुए।

उनके हँसमुख, मिलनसार और बाहरी स्वभाव के पीछे एक मजबूत संकल्प भी छिपा था।

इस तरह वे अब तक के सबसे सम्मानित IAF ऑफिसर बने हुए हैं। यह अपने आप में बहुत बड़ी बात थी कि उन्हें WWII के लिए DFC, कश्मीर ऑपरेशन्स के लिए महावीर चक्र, 1962 ऑप्स के लिए 1962 का सम्मान और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के लिए पद्म भूषण जैसे सर्वोच्च पुरस्कार मिले।

1990 में महाराष्ट्र सरकार ने भी उन्हें ‘गौरव पुरस्कार’ से सम्मानित किया।

रिटायरमेंट के बाद भी नहीं रुके

रिटायरमेंट के बाद भी वे बैठे नहीं, बल्कि उन्होंने अलग-अलग चुनौतियों का सामना किया। वे एक एडवरटाइजिंग एजेंसी के CMD भी बने, जिसे उन्होंने 1997 में अपनी खराब सेहत के बावजूद और अपनी मृत्यु तक चलाया।

इहलीला का देवलोक गमन

31 दिसंबर, 1997 को श्री मीनू मेरवान ‘इंजीनियर’ ने इस धरती को अलविदा कह दिया, परन्तु उनकी वीरता आज भी सभी के दिलों में जिंदा है।

कैफे सोशल मैगजीन ऐसे शूरवीरों को नमन करती है।

जय हिंद, जय भारत

ललिता शर्मा ‘नयास्था’
भीलवाड़ा, राजस्थान, भारत

ललिता शर्मा नयास्था’
भीलवाड़ा, राजस्थान

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