अज्जमादा बोप्पय्या देवय्या – महावीर चक्र विजेता

” ए हवा तू चले तो वहाँ जाना, जहाँ गाँव मेरा है।
वो घर की रूह,दहलीज को तरसता पाँव मेरा है।
अगर मैं न लौटा तो समझ लेना कि माँ की गोद में समा गया।
और मिल जाए संदेशा तो रूह से साँसों का बिछड़ाव मेरा है। “
अपने जीवन में प्रत्येक इंसान जैसे – जैसे बड़ा होता है, उसके सपने भी बदलते और बढ़ते जाते हैं। कोई चिकित्सक बनने की सोचता है तो कोई अभियांत्रिकी अधिकारी तो कोई क्या।सभी यही सोचते हैं कि एक अच्छा जीवन जियें और सम्मान की मृत्यु प्राप्त करें परंतु कभी यह कोई नहीं सोचता कि मेरी मृत्यु हो जाए और मेरी देह किसी को न मिले। है न बड़ी विचित्र बात! जी हाँ , आज हम जिनकी चर्चा कर रहे हैं उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। इसे भी देश प्रेम की पराकाष्ठा कह सकते हैं कि हर सैनिक को यह पता होता हैं कि शायद युद्ध के पश्चात् हमारी लाश भी मिलेगी या नहीं परंतु फिर भी गर्व , शान, और उमंग से सेना में भर्ती होते हैं।

जीवन परिचय
‘ अज्जमादा बोप्पय्या देवय्या ‘ कितना अनोखा है नाम ! अनोखा होने के साथ – साथ अब यह विशेष भी बन गया। यह एक ऐसी सक्षियत हैं जिन्हें भारतीय वायु सेना का गौरव और ‘ आग के पंखों वाला ‘ सैनिक कहा जाता है।
24 दिसंबर, 1932 को डॉ ० बौप्पया के घर पुत्र रूप में कुर्ग क्षेत्र व कनार्टका मूल में जन्में श्री अज्जमादा बोप्पय्या देवय्या किसी पहचान के मोहताज नहीं है। उनकी वीरता के किस्से चारों दिशाओं में फैले हुए हैं। किसी भी सैनिक के लिए सर्वप्रथम उसकी मातृभूमि होती है। हमारे आदरणीय श्री वोपय्या जी ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु अपने प्राण न्योछावर कर दिए। ब्रिटिश काल में जन्म लेने वाले प्रत्येक भारतीय के जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य आजादी था। ऐसे में हमारे प्रेरणा स्त्रोत श्री अज्जमादा जी के मन में भी यही इच्छा थी। इसी सोच के साथ अपनी शिक्षा – दीक्षा पूर्ण की कि देश की सेवा में ही अपना जीवन समर्पित करेंगे और हुआ भी यही।
1954 – 1965 रैंक स्क्वाड्रन लीडर इकाई नंबर IAF के रूप में सेना में नियुक्ति प्राप्त की। 1965 में नापाक पाकिस्तान ने अपनी कुचालें चलते हुए भारत पर कब्जा करने की नियत रखी। हमारे भारतीय सैनिकों ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया।
भारत – पाक युद्ध के कारण
1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध , जिसे दूसरे कश्मीर युद्ध के रूप में भी जाना जाता है , पाकिस्तान और भारत के बीच अगस्त 1965 से सितंबर 1965 तक हुआ एक सशस्त्र संघर्ष था। संघर्ष पाकिस्तान के असफल ऑपरेशन जिब्राल्टर के बाद शुरू हुआ , जिसे भारतीय शासन के खिलाफ विद्रोह को तेज करने के लिए जम्मू और कश्मीर में सेना घुसपैठ करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। सत्रह दिन के युद्ध में दोनों पक्षों के हजारों लोग हताहत हुए और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से बख्तरबंद वाहनों की सबसे बड़ी संलग्नता और सबसे बड़ी टैंक लड़ाई देखी गई। सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा राजनायिक हस्तक्षेप और ताशकंद घोषणा के बाद यूएनएससी संकल्प 211 के माध्यम से युद्ध विराम की घोषणा के बाद दोनों देशों के बीच शत्रुता समाप्त हो गई। इस युद्ध में 1947 में भारत के विभाजन के बाद से कश्मीर में सैनिकों का सबसे बड़ा जमावड़ा देखा गया । ज़्यादातर लड़ाइयाँ विरोधी पैदल सेना और बख़्तरबंद इकाइयों द्वारा लड़ी गईं, जिन्हें वायु सेना और नौसेना अभियानों से पर्याप्त समर्थन प्राप्त था।

युद्ध में अज्जमादा बोप्पय्या देवय्या का योगदान और भूमिका
युद्ध पूर्णरूप से ज़ोरों पर था ,जिसे किसी भी हाल में जीतना ही था वरना भारत का सिरमौर कश्मीर नापाकी के कब्जे में होता। भारत की थल सेना और वायु सेना ने अपना पूरा ज़ोर लगा दिया बिना अपने प्राणों की चिंता किए। ऐसे में हमारे सेना नायक श्री अज्जमादा बोप्पय्या देवय्या जो वायु सेना का प्रमुख हिस्सा थे , ने युद्ध के दौरान दुश्मनों पर आसमानी आग बरसाते हुए उनके छक्के छुड़ा दिए। इसी बीच एक हमले में से श्री अज्जमादा बोप्पय्या देवय्या घायल हो जाते हैं। ताज्जुब की बात यह होती है कि घायल होने के पश्चात् वे लापता हो जाते हैं। वो घायल अवस्था में कहाँ और किस हाल में थे यह किसी को खबर नहीं। भारतीय सेना ने प्रत्येक क्षेत्र में उन्हें खोजा परंतु उनका कहीं पता नहीं चलता हैं । इस बात को लगभग 23 वर्ष हो जाते हैं।
उनकी पत्नी श्रीमती सुंदरी देवैया और उनकी पुत्रियां जो बरसों से उनका इंतजार कर रही होती हैं ,उन्हें एक ही खबर मिलती है कि भारत सरकार ने श्री अज्जमादा बोप्पय्या देवय्या को मृत घोषित कर दिया हैं और उन्हें भारत के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा हैं। यह सुनना जितना दुखदाई था उतना ही इसे मानना भी परंतु यह परिवार करता भी क्या? बरसों से जो आँखें रोज यह उम्मीद लेकर उठती थीं कि आज दहलीज पर उनके प्रियवर होंगे परंतु ऐसा कभी नहीं हुआ।
श्रीमती सुंदरी देवैया जो श्री अज्जमादा बोप्पय्या देवय्या की धर्मपत्नी हैं को 1988 में उनके पति के बलिदान हेतु महावीर चक्र प्रदान किया गया। यह केवल श्री अज्जमादा बोप्पय्या देवय्या का ही सम्मान नहीं था बल्कि एक पत्नी और उन बच्चों के अकेलेपन और संघर्ष का भी सम्मान था जिसे उन्होंने वर्षों तक जिया। यह सच में बहुत ही कष्टदायक होता है जिसे हर भारतीय को समझना चाहिए और सम्मान करना चाहिए।
फिल्म में मुख्य भूमिका के रूप में श्री
अज्जमादा बोप्पय्या देवय्या
‘ स्काई फोर्स ‘ नामक फिल्म में अभिनेता श्री वीर पहाड़िया ने उनकी भूमिका निभाई और श्री अक्षय कुमार मुख्य अभिनेता के रूप में हैं। इस फिल्म ने श्री अज्जमादा बोप्पय्या देवय्या की मृत्यु को जीवंत कर दिया। उनके बलिदान को लापता नहीं होने दिया। उनकी देशभक्ति भुलाए नहीं भूली जा सकती है।
ऐसे वीर सपूतों को ‘ कैफे सोशल मैग्जीन ऑफ इंडिया ‘ सलाम करती है और उन फिल्मकारों को भी नमन करती हैं , जिन्होंने देशभक्ति की यह सच्ची कहानी दुनिया के समक्ष रखी ।
🙏 जय हिन्द, जय भारत 🙏

ललिता शर्मा ‘नयास्था’
भीलवाड़ा , राजस्थान



