ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान – नौशेरा के शेर
बारह वर्ष का एक लड़का अपने घर की गली में खेल रहा था। खेलते-खेलते जब वह एक कुएँ के पास गया, तो उसने देखा कि एक बच्चा कुएँ में गिरा हुआ है और उसे बचाने वाला कोई नहीं है। वह तेजी से नीचे कूदा और झट से उस बच्चे को बाहर निकाल दिया। आस-पास वाले तो कुएँ की गहराई से ही घबरा गए थे, पर वह बहादुरी से कूद गया।
यहीं से शुरू होती है एक बहादुर, जांबाज़ और दिलेर व्यक्ति के जीवन की अनोखी कहानी। बड़ा होकर वह बालक ‘नौशेरा का शेर’ नाम से प्रसिद्ध हुआ और सभी के लिए प्रेरणा बना।

बात अलग, अंदाज़ अलग, उस नौशेरा के शेर की।
कलमें पढ़ीं, सजदे किए और पढ़ीं आयतें ख़ैर की।
आज हम एक ऐसे जांबाज़ सिपाही की कहानी पढ़ने जा रहे हैं, जो स्वयं तो कोतवाल के परिवार से ताल्लुक रखते ही थे, परंतु अपनी बहादुरी से अपने खानदान को भी अमर कर गए।
जी हाँ! हम बात कर रहे हैं ‘नौशेरा के शेर’ ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान की, जिन्होंने भारत के इतिहास में कश्मीर की एक अलग ही कहानी लिख डाली।
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनकी बहादुरी ही उनका परिचय है। उनका जन्म 15 जुलाई, 1912 को उत्तर प्रदेश के मऊ ज़िले में हुआ था। उनके पिता क़ाज़ी मोहम्मद फ़ारूक़ बनारस में कोतवाल थे। उन्हें भी अंग्रेज़ सरकार द्वारा ‘खान बहादुर’ का ख़िताब मिला हुआ था।
पढ़ाई में मेधावी और खेलकूद में अग्रणी मोहम्मद उस्मान शुरू से ही देश की सेवा का सपना देखते थे। बड़े होकर वे पुलिस और प्रशासनिक सेवा में जाना चाहते थे, परंतु शब्दों के उच्चारण की समस्या के कारण उनका कई प्रतिष्ठित पदों पर चयन नहीं हो पाया। फिर भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
अपने अथक प्रयासों के चलते उनका सैंडहर्स्ट (Sandhurst) में चयन हुआ, जिसमें केवल दस भारतीयों का चयन हुआ था। वहाँ उनकी मुलाकात ऐसे कई दिग्गजों से हुई, जो आगे चलकर उनके सहकर्मी बने।
1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने 50 पैरा ब्रिगेड का नेतृत्व किया। उन्हीं दिनों भारत पर विभाजन की विडंबना मंडरा रही थी। कई लोग पाकिस्तान चले गए और कई भारत में ही रहे। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान तब तक भारतीय सेना में अपनी एक विशेष पहचान बना चुके थे। हर कोई चाहता था कि वे उसकी ओर रहें।
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान के मन में एक ही बात थी कि जिस मिट्टी में मैं पला-बढ़ा हूँ, विभाजन के नाम पर उस माँ को कैसे छोड़ सकता हूँ। यह निर्णय यूँ तो कठिन नहीं था, परंतु उनके मुस्लिम होने के संदर्भ में कठिन अवश्य था।

उस समय अधिकांश लोगों को यही लगता था कि ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का रुख पाकिस्तान की ओर होगा, परंतु उन्होंने भारत माता की सेवा को चुना। उनके इस निर्णय ने अनेक मुसलमानों के जज़्बातों को भी जगाया, जो सच्चे भारतीय थे। देश में जैसे एक लहर-सी दौड़ गई कि धर्म और मज़हब से ऊपर राष्ट्र है।
जिस मिट्टी में पला-बढ़ा, उसको कैसे छोड़ दूँ।
कण-कण बसता भारत माँ का, रिश्ता कैसे तोड़ दूँ।।
इसी दौरान मोहम्मद अली जिन्ना और लियाकत अली खान ने उन्हें न केवल पद, रसूख और अधिक वेतन का प्रलोभन दिया, बल्कि सेना में सर्वोच्च पद का प्रस्ताव भी दिया। यह अपने-आप में बहुत बड़ी बात थी, परंतु ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान किसी भी प्रलोभन से विचलित नहीं हुए, क्योंकि उन्हें तो केवल अपना हिंदुस्तान दिखाई देता था।
धर्म-कर्म बस एक ही जाना, जाना सैनिक जात को।
भारत माँ की सेवा की, नहीं देखा दिन-रात को।।
इस प्रसंग पर महान लेखक इयान कार्डोज़ो ने अपनी पुस्तक ‘Param Vir: Our Heroes in Battle’ में लिखा है कि—
“ब्रिगेडियर उस्मान का पाकिस्तान का प्रस्ताव ठुकराना भारतीय सेना के लिए नैतिक विजय थी। यह दिखाता है कि धर्म से ऊपर राष्ट्र है।”
कश्मीर के तत्कालीन राजा महाराजा हरि सिंह नहीं चाहते थे कि कश्मीर का विलय किसी भी देश में हो, इसलिए उन्होंने प्रारंभ में किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। परंतु परिस्थितियाँ बिगड़ने लगीं। पाकिस्तान ने कबाइलियों और अपने समर्थित लड़ाकों को भेजकर कश्मीर में आतंक फैलाना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप उन्हें भारत में विलय के प्रस्ताव को स्वीकार करना पड़ा।
यहीं से भारत-पाकिस्तान के प्रथम युद्ध की नींव पड़ी।
नौशेरा और राजौरी, जो आवागमन के प्रमुख मार्ग थे, उन पर कबाइलियों ने हमला कर दिया। नौशेरा पर वे कब्ज़ा नहीं कर पाए, परंतु राजौरी पर कब्ज़ा कर लिया और वहाँ आतंक फैलाना शुरू कर दिया। लोगों का कत्लेआम हुआ और उनकी चीखें पूरे विश्व में गूँज उठीं।
इसी बीच पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आया और उसने 24 दिसंबर, 1947 को झंगड़ और चिंगस के मार्गों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। लोगों का जीवन दुभर हो गया। नौशेरा के पास तोपखाने का अभाव सबसे बड़ी समस्या थी, जिसे धीरे-धीरे दूर किया गया।
स्थिति अत्यंत विकट होती जा रही थी। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान और भारतीय सेना का खून दुश्मन को परास्त करने के लिए खौल रहा था। उनकी योजनाएँ निरंतर आगे बढ़ रही थीं।
रख हौसला, अँधेरा मिटकर रहेगा।
रोशनी को लाने में, पसीना तो बहेगा।।
वो मंजर दूर नहीं, जिसका इंतज़ार था।
भारत का हर बच्चा, भारत की जय कहेगा।।
उन्होंने अपने रिज़र्व सैनिकों और वायुसेना की सहायता से जवाबी हमला किया और कोट को पुनः अपने नियंत्रण में ले लिया। यह उनकी सूझ-बूझ का परिणाम था। सेना में जोश भरने के लिए उन्होंने ‘जय हिंद’ के नारे बुलंद किए।
6 फरवरी की सुबह कबाइलियों और पाकिस्तानियों ने अलग-अलग समूहों में कोट पर पुनः हमला कर दिया, जिसमें भारतीय सैनिकों को भारी क्षति पहुँची। भारतीय सेना ने अपनी सूझ-बूझ से स्थिति को संभाल लिया और नौशेरा पुनः भारतीय नियंत्रण में आ गया।
हालाँकि झंगड़ उनके हाथ से निकल गया, जिससे वे अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने प्रण लिया कि जब तक झंगड़ पुनः जीत नहीं लिया जाएगा, वे पलंग पर नहीं सोएँगे।
इसी बीच पाकिस्तान ने ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान के सिर पर 50,000 रुपये का इनाम भी घोषित कर दिया।
10 मार्च, 1948 को मेजर कलवंत सिंह ने पुनः कब्ज़े के आदेश दिए। इस अभियान को ‘ऑपरेशन विजय’ नाम दिया गया। यह 12 मार्च को शुरू होना था, परंतु भारी वर्षा के कारण 18 मार्च को आरंभ हुआ और अंततः विजय में परिवर्तित हुआ।
खून-पसीना एक किया, कश्मीर की रक्षा में।
दुश्मन के मंसूबे मसले, जाकर उसकी कक्षा में।।
यह सब किसी सपने जैसा लग रहा था। अनेक संघर्षों के बाद जीत का स्वाद मिला था।
फिर वह घड़ी आई, जिसका किसी को इंतज़ार नहीं था।
3 जुलाई, 1948 को नौशेरा में पाकिस्तानियों ने पुनः हमला किया। यह हमला अचानक हुआ, इसलिए उसे संभालना कठिन था। फिर भी ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान और भारतीय सैनिक बहादुरी से डटे रहे।
परंतु गोलाबारी इतनी तीव्र थी कि 36 वर्षीय ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान पर एक गोला आ गिरा। उसके छर्रों ने उनके शरीर को गंभीर रूप से क्षत-विक्षत कर दिया।
कल्पना कीजिए, वह दृश्य कैसा रहा होगा—मानो भारत माता का एक वीर सपूत हमेशा के लिए माँ की गोद में समाहित हो रहा हो। भारत माता भी गर्व का यह अवसर हर किसी को नहीं देती; वह अपने प्रिय पुत्रों को ही अपने आँचल में सुलाती है।
बाज़ुओं में हिम्मत वतन की है।
साँसों में ताकत वतन की है।
ज़िंदगी की परवाह नहीं मुझे,
मेरी ज़िंदगी ही मेरे वतन की है।।
3 जुलाई, 1948 को नौशेरा में वे देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। वे युद्ध में शहीद होने वाले भारतीय सेना के सर्वोच्च रैंक के अधिकारियों में से एक थे।
उनकी शहादत के बाद उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया परिसर में दफ़नाया गया। उनके जनाज़े में लॉर्ड माउंटबेटन, पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा पूरा मंत्रिमंडल उपस्थित था।
मरणोपरांत उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया, जो पूरे देश के लिए गर्व का विषय है।
कैफे सोशल मैगज़ीन ऐसे शूरवीरों को शत्-शत् नमन करती है।
— ललिता शर्मा ‘नयास्था’
भीलवाड़ा, राजस्थान, भारत



