(व्यंग्य) – जरा हटके, जरा बचके


कई दशकों पूर्व एक गाना बड़ा मशहूर हुआ था —
“ए दिल है मुश्किल है जीना यहाँ,
जरा हटके जरा बचके ये है बॉम्बे मेरी जां।”
तब भारत की आर्थिक राजधानी के दो नाम हुआ करते थे — बंबई और बॉम्बे।
बंबई आम जन की जुबान में शहर को बोला जाता जबकि इलीट क्लास के लोग शहर को बॉम्बे कहा करते थे।
यह फर्क अभी भी है, जैसे आम आदमी महानगर के उपनगर बांद्रा कहता है जबकि इलीट क्लास उसे बैंड्रा कहता है।
एक मशहूर स्टेशन को इलीट क्लास विले पार्ले कहते हैं जबकि आम आदमी उसी स्टेशन को पार्ला कहता है।
नब्बे के दशक में भारत की आर्थिक राजधानी के देसी और इलीट नाम एक हो गए और शहर को एक नया सर्वमान्य नाम मिला — मुंबई और इस शहर में रहने वाले लोग खुद को मुंबईकर कहलाते हैं।
मुंबई को “मिनी भारत” भी कहा जाता है और मुंबईकर से जुड़ी कुछ चीजें बेहद दिलचस्प एवं अनूठी होती हैं —

- मुंबई के सबसे व्यस्त एवं चर्चित इलाके का नाम अंधेरी है, लेकिन रात को सबसे ज्यादा रौशन और जगमग अंधेरी उपनगर ही होता है।
- मुंबई की उपनगरीय ट्रेन सेवा को लोकल कहा जाता है और आम मुंबईकर “चर्चगेट से बोरीवली” तक की लोकल ट्रेन का स्पेशल पास जरूर बनवाकर रखता है।
- महिलाओं के लिये आमतौर पर काफी सुरक्षित शहर माना जाता है। आम तौर पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सीट आदि के लिये पुरुष ज्यादा लड़ते-झगड़ते हैं, पर मुंबई की लोकल ट्रेन में महिलाओं के लिये आरक्षित डिब्बों में महिलाओं में लड़ाई-झगड़े ज्यादा होते हैं।
- कहते हैं, मुंबई में “भगवान का मिलना आसान है मगर मकान का मिलना मुश्किल है।” छोटे घरों को खोली कहते हैं जो जल्दी खाली नहीं मिलती।
- मुंबई में कहा जाता है कि यहाँ के इंसानों की आधी जिंदगी क्यू यानी लाइन में बीत जाती है — ट्रेन का टिकट लेने से लेकर शौचालय तक जाने की लाइन में।
- मान्यता है कि अगर आप कल्याण से वीटी जाने वाली लोकल ट्रेन में पीक आवर्स में गर्दी झेलकर बॉम्बे वीटी स्टेशन पहुँच गए और शाम को सकुशल लौट आये, और इसके बाद भी दुखी या व्यथित नहीं हैं तो आप आसानी से देश में कहीं भी ‘सर्वाइव’ कर सकते हैं।
- मुंबई में लोगों को गुस्सा आता है तो लोग ढेर सारे अपशब्द कहने के बजाय “दिमाग का दही मत कर” कहकर क्रोधित होने की वार्निंग दे देते हैं।
- मुंबई में जिस वाक्य पर सबसे ज्यादा ध्यान रहता है वह है —
- “अगला स्टेशन…”
- “पुढे स्टेशन…”
- “Next Station…”
तीनों भाषाओं में हो रही उद्घोषणा पर यात्री सबसे ज्यादा एलर्ट रहते हैं और अपने गंतव्य स्टेशन का नाम आते ही दरवाजे के पास जाकर खड़े हो जाते हैं।
- मुंबई में जब कोई अपने गृहनगर चला गया हो तो कहा जाता है कि वह अपने गाँव चला गया है — भले ही गृहनगर दिल्ली या कोलकाता जितना बड़ा महानगर क्यों न हो।
- जिस तरह आलू ऑलराउंडर होता है, उसी तरह पाव भी मुंबई का सबसे ऑलराउंडर भोज्य पदार्थ है — बड़ा पाव, मिसल पाव, रगड़ा पाव, पाव भाजी। साथ ही, चाय पाव, दाल पाव, सब्जी पाव या सूखा पाव भी खूब चलता है।
- मुंबई का सबसे प्रसिद्ध नाश्ता सभी तबकों का पसंदीदा —
- उत्तर भारतीय कहते हैं “बड़ा पाव”
- मराठी–गुजराती कहते हैं “वड़ा पाव”
- मुंबई की लोकल ट्रेन सेवा में एक स्टेशन है सैंडहर्स्ट रोड, लेकिन लोग इसे आम बोलचाल में धड़ल्ले से संडास रोड कहते हैं।
- जैसे दालचीनी में दाल नहीं होती, ऑमलेट में आम नहीं होता और कोलगेट में कोई गेट नहीं होता, वैसे ही मुंबई के चर्चगेट स्टेशन के आसपास कोई चर्च नहीं है।
- आम तौर पर पते के लिए लोग लेफ्ट/राइट और लैंडमार्क बताते हैं। पर मुंबई में कहते हैं —
“सिग्नल से लेफ्ट/राइट मारो, फिर एक ब्रिज गिरेगा, उसी के बाजू का एड्रेस है।” - लोकल ट्रेन के हर डिब्बे में गेट के पास कोई न कोई प्लेटफार्म विशेषज्ञ जरूर मिल जाएगा जो बिना पूछे बताता है —
“आगे आ जा, इस स्टेशन पर प्लेटफार्म लेफ्ट/राइट बाजू आयेगा।” - पाली हिल जाने के लिए सवारी ऑटोवालों से पूछे — “पाली हिल जायेगा?”
ऑटोवाले अक्सर मना कर देते हैं क्योंकि वापसी में सवारी नहीं मिलती। तब झल्लाकर सवारी कहती है —
“पाली हिल नहीं जाएगा तो क्या ऑटो से समंदर पार करके दुबई जाएगा?” - चर्चगेट से चलने वाली विरार की लोकल में बोरीवली से पहले उतरने वाला पैसेंजर अगर सीट पर बैठ जाए तो यह अपराध की कोटि का माना जाता है।
- मुंबई की BEST बस सर्विस के कंडक्टर थोड़ी-थोड़ी देर बाद सवारियों को “पुढे चला” कहते रहते हैं। यानी आगे बढ़ो — मानो रोजाना मोटिवेशनल स्पीकर।
- मुंबई की लोकल ट्रेनों के बारे में कहा जाता है —
“Love में, War में और Local Train में सब कुछ जायज है।”
खाली ट्रेन में लोग खड़े होकर सफर करते हैं और भरी ट्रेन में सीट के लिये मारपीट। - मुंबई में अच्छी चीजों की उपमा देने के लिए “झकास”, और खराब चीजों के लिए “बकवास” शब्द खूब चलता है।
- रोजमर्रा में सुनाई देने वाले शब्द —
बरोबर, एक नम्बर, आई शपथ, देवा शपथ, झोलझाल, लोचा, घंटा फर्क नहीं पड़ने का, कट ले, पांडु, फाड़ू, पार्टी तो बनती है।

तो फिर माया नगरी, सपनों की नगरी को इक्कीस तोपों की सलामी देते हुए —
“ईहै बम्बई नगरिया तू देख बबुआ।”
– कृते : दिलीप कुमार




