गुमनाम नायक — भूपेंद्र कुमार दत्ता
भारत देश को अंग्रेज़ी हुकूमत से स्वतंत्र कराने के लिए हमारे देश के महान वीर सपूतों ने अलग-अलग तरीके से संघर्ष किया, जिसमें अनगिनत सपूतों ने अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। आज इस अंक में हम एक ऐसे वीर भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी नायक की शौर्यगाथा को जानने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्होंने ब्रिटिश शासन से भारत माता को आज़ाद करने के लिए काफ़ी संघर्ष किया था। वह महान नायक थे स्वर्गीय श्री भूपेंद्र कुमार दत्ता जी।

भूपेंद्र कुमार दत्ता जी का जन्म 8 अक्टूबर 1892 को जैसोर (अब बांग्लादेश) के ठाकुरपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री कैलाश चंद्र दत्ता और माता का नाम विमला सुंदरी था। पिता फरीदपुर के पास की परचर स्टेट के प्रबंधक थे। उनकी एक भाई और तीन बहनें थीं। उनकी माँ ने सभी बच्चों का लालन-पालन धार्मिक संस्कारों के साथ किया था।
बचपन में रामायण का उन पर काफ़ी प्रभाव पड़ा था। रामायण के एक प्रसंग से प्रभावित होकर उन्होंने प्रण ले लिया था कि वह आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे और संपूर्ण जीवन देश की सेवा में समर्पित करेंगे। फरीदपुर से हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने आगे की पढ़ाई कोलकाता की स्कॉटिश चर्च कॉलेज से की।
वे अनुशीलन समिति (जो 1902 में बनी थी) से जुड़ गए। इस समिति का उद्देश्य था युवाओं को अंग्रेजों के खिलाफ जागरूक करना। इसी समिति से उनकी क्रांतिकारी यात्रा की शुरुआत हुई।
सन् 1913 में दामोदर नदी पर आई बाढ़ के दौरान वर्धमान, मिदनापुर और हुगली ज़िले में सभी क्रांतिकारियों द्वारा रामकृष्ण मिशन के सहयोग से आयोजित राहत कार्यों से प्रभावित होकर उन्होंने जतिन मुखर्जी के सहयोगियों से मुलाकात की। इसी बीच पुलिस को यह जानकारी मिल गई कि यह लोग राहत कार्य के बहाने एक क्रांतिकारी संगठन बना रहे हैं।
भूपेंद्र दत्ता ने अन्य समूहों को एक साथ लाकर “युगांतर” का निर्माण किया। उन्होंने सुभाषचंद्र बोस के साथ प्रेसीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र की कक्षा में भाग लिया। बाहर से आने वाले छात्रों के लिए उन्होंने एक छात्रावास खोला, जिसमें मेघनाथ साहा, शिशिर मित्रा, और ज्ञान मुखर्जी जैसे प्रतिभाशाली छात्र रहते थे। ये सभी बाघा जतिन को जानते थे, जो उस समय एक बड़े क्रांतिकारी नेता थे।
सितंबर 1915 में जतिन की मृत्यु के बाद भारत में बड़े पैमाने पर दमन हुआ। नेता की मृत्यु के बाद जब साथी निराश हुए, तो भूपेंद्र दत्ता ने कहा कि “नेता की मृत्यु के साथ क्रांति नहीं मर सकती।” उन्होंने गुप्त रूप से अन्य साथियों से संपर्क कर धन एकत्रित किया और संघर्ष जारी रखा।

सन् 1917 में सेसुलगांव मीटिंग की भारत यात्रा की सूचना मिली कि सरकार हिंद-जर्मन षड्यंत्र में संलिप्त लोगों से बात नहीं करना चाहती। तब उन्होंने जीवनलाल चटर्जी के नेतृत्व वाले युगांतर समूह में एक घोषणा प्रकाशित की —
“सबसे पहले और अंत में आतंक फैलाओ। इस सरकार को परेशान करो, विनाश की बजाय परेशानियों को तरजीह दो। आतंक की लहर शांत करो जो मौत की बारिश करे। अपने उन भाइयों को याद करो जो जेलों में मर रहे हैं, दलदल में सड़ रहे हैं, जो मर रहे हैं या पागल हो गए हैं। याद रखो, जागते रहो और काम करो।”
सरकार ने बड़ी संख्या में बिना वारंट लोगों को जेल में बंद कर दिया। देशवासियों को सूचित करने एवं अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए भूपेंद्र दत्ता सहित कई बंगाली क्रांतिकारियों को जेल भेजा गया। बिश्नुपुर जेल में स्थानांतरित होने पर उन्होंने 19 दिन की भूख हड़ताल जारी रखी।
उन्होंने कांग्रेस पार्टी के नागपुर सत्र में महात्मा गांधी से मुलाकात की। गांधी जी ने विश्वास दिलाया कि एक वर्ष के भीतर स्वतंत्रता मिल जाएगी, परंतु भूपेंद्र दत्ता को संदेह था। उन्होंने अपनी पार्टी को स्वतंत्र भारत की रिपब्लिकन संसद से जुड़ने से मना किया और अरविंदो घोष से चर्चा करने के लिए पांडिचेरी गए। अरविंदो ने कहा कि गांधी एक बड़ी ताकत का प्रतिनिधित्व करते हैं — उनका विरोध करना नासमझी होगी।
पूर्वी क्रांतिकारियों ने सलाह दी कि अहिंसा को केवल एक नीति बताने के बजाय नैतिक मूल्यों पर अडिग रहना चाहिए। गांधी जी की असफलता के बाद उन्होंने 9 सितंबर 1923 को बाघा जतिन की आठवीं पुण्यतिथि पूरे भारत में मनाकर अपने इरादों को मज़बूत किया। देशबंधु चितरंजन दास ने उस स्थान पर एक स्मारक बनाने का प्रस्ताव दिया जहाँ बाघा जतिन ने लड़ाई लड़ी थी।
सितंबर 1923 में भूपेंद्र दत्ता को गिरफ्तार कर वर्मा के मांडले में भेज दिया गया। 1928 में जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने चटगांव में सूर्य सेन से लेकर पंजाब में भगत सिंह तक विभिन्न युगांतर नेताओं के साथ सतत संपर्क बनाए रखा।
उन्हें 1930 में आठ वर्षों के लिए फिर से गिरफ्तार किया गया। उन्होंने 1938 से 1941 और 1940 से 1951 के बीच साप्ताहिक ‘फॉरवर्ड’ का संपादन किया। 1946 में उनका निबंध संग्रह “भारतीय क्रांति और रचनात्मक कार्यक्रम” प्रकाशित हुआ, जिसकी प्रस्तावना डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने लिखी।
जब 1947 में देश आज़ाद हुआ और भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ, तो अधिकांश नेता भारत लौट आए, लेकिन दत्ता जी ने पाकिस्तान में ही रहना पसंद किया। वे वहाँ विधायक, सांसद तथा संविधान सभा के सदस्य बने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। उनका मानना था कि संविधान तभी जीवित रहेगा जब हर नागरिक को समान अधिकार मिलेंगे।
पाकिस्तान में जब 1958 में सैन्य शासन लागू हुआ, तो उन्होंने राजनीति छोड़ दी और 1962 में भारत लौट आए। 29 दिसंबर 1979 को कोलकाता में उनका निधन हो गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में उनके सम्मान में कहा कि “भूपेंद्र दत्ता जी न केवल ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य थे, बल्कि उन्होंने भारत की आज़ादी के लिए अपने जीवन के 30 वर्ष जेल में गुज़ारे थे। इतना ही नहीं, उन्होंने 78 दिनों तक भूख हड़ताल भी की थी, जो उस समय की सबसे लंबी भूख हड़ताल थी।”
उनकी गाथा हमें यह याद दिलाती है कि सच्चा देशभक्त वही है जो अपने आदर्शों से कभी समझौता नहीं करता। वे आज भी साहस और त्याग के प्रतीक हैं, जिन्होंने भारत को स्वतंत्रता दिलाने की दिशा में अग्रसर किया।
कैफ़े सोशल अपने इस गुमनाम नायक को शत्-शत् नमन करता है।

संपादक – मंडल
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