शूरवीरो की गाथा

गुमनाम नायक – बाबू मूलचंद जी जैन

कैफे सोशल के नियमित लेख “गुमनाम नायक” में इस बार उस सपूत को याद कर रहे हैं जिन्होंने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई बल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद समाज व देश के नवनिर्माण में अपना योगदान दिया।वह नायक थे
बाबू मूलचंद जी जैन। लोग उन्हें प्यार और सम्मान से बाबू जी कहकर बुलाते थे।

बाबू मूलचंद जी जैन का जन्म हरियाणा राज्य के सोनीपत जिले के गांव सिकंदरपुर माजरा में एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में 20 अगस्त 1915 को हुआ था। आपकी प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल में तथा मेट्रिक शिक्षा राज्यकीय स्कूल गोहना में हुई। बाबू जी को बचपन में स्कूल जाने के लिए 5 मील पैदल चलना पड़ता था। सन् 1935 में लाहौर से बीए‌ और सन् 1937 में कानून की परीक्षा पास की। तमाम परेशानियों के बावजूद हर परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया।

कानून की पढ़ाई के बाद उन्होंने वकालत शुरू कर दी। पढ़ाई करते समय ही 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव सिंह और राजगुरु को फांसी दिए जाने के विरोध में हुए प्रदर्शन में हिस्सा लिया। गांधी जी के आहृवान पर पारिवारिक जिम्मेदारियों और माता पिता के प्रतिरोध के बावजूद स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होकर खुद को देश के लिए समर्पित कर दिया।

सन् 1939 में असोधा सत्याग्रह आंदोलन के दौरान हमलावरों ने हमला कर दिया जिससे वो बेहोश हो गए। हमलावर आपको मरा समझकर कर चले गए। 6 मार्च सन् 1941 में अपनी जन्मभूमि से ही सत्याग्रह शुरू कर दिया। यहां उन्हें गिरफ्तार कर एक साल के लिए गुजरात जेल भेज दिया गया। सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने पर 11 अगस्त सन् 1942 को उन्हें करनाल कचहरी में गिरफ्तार कर मुल्तान जेल भेजा गया। इस तरह से बाबू जी को 2 बार एकांत कारावास में भेजा गया -एक बार कलम का इस्तेमाल करने के लिए और दूसरी बार देश भक्ति गीत गाने के लिए।


स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बाबू जी ने कमजोर और गरीब लोगों की वकालत मुफ्त में की और करनाल कांग्रेस के जिला प्रधान बने। सन् 1948 से सन् 1952 तक साप्ताहिक समाचार पत्र बलिदान का सम्पादन किया। सन् 1952 में समालखा से विधायक बने और सरकार में लोक निर्माण मंत्री बने। सन् 1957 में कैथल से पहली बार लोकसभा सदस्य बने और यहां उन्हें पंचायती राज कमेटी में सदस्य के रूप में कार्य करने का अवसर मिला।

बाबू जी शुरू से ही जात-पात और छुआ-छूत के विरोधी रहे और इनके उन्मूलन के बहुत से कार्य भी किए। सन् 1965 में बाबू जी हरियाणा को पंजाब से अलग राज्य बनाए जाने के लिए किए जा रहे आंदोलन में भाग लिया। इससे उनकी कांग्रेस से दूरी बढ़ गई। जयप्रकाश नारायण द्वारा चलाए गए आंदोलन में भाग लिया।

आपातकाल में 19 महीने जेल की सजा काटनी पड़ी। बाबू जी उस समय की शिक्षा पद्धति में बदलाव चाहते थे।इस पर काम करते रहे और अथक प्रयासों से सरकार ने सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम बनाया। राज्य पुस्तकालय प्राधिकरण के सदस्य रहते हुए पुस्तकालयों की स्थापना की। सन् 1991 में 76 वें जन्मदिन पर अपने पैतृक निवास को एक आदर्श पुस्तकालय बना दिया, जिसे गांव के आसपास के लोगों को समर्पित कर दिया। आज भी बाबू जी के जन्मदिन को पुस्तकालय दिवस के रूप में मनाया जा रहा है।

12 सितंबर 1997 को करनाल में आपने अंतिम सांस ली।
’सम्मान’
बाबू जी को उनके 84 वें जन्मदिन पर तत्कालीन उपराष्ट्रपति की पत्नी श्रीमती सुमनकांतजी की अध्यक्षता में हुए एक गरिमामय समारोह में उनके पैतृक गांव सिकंदरपुर माजरा स्थित स्कूल का नामकरण बाबू मूलचंद जैन राज्यकीय उच्च विद्यालय रखा गया। अगस्त 2015 में बाबू जी के जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर हरियाणा सरकार ने उनके सम्मान में आईटीआई करनाल का नामकरण बाबू मूलचंद जैन आईटीआई रखा गया।

मूलचंद जी जैन बाबू जी को देश उन्हें उनके द्वारा किए गए कार्यों के लिए हमेशा याद करता रहेगा। वो एक स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी,विचारक, लोकप्रिय नेता थे।

कैफे सोशल मासिक पत्रिका बाबू जी के चरणों में विनम्र

श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

संजीव जैन
संपादक – मंडल

संजीव जैन
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