शूरवीरो की गाथा

भारत के गुमनाम नायक – वीरांगना नीरा आर्य

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (सन् 1857) से स्वतंत्रता मिलने तक भारत माता के अनेक वीर सपूतों ने अपने जीवन को न्योछावर कर दिया। अनगिनत वीर-वीरांगनाएं और सैनिक देश को आजाद करने के लिए फांसी के फंदे पर झूल गए। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वीरों और वीरांगनाओं की गौरव गाथाओं से भरा हुआ है, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जिन्हें देश ने भुला दिया। उनकी शौर्यपूर्ण कहानियों को भावी पीढ़ी तक पहुंचने ही नहीं दिया गया। उन्हीं गुमनाम नायकों में एक नाम है — वीरांगना नीरा आर्य

नीरा आर्य एक ऐसी वीर, साहसी वीरांगना थीं जिन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजी सरकार के अत्याचारों को सहा और अपनी जान की बाजी लगाकर अपने कर्तव्यों पर डटी रहीं। उन्हें भारत की पहली महिला जासूस भी कहा जाता था।

नीरा आर्य का जन्म 5 मार्च 1902 को उत्तर प्रदेश के खेकड़ा गांव में एक प्रतिष्ठित जाट परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनके माता-पिता की मृत्यु गंभीर बीमारी के कारण हो गई। इलाज पर अधिक खर्च होने से आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई और कर्ज लेना पड़ा। इस कर्ज के चलते उनकी हवेली और जमीन साहूकारों द्वारा कुर्क कर ली गई। नीरा और उनका छोटा भाई बसंत कुमार अनाथ हो गए और दर-दर भटकते रहे।

भटकते हुए वे हरियाणा के चौधरी सेठ छज्जूमल से मिले, जो दयालु स्वभाव के थे। वे दोनों के धर्मपिता बन गए और उन्हें कलकत्ता ले गए, जहां उनकी प्रारंभिक शिक्षा भगवानपुर (कलकत्ता) में हुई और आगे की शिक्षा भी वहीं से पूरी की। उन्हें अनेक भाषाओं का ज्ञान था।

एक बार भगत सिंह अंग्रेजी पुलिस से बचने के लिए महीने भर सेठ जी के पास रहे थे। उनके साथ उनकी क्रांतिकारी साथी सुशीला भाभी भी थीं, जिन्होंने नीरा को पढ़ाया। भगत सिंह के विचारों का गहरा प्रभाव नीरा पर पड़ा। सेठ जी के घर क्रांतिकारियों और नेताओं का आना-जाना लगा रहता था, जिससे नीरा प्रभावित हुईं।

यहीं उनकी मुलाकात नेताजी सुभाष चंद्र बोस से हुई। एक घटना में जब नीरा समुद्र में डूबने लगीं, तब एक युवक ने उन्हें बचाया—वह स्वयं नेताजी थे। राखी के दिन उन्होंने नीरा को अपनी धर्म बहन के रूप में स्वीकार किया।

सेठ जी ने उनकी शादी श्रीकांत जयरंजन दास से कर दी, जो ब्रिटिश सरकार में सीआईडी इंस्पेक्टर थे। बाद में नीरा को पता चला कि उनके पति अंग्रेजों के जासूस हैं और क्रांतिकारियों के खिलाफ काम कर रहे हैं। उन्होंने अपने पति को समझाने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने।

जब नीरा को आजाद हिंद फौज और रानी झांसी रेजीमेंट के बारे में पता चला, तो वे नेताजी से मिलीं और उसमें शामिल होने का अनुरोध किया। नेताजी ने उन्हें महिला विंग “रानी झांसी रेजीमेंट” में शामिल कर लिया और अंग्रेजों की जासूसी का कार्य सौंपा।

नीरा ने अपनी साथियों मानवती आर्य, सरस्वती राजमणि, दुर्गा मल्ल गोरखा और डेनियल काले के साथ मिलकर अंग्रेजों की जासूसी की। वे लड़कों के वेश में अंग्रेज अफसरों के घरों और मिलिट्री कैंप में काम करती थीं।

एक मिशन में जब उनकी साथी पकड़ी गई, तो नीरा और राजमणि ने उसे छुड़ाने का साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने हिजड़ा नर्तकी का वेश धारण कर अफसर को नशीला पदार्थ देकर बेहोश किया और साथी को छुड़ा लिया। भागते समय गोली चलने से राजमणि के पैर में चोट लगी, लेकिन तीन दिन पेड़ पर छिपकर वे सुरक्षित लौट आईं। उनकी बहादुरी पर नेताजी ने राजमणि को लेफ्टिनेंट और नीरा को कप्तान बनाया।

जब उनके पति को नेताजी को पकड़ने का कार्य सौंपा गया, तब नीरा के सामने कर्तव्य और निजी जीवन के बीच चुनाव की स्थिति आई। उन्होंने देशप्रेम को चुना

एक अवसर पर उनके पति ने नेताजी पर गोली चलाई, जो उनके ड्राइवर को लगी। उसी समय नीरा ने अपने पति के पेट में संगीन घोंप दी, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद नेताजी ने उन्हें “नीरा नागिनी” कहा।

पति की हत्या के बाद नीरा को गिरफ्तार कर कलकत्ता जेल ले जाया गया, जहां उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा कि जेल में उन्हें बिना चटाई और कंबल के बंद रखा जाता था।

अंडमान ले जाते समय उनके साथ अत्यंत क्रूर व्यवहार किया गया। जेलर ने उनसे नेताजी का ठिकाना बताने को कहा, लेकिन उन्होंने दृढ़ता से कहा—
“नेताजी मेरे दिल में जिंदा हैं।”

इस पर उन्हें भयानक शारीरिक यातनाएं दी गईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। उन्होंने कभी भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की। उन्होंने अपना जीवन हैदराबाद के फलकनुमा में फूल बेचकर बिताया।

26 जुलाई 1998 को उस्मानिया अस्पताल, चारमीनार के पास उन्होंने अंतिम सांस ली। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश लंबे समय तक उनके बलिदान से अनजान रहा।

आज उनकी वीरता पर एक फिल्म भी बनाई गई है, जिसे कन्नड़ फिल्ममेकर रूपा अय्यर ने निर्देशित और अभिनीत किया है। इस बायोपिक को नेशनल अवॉर्ड विजेता वरुण गौतम ने लिखा है।


कैफे सोशल पत्रिका टीम देश की पहली महिला जासूस वीरांगना नीरा आर्य को शत् शत् नमन करती है।

संजीव जैन
संपादक – मंडल

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