पं. गोपबंधु दास
भारत देश को ब्रिटिश हुकूमत से स्वतंत्र कराने वाले गुमनाम नायकों की श्रृंखला में इस अंक में हम एक ऐसे नायक की कहानी पढ़ रहे हैं, जो न केवल स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि समाजसेवी व लेखक भी थे। ऐसे ही एक नायक थे पंडित गोपबंधु दास जी।

गोपबंधु दास, जिन्हें “उत्कल मणि” के नाम से भी जाना जाता है, उड़ीसा के लोग उन्हें प्यार से “दरिद्र सखा” के रूप में भी याद करते हैं। दरिद्र सखा अर्थात गरीबों के दोस्त।
गोपबंधु दास जी का जन्म 9 अक्टूबर 1877 को उड़ीसा राज्य के पुरी जिले में साक्षी गोपाल के निकट सुआंडो गाँव में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। आपके पिता का नाम दैतारी दास तथा माता का नाम स्वर्णमयी देवी था। आपकी प्रारंभिक शिक्षा साक्षी गोपाल में हुई। इसके बाद आगे की पढ़ाई पुरी, कटक और कोलकाता में की। आपने कोलकाता विश्वविद्यालय से सन् 1906 में एल.एल.बी. की डिग्री प्राप्त की। घर की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए पढ़ाई के पश्चात् आप वकालत करने लगे।
राष्ट्र के प्रति प्रेम और कुछ करने की भावना उनमें बचपन से ही थी। इसलिए आप विद्यार्थी जीवन से ही “उत्कल सम्मिलनी” संस्था से जुड़ गए। इस संस्था का उद्देश्य सभी उड़िया वासियों को एक राज्य के लिए एकत्रित करना था। गोपबंधु दास ने उत्कल के विभिन्न क्षेत्रों को संगठित कर पूर्ण उड़ीसा राज्य के निर्माण के लिए लगातार प्रयास किए।
सन् 1909 में आपने साक्षी गोपाल में एक हाईस्कूल की स्थापना की, जिससे आसपास के क्षेत्रों में रह रहे बच्चों को निकट ही शिक्षा मिल सके।
आप उत्कल के दैनिक पत्र “समाज” के संस्थापक थे।
जब महात्मा गांधी ने “असहयोग आंदोलन” प्रारंभ किया, तब आपने अपनी इस संस्था को कांग्रेस में मिला दिया। आप गांधी जी व नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रिय थे।
स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए आपको अनेक बार जेल यात्रा करनी पड़ी। सन् 1921 में आपने उड़ीसा में “असहयोग आंदोलन” की कमान संभाली, जिसके कारण आपको 2 वर्ष की सजा हुई।
गोपबंधु दास वर्ष 1922-24 के दौरान देश की ऐतिहासिक जेल हजारीबाग में कैद रहे। जेल से रिहा होने के पश्चात् वे चुप नहीं रहे, बल्कि लगातार लोगों को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एकजुट करने के लिए सिंहभूमि के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर भ्रमण किया और लोगों को देश के लिए कुछ करने हेतु प्रेरित किया।
गोपबंधु दास जी ने देश को ब्रिटिश हुकूमत से आजाद कराने के लिए निरंतर कार्य किया। आप स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ प्रसिद्ध लेखक व साहित्यकार भी थे। आप गद्य और पद्य दोनों में रचनाएँ लिखते थे। आपने व्यापक लेखन कार्य किया, जिनमें प्रमुख रचनाएँ हैं— बंदीरा आत्मकथा, अवकाश चिंता, कारा कविता, नचिकेता उपाख्यान, धर्मपद।
गोपबंधु दास जी ने समाज के लिए भी अनेक सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लिया और गरीब वर्ग के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। उड़ीसा में उनके कालखंड को “सत्यवादी” युग के नाम से जाना जाता है।
पं. गोपबंधु दास जी का निधन 17 जून 1928 को हुआ।
आज आप हमारे बीच नहीं हैं, परंतु आपने राष्ट्रभक्ति, भाषा प्रेम और समाज सेवा की जो विरासत छोड़ी है, उसके लिए आपको सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। उड़ीसा राज्य में जब भी राष्ट्रीयता और स्वाधीनता संग्राम की बात की जाती है, तब लोग आपका नाम गर्व से लेते हैं।
कैफे सोशल पत्रिका टीम इस वीर स्वतंत्रता सेनानी, साहित्यकार और समाजसेवी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित कर नमन करती है।
जय भारत के वीर सपूतों की।
संजीव जैन
संपादक मंडल

संपादक – मंडल
@cafesocialmagazine &
@inbookcafe , @inbook.in



