ब्रिगेडियर श्री रतननाथ शर्मा – साहस का दूसरा नाम

यह कोई नहीं जानता कि किसके जीवन की दिशा कब, कैसे मोड़ ले ले। जीवन एक रहस्यमयी यात्रा है, जो कभी आसान रास्तों पर ले जाती है तो कभी कठिनाइयों की घाटियों से होकर गुजरती है। लेकिन एक बात स्पष्ट है — जो व्यक्ति अच्छे विचार रखकर सोता और जागता है, वह जीवन में सदैव अच्छे कर्म ही करता है। ऐसे ही एक महान शख्सियत हैं ब्रिगेडियर श्री रतननाथ शर्मा, जिनकी वीरता, नेतृत्व और त्याग की कहानी आज भी प्रत्येक भारतीय के हृदय में देशभक्ति का संचार करती है। उनका जीवन एक ऐसा उदाहरण है, जिसमें ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और मातृभूमि के प्रति समर्पण अपने सर्वोत्तम रूप में देखने को मिलता है।
‘‘शौर्य वो दीपक है, जो अंधेरों में भी जलता है।’’
बचपन से ही देशभक्ति की भावना को दिल में बसाकर चलने वाले ब्रिगेडियर श्री रतननाथ शर्मा भारतभूमि को ही अपना सब कुछ मानते थे। वह भारतीय सेना के ऐसे वीर योद्धा थे, जिन्होंने पंजाब रेजिमेंट के साथ सेवा करते हुए अनेक साहसिक कार्यों को अंजाम दिया। उनके योगदान को न सिर्फ सेना बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र ने सम्मान की दृष्टि से देखा। उनके अद्वितीय पराक्रम के लिए उन्हें महावीर चक्र जैसे सर्वोच्च सैन्य सम्मान से नवाजा गया। यह सम्मान उन्हें 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनके अनुकरणीय नेतृत्व और रणनीति के लिए दिया गया था। जब पाकिस्तान की सेना ने हमारी टुकड़ियों को चारों ओर से घेर लिया था और घात लगाकर बैठी थी कि कब हमसे कोई चूक हो और वे हमला कर दें, तब ब्रिगेडियर शर्मा की सूझबूझ और साहस ने हालात को पलट दिया।
ब्रिगेडियर शर्मा ने पश्चिमी मोर्चे के जम्मू और कश्मीर सेक्टर में स्थित पुंछ नदी के पास एक किलेबंद पाकिस्तानी ठिकाने पर हमला करने का निर्णय लिया। यह आसान नहीं था — दुश्मन की सुरक्षा व्यवस्था बहुत मजबूत थी और उसके इरादे भी खतरनाक थे। ऐसे माहौल में उन्होंने अपने सैन्य बल के साथ एक सुदृढ़ और तेज रणनीति बनाकर दुश्मन के मंसूबों को ध्वस्त कर दिया। इस हमले की सफलता भारतीय सेना की न केवल रणनीतिक जीत थी, बल्कि मनोबल को भी ऊँचाई तक ले जाने वाली घटना थी। यह भारतीय सैन्य इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज एक अनमोल अध्याय है।
ब्रिगेडियर श्री रतननाथ शर्मा का जन्म 23 नवंबर 1926 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के कांगड़ा में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री हरिचरण दीक्षित था। एक साधारण परिवार में जन्म लेकर, असाधारण उपलब्धियाँ हासिल करने वाले ब्रिगेडियर शर्मा ने प्रारंभिक शिक्षा डी.एस.वी. हाई स्कूल, कांगड़ा में प्राप्त की। बचपन से ही उनके व्यक्तित्व में देशप्रेम, अनुशासन और ईमानदारी की झलक थी। युवावस्था में उन्होंने भारतीय राजस्व सेवा में कुछ समय के लिए कार्य किया, लेकिन जब एक व्यक्ति ने उन्हें रिश्वत देने की कोशिश की, तो उन्होंने छह महीने बाद ही वह नौकरी छोड़ दी। यह निर्णय उनके अदम्य आत्मसम्मान और नैतिक मूल्यों का प्रतीक था।
उनका विवाह संभ्रांत परिवार की सुश्री सुभाष जी से हुआ, जिनके साथ उन्होंने एक सुंदर और संतुलित पारिवारिक जीवन व्यतीत किया। उनके तीन संतानें — दो बेटियाँ और एक बेटा हैं। जहाँ एक ओर वे देश सेवा में अग्रणी रहे, वहीं दूसरी ओर उन्होंने अपने बच्चों को भी नैतिकता, अनुशासन और कर्मठता का पाठ पढ़ाया। उनका पारिवारिक जीवन भी उनकी महानता का परिचायक रहा।
ब्रिगेडियर शर्मा ने 28 अगस्त 1949 को भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट में आधिकारिक रूप से अपनी सेवा की शुरुआत की। उस समय देश स्वतंत्रता के बाद अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहा था और भारतीय सेना को ऐसे ही जांबाज़ अफसरों की आवश्यकता थी। 1965 के भारत-पाक युद्ध में उन्होंने उल्लेखनीय नेतृत्व का प्रदर्शन किया, जिससे उनकी पहचान एक बेहतरीन योद्धा और रणनीतिकार के रूप में हुई। लेकिन असली चुनौती और असाधारण वीरता की मिसाल उन्होंने 1971 के युद्ध में पेश की, जब वे लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में 21वीं बटालियन, पंजाब रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर थे।
युद्ध के दौरान 9 दिसंबर 1971 को उन्हें एक विशेष मिशन सौंपा गया — पुंछ नदी के किनारे स्थित नांगी टेकरी नामक किलेबंद पाकिस्तानी ठिकाने पर कब्जा करना। यह ठिकाना सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि वहाँ से पाकिस्तानी सैनिक नदी और आसपास की सड़कों पर पूरी तरह से हावी होते जा रहे थे। ब्रिगेडियर शर्मा की नेतृत्व क्षमता, सूझबूझ और उनके द्वारा बनाई गई रणनीति के कारण इस ठिकाने पर कब्जा कर लिया गया। इस लड़ाई में भारतीय सैनिकों की वीरता और समर्पण के साथ-साथ शर्मा की कमान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनका योगदान न केवल रणभूमि में था, बल्कि शांति के समय में भी उनका जीवन उतना ही प्रेरक रहा। 1977 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने भारतीय किसान उर्वरक सहकारी (IFFCO) में मुख्य प्रबंध निदेशक (MD) के रूप में कार्य किया। वहाँ भी उन्होंने संगठन को नए आयामों तक पहुँचाया। उनका प्रशासनिक कौशल, निर्णय लेने की क्षमता और नेतृत्व गुण वहाँ भी उतने ही प्रभावी सिद्ध हुए जितने सेना में थे।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। एक हृदयविदारक वाहन दुर्घटना में ब्रिगेडियर श्री रतननाथ शर्मा का निधन हो गया। यह समाचार केवल उनके परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक गहरा आघात था। एक ऐसा व्यक्ति, जिसने अपने जीवन के हर क्षण को राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित कर दिया, वह हमें असमय छोड़कर चला गया।
‘‘देशभक्ति एक भावना नहीं, जीवन की शैली है।’’
उनकी जीवनी आज भी हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। चाहे वह ईमानदारी के लिए राजस्व सेवा छोड़ने का फैसला हो या रणभूमि में अपने साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने की कहानी — ब्रिगेडियर शर्मा का जीवन हमें बताता है कि सच्चा देशभक्त वही होता है जो हर परिस्थिति में राष्ट्र को सर्वोपरि रखे। उनकी कहानी आज के युवाओं को बताती है कि अनुशासन, नैतिकता और समर्पण से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

उनकी याद में आज भी भारतीय सेना उन्हें नमन करती है। वह सिर्फ एक सैन्य अधिकारी नहीं, बल्कि एक विचार थे, एक परंपरा थे — जो पीढ़ियों तक प्रेरणा देते रहेंगे। ब्रिगेडियर शर्मा ने यह सिद्ध कर दिया कि असली वीरता केवल रणभूमि में तलवार चलाने से नहीं, बल्कि प्रत्येक निर्णय, प्रत्येक कर्तव्य और प्रत्येक कर्म में ईमानदारी और साहस दिखाने से होती है।
दुश्मन की गोलियों का सामना करने वाले और देश के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार से सम्मानित हमारा यह जांबाज़ सैनिक दुश्मनों से तो जीत गया परंतु अपने ही देश के एक लापरवाह वाहन चालक की लापरवाही का शिकार हो गया। अपने पैतृक गाँव पालमपुर जाने हेतु बस की प्रतीक्षा में खड़े ब्रिगेडियर श्री रतननाथ शर्मा को एक तेज़ गति से आते वाहन ने इतनी ज़ोर से टक्कर मारी कि वे घायल हो गए और फिर कभी न उठ पाए। इस हृदयविदारक दुर्घटना में हम सभी के प्रेरणा स्रोत ब्रिगेडियर श्री रतननाथ शर्मा को खो दिया।
“जो देश के लिए जीता है, वह कभी मरता नहीं।”
उनकी जीवनी सभी हेतु प्रेरणादायक और अनुकरणीय है।
हमारे प्रेरणा स्रोत ब्रिगेडियर श्री रतननाथ शर्मा को भारत का प्रत्येक वासी और कैफे सोशल मीडिया नमन करता है।
जय हिंद, जय भारत।



