परमवीर चक्र

गाथा महावीर की:एयर मार्शल श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज

कैफे सोशल मैगजीन इस बार आपके लिए एक ऐसा किरदार लेकर आई है, जिसे हर कोई पढ़कर गुनना चाहेगा और साथ ही साथ उनके पदचिन्हों का अनुसरण भी करना चाहेगा। तो आइए पढ़ते हैं एक विशिष्ट विभूति को।

“माँ, आप मुझे इस गुलाम भारत की धरती पर ला तो रही हो पर यह भूल जाना कि मैं केवल आपका ही बेटा रहूँगा। मैं इस धरती पर भारत माँ की रक्षा के लिए आ रहा हूँ।”

Air Marshal RN Bhardwaj Indian Air Force

देश के वीर, बहादुर, साहसी, शूरवीर और जोश-जुनून से भरे एयर मार्शल श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज ने इस धरती पर आने से पूर्व, अपनी माता जी से यही कहा होगा।

जब 1935 का भारत पूर्ण स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था, जहाँ एक तरफ ब्रिटिश सरकार नए सुधारों के जरिए अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहती थी, वहीं दूसरी तरफ इन तुफानों ने अनजाने में ही सही, स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढाँचे की मजबूत नींव रख दी थी। इन स्थितियों में भारत को एक अनमोल हीरा मिला जिनका नाम है—

एयर मार्शल श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज

शब्द मेरे कभी रुकने न पाएँ।
कलम मेरी सुहाने न पाए।
मैं लिखती रहूँ इन वीरों पर
और ये अनवरत चलती जाए।

परिचय एयर मार्शल

श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज का जन्म जुलाई 1935 में लाहौर (अविभाजित ब्रिटिश इंडिया) में हुआ। उनके पिता जी का नाम श्री पी. एन. भारद्वाज है।

वायुसेना में आगमन

एयर मार्शल श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज जो 8 अक्टूबर 1955 को इंडियन एयर फोर्स (IAF) में कमीशन मिला था (उन्होंने 1965 और 1971 के भारत–पाकिस्तान युद्धों में हिस्सा लिया)।

उन्हें ‘नम्बी’ के नाम से जाना जाता था, यह निकनेम उनके प्यारे व्यवहार से आया था और पायलट टारगेट इंस्ट्रक्टर स्कूल के CO, नोवी क्लार्क ने उन्हें यह निकनेम दिया था।

Hawker Hunter Indian Air Force 1971 war

सैन्य जीवन में विशेष योगदान

उन्हें 1955 में फाइटर स्ट्रीम में 66वें पायलट कोर्स से इंडियन एयर फोर्स में कमीशन मिला, और वे एक मशहूर कॉम्बैट पायलट और एक सम्मानित मिलिट्री लीडर बनने के लिए आगे बढ़े। एक पायलट के तौर पर उनके सफर की शुरुआत 1961 में पायलट टारगेट इंस्ट्रक्टर के तौर पर उनकी योग्यता से हुई, जो आज के युग के ‘टॉप गन’ के बराबर था, जिससे उनकी जबरदस्त फ्लाइंग स्किल्स और टैक्टिकल समझ का पता चलता है।

मिलिट्री ट्रेनिंग में एयर मार्शल श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण था। उन्होंने इसाफ में एक इंस्ट्रक्टर के तौर पर काम किया और 1971 की लड़ाई शुरू होने से पहले ऑपरेशनल ट्रेनिंग यूनिट में अंडर पायलटों को ट्रेनिंग देने में अहम भूमिका निभाई। उन्हें उनकी ट्रेनिंग और ऑपरेशनल तैयारी में बेहतरीन काम के लिए वायु सेना मेडल से भी सम्मानित किया गया।

ये मेडल, मेडल नहीं होते हैं, बल्कि तपस्या का प्रतिफल होते हैं।

1971 की लड़ाई में स्क्वाड्रन लीडर श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज, जिन्हें प्यार से ‘नम्बी’ कहा जाता था, ने पाकिस्तान के खिलाफ इंडियन एयर फोर्स के ऑपरेशन में अहम भूमिका निभाई। वे हलवारा के ऑपरेट करने वाली 20 स्क्वाड्रन के साथ काम कर रहे थे। इस लड़ाई के दौरान उनकी लीडरशिप और बहादुरी ने कई अहम मिशनों में अहम भूमिका निभाई, जिनका लड़ाई के नतीजों पर बहुत असर पड़ा। 5 दिसंबर 1971 को गुरुप डोले बी. स्क्वाड्रन लीडर श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज और फ्लाइट लेफ्टिनेंट श्री गहलोत ने पाकिस्तान के छछरावाला एयरफील्ड पर जोश और हिम्मत से भरा हमला किया। यह मिशन लेफ्टिनेंट अरुण प्रकाश और उनके विंगमैन के सफल हमले के बाद हुआ। श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज और श्री गहलोत ने इस रफ्तार को जारी रखा, एक C-130 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट को तबाह करके और गहलोत ने एक दिन ओटर को मारकर मिशन की सफलता में योगदान दिया। उन्होंने उस हमले में शत् प्रतिशत डीस्रप्टेड नवीन एयर क्राफ्ट को तबाह कर दिया।

7 दिसंबर को, श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज ने स्ट्रैटेजिक रूप से अहम मंगला ढामडेल डैम के खिलाफ चार एयरक्राफ्ट वाले मिशन को लीड किया। स्क्वाड्रन ने रॉकेट पॉड्स से ठोस बर्स्ट उठाए। एंटी-एयरक्राफ्ट फायर का सामना करने और सर्व इक्विपमेंट में खराबी, जिसमें तोप का रुकना और रॉकेट पॉड का फँसना शामिल था, के बावजूद मिशन सफल रहा। इस हमले ने डैम के नीचे पावर स्टेशन को पूरी तरह से नुकसान पहुँचाया।

अपने ऑपरेशनल मोमेंटम को जारी रखते हुए, श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज ने 8 दिसंबर को मुरीद एयरबेस को टारगेट करते हुए एक और जरूरी मिशन को लीड किया। भारद्वाज द्वारा एक ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट को सफलतापूर्वक नष्ट करना और उनके विंगमैन करम्बया और देसोत्थर द्वारा दो MiG-19 फाइटर्स पर हमला करना एक बड़ी सफलता थी।

10 दिसंबर को, श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज और डिप्टी करम्बया को शाहपुर इलाके में सेना को सपोर्ट करने के लिए एक सॉर्टी के लिए भेजा गया था। उनके एयरक्राफ्ट, जिसमें पूरा एम्युनिशन, 230-गैलन ड्रॉप टैंक और SNEB रॉकेट पॉड्स लगे थे, एक बड़े हमले के लिए तैयार थे। जैसे ही वे टारगेट एरिया के पास पहुँचे, एक पाकिस्तानी सेबर जेट अचानक उनके पीछे से गुजरा और करम्बया पर फायरिंग की बौछार कर दी। करम्बया ने हार्ड राइट मोड़ा और छुप गए, जिसमें जबरदस्त हवाई फुर्ती दिखाई और आखिर में डेंजरस जोन से पहले सेबर की आक्रामक पोजीशनिंग से बचते हुए निकल गए। इस मैन्यूवर ने श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज को एक अहम मौका दिया। दुश्मन से लगभग 400 यार्ड की दूरी और जबरदस्त स्पीड से तेजी से कम करते हुए, फायरिंग शुरू कर दी जिससे सेबर तुरंत टूट गया। भारद्वाज ने अपनी रफ्तार बनाए रखते हुए, पाकिस्तानी टैंकों और जमीन पर दूसरे टारगेट पर हमला जारी रखा।

यह पल जो यादगार बन गया—

उनकी नेतृत्व क्षमता और उड़ान कौशल ने भारतीय वायु सेना की सर्वोच्च परंपराओं का उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसके कारण उन्हें महावीर चक्र मिला और भारत के सैन्य इतिहास में एक सम्मानित स्थान मिला। वे ए.वी.सी. के साथ युद्ध में सम्मानित होने वाले केवल दो स्क्वाड्रन लीडरों में से एक बन गए।

महावीर चक्र वही है, जब भारत माता अपनी बाहें फैलाकर अपने सपूत की प्रशंसा करना चाहती है।

सैनिक कभी थकता नहीं

युद्ध के बाद का उनका जीवन कम प्रतिष्ठित नहीं था। 1974 में 26 स्क्वाड्रन की कमान संभालने और ‘A-7’ उड़ाने के साथ ही उन्होंने आत्मविश्वास के साथ वरिष्ठ कमांड भूमिकाओं में पदार्पण किया। वायु सेना स्टेशन बरेली, चंडीगढ़ में अग्रिम मुख्यालय और बाद में दक्षिणी वायु कमान के एओसी-इन-सी के रूप में उनके नेतृत्व ने उनकी बहुमुखी और व्यावहारिक कमांड शैली को रेखांकित किया। जुलाई 1990 में उनकी सेवानिवृत्ति से पहले एयर मार्शल श्री रवींद्रनाथ भारद्वाज की विशेषज्ञता ने उन्हें महत्वपूर्ण स्टाफ नियुक्तियों तक भी पहुँचाया, जिसमें मुख्यतया:

  • एयर हेडक्वार्टर में फ्लाइंग के डायरेक्टर पद पर
  • 15 विंग के एयर ऑफिसर कमांडिंग का पद
  • नेशनल डिफेंस अकादमी, खड़कवासला के डिप्टी कमांडेंट और चीफ इंस्ट्रक्टर
  • स्वीडन में समर एयर कमांड में एयर ऑफिसर के पद पर रहकर कार्यरत रहे।

मन की बात अपनों के बीच, अपनों के साथ

वे लोगों की नजरों में कम ही आते थे और अपने करीबी दोस्तों और परिवार के साथ रहना पसंद करते थे। उनके जीवन और सेवा ने कई लोगों को प्रेरित किया है और उनके साथ सेवा करने वालों के दिलों और दिमागों पर एक अमिट छाप छोड़ी है।

यथार्थ जिसे स्वीकारना कठिन है

13 फरवरी 2024 को एयर मार्शल रवींद्रनाथ भारद्वाज ने अपनी अंतिम सांस ली और भारत की शारीरिक रूप से अलविदा कह दिया, जबकि वे अभी भी हम सभी के दिलों में विराजमान हैं। देश उनके इस विशेष योगदान हेतु सदैव ऋणी रहेगा। भारत माँ अपने ऐसे प्रिय पुत्रों को कभी विस्मृत नहीं कर सकती है।

हंस सोशल मैगजीन का उद्देश्य मात्र यही है कि पाठक इन निबंधों को पढ़कर देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत हो जाएँ और उन वीरों के बलिदानों को कभी न भूलें। हंस सोशल मैगजीन भारत के ऐसे वीर सपूतों को नमन करती है।

जय हिंद, जय भारत।

साहित्य शर्मा न्यासा
भीलवाड़ा, राजस्थान, भारत

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