वीरांगना नीरा आर्य
प्रिय पाठकों,
सप्रेम अभिवादन।

कैफे सोशल पत्रिका के पिछले संस्करण में आपने भारत माता की वीर वीरांगना नीरा आर्य की शौर्यगाथा पढ़ी थी कि उन्होंने कैसी विषम परिस्थितियों में नेताजी के नेतृत्व में देश सेवा करते हुए अंग्रेजी हुकूमत का डटकर सामना किया था।
उनका बचपन किस प्रकार बीता, उनका लालन-पालन कैसे हुआ, उन्होंने शिक्षा कैसे प्राप्त की—यह सब आपने पिछले अंक में पढ़ा था।
उनकी वीरता, साहस और निर्णय क्षमता की शेष कहानी…
एक अवसर पर उनके पति ने मौका देखकर नेताजी को मारने के लिए गोली चला दी, लेकिन वह नेताजी को न लगते हुए उनके ड्राइवर को जा लगी। उसी समय नीरा जी वहीं पर थीं। उन्होंने उसी क्षण बेझिझक अपने पति के पेट में संगीन (धारदार छुरी) घोंप दी, जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
जब इस बात का पता नेताजी को लगा, तो उन्होंने उन्हें “नीरा नागिनी” कहा था।
पति की हत्या के बाद नीरा को गिरफ्तार कर कलकत्ता जेल ले जाया गया, जहां उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि कलकत्ता जेल में हमें कोठरियों में रात 10:00 बजे बंद कर दिया जाता था, लेकिन चटाई, कंबल आदि कुछ भी नहीं दिया जाता था। मन में चिंता होती थी कि अभी यहां यह दशा है, तो जहां उन्हें भेजा जाना था, वहां गहरे समुद्र में स्थित अज्ञात द्वीप में रहते हुए स्वतंत्रता कैसे मिलेगी।
जब उन्हें कलकत्ता से अंडमान की जेल में ले जाया जा रहा था, तब लोहार ने हाथ-पैरों की बेड़ियां काटते समय न सिर्फ उनकी चमड़ी काट डाली, बल्कि हथौड़े से टांगों पर कई वार भी किए, जिससे नीरा आर्य दर्द से चिल्ला उठीं।
फिर जेलर ने कड़क आवाज में कहा कि यदि तुम बता दोगी कि नेताजी सुभाष कहां हैं, तो तुम्हें छोड़ देंगे। तब मैंने उनसे कहा कि सारी दुनिया जानती है कि वह हवाई दुर्घटना में चल बसे।
तब वह चिल्लाया और बोला, “झूठ बोलती हो तुम कि दुर्घटना में मर गए।”
तब मैंने कहा, “हां, नेताजी जिंदा हैं। मेरे दिल में जिंदा हैं।”
जब मैंने यह कहा, तो जेलर गुस्से में बोला, “तो तुम्हारे दिल से हम नेताजी को निकाल देंगे।”
यह कहते हुए उसने मेरे आंचल पर हाथ डाल दिया और लोहार की ओर संकेत किया। वह मेरे स्तन को काटने चला। जिस औजार से वह यह कर रहा था, उसमें धार नहीं थी। तब उसने स्तनों को दबाते हुए असहनीय पीड़ा दी और स्तन काट डाले।


स्वतंत्रता के बाद का जीवन
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। उन्होंने कभी भी कोई सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन हैदराबाद के फलकनुमा में फूल बेचकर व्यतीत किया।
वृद्धावस्था में बीमारी की हालत में चारमीनार के पास उस्मानिया अस्पताल में 26 जुलाई 1998 को इस वीर वीरांगना ने मृत्यु को आलिंगन कर लिया। देश में किसी को इनके बारे में कुछ भी पता नहीं लगा, यह बहुत शर्म की बात है।
नीरा आर्य पर बनी फिल्म
अब देश के सामने नीरा आर्य की वीरता और देशप्रेम की कहानी पर एक फिल्म बनाई गई है, जिसे कन्नड़ फिल्ममेकर रूपा अय्यर ने निर्देशित किया है तथा स्वयं अभिनय भी किया है। इस बायोपिक को नेशनल अवार्ड विजेता वरुण गौतम ने लिखा है।

कैफे सोशल पत्रिका ने नीरा आर्य की शौर्यगाथा पर आधारित इस फिल्म का प्रचार-प्रसार कर देशवासियों से इसे देखने का आह्वान किया है।

कैफे सोशल पत्रिका चाहती है कि अधिक से अधिक लोग इस फिल्म को देखकर वीरांगना नीरा आर्य से देश सेवा की प्रेरणा लें।
कैफे सोशल पत्रिका टीम देश की पहली महिला जासूस वीरांगना नीरा आर्य को शत्-शत् नमन करती है।




