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विश्व पर्यावरण दिवस विशेष -प्रकृति,संतुलन और संवेदनशील जीवन का आह्वान

मनीषा आवले चौगांवकर, दिल्ली
लेखिका, पर्यावरण एवं सामाजिक विषयों की चिंतक

सस्टेनेबिलिटी की ओर लौटते कदम “

—-धरती का तापमान बढ़ रहा है, ऋतुओं का संतुलन बिगड़ रहा है, नदियाँ सिकुड़ रही हैं और हवा में घुलता ज़हर अब केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों का विषय नहीं रहा।यह हमारे दैनिक जीवन का अनुभव बन चुका है। ऐसे समय में पर्यावरण दिवस मनाना केवल औपचारिक आयोजन भर नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सामूहिक जिम्मेदारी का अवसर बन गया है। आज आवश्यकता केवल पौधारोपण कर तस्वीरें साझा करने की नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक निर्णय में प्रकृति के प्रति संवेदनशील होने की है।

पर्यावरण: सह अस्तित्व की सनातन चेतना

—पर्यावरण केवल पेड़-पौधों, जल, वायु और भूमि का समूह मात्र नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण जीवन का आधार है। मनुष्य, प्रकृति और समस्त जीव-जगत के बीच संतुलित सह-अस्तित्व ही पर्यावरण का वास्तविक स्वरूप है। भारतीय सनातन संस्कृति में पर्यावरण को केवल संसाधन नहीं, बल्कि चेतना और देवत्व का स्वरूप माना गया है। यही कारण है कि यहां पृथ्वी को “माता”, नदियों को “देवी”, वायु को “प्राण” और वृक्षों को “जीवनदाता” कहा गया है।

सनातन धर्म का मूल भाव प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करना है। वेदों और उपनिषदों में प्रकृति के प्रत्येक तत्व के प्रति कृतज्ञता का संदेश मिलता है। ऋग्वेद में पृथ्वी से प्रार्थना की गई है।

“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”

अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।

भारतीय परंपरा में तुलसी, पीपल, वटवृक्ष, नदियाँ, पर्वत और पशु-पक्षियों तक को पूजनीय माना गया। यह पूजा केवल आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण की एक गहन सांस्कृतिक व्यवस्था थी। “अति सर्वत्र वर्जयेत्” और “सादा जीवन उच्च विचार” जैसे सूत्र संयमित उपभोग और संतुलित जीवनशैली की प्रेरणा देते हैं, जो आज के “सस्टेनेबल लिविंग” का मूल आधार हैं।

—भारतीय संस्कृति सदियों से सीमित संसाधनों में संतोष, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और संयमित उपभोग की दिनचर्या पर आधारित रही है एवं यही हमारी सभ्यता की पहचान हैं। किंतु आधुनिक उपभोगवाद, दिखावे की संस्कृति और अंधाधुंध संसाधन दोहन ने उस मूल चेतना से दूर कर दिया !विडंबना यह है कि जिस जीवनशैली को हमने पीछे छोड़ दिया आज वही “सस्टेनेबल लाइफस्टाइल” के नाम से वैश्विक समाधान के रूप में प्रस्तुत की जा रही है।

—-पर्यावरण संरक्षण अब सरकार,किसी एक तबके अथवा संस्था की जिम्मेदारी नहीं रह गई है। यह हमारे भोजन की थाली से लेकर यात्रा के साधनों तक, जल का उपयोग से और ऊर्जा की खपत तक हर छोटी बड़ी आदत से जुड़े प्रश्न है। आने वाली पीढ़ियों को केवल तकनीकी विकास नहीं, बल्कि स्वस्थ  पर्यावरण,जीने योग्य पृथ्वी सौंपना भी हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।

—–पृथ्वी हमें अपने पूर्वजों से मिली पर हमारे ऊपर आने वाली पीढ़ी का ऋण है! सोचकर देखिए कैसा होगा हमारे आने वाले बच्चों का जीवन यदि उन्हें सांस लेने के लिए भी दिन-रात मास्क लगाना पड़े? अब यहां प्रयास के नाम पर किसी प्रवचन,प्रदर्शन की नहीं, सहजता से कुछ छोटे प्रयास किए जाने चाहिए।

सतत जीवनशैली : छोटी आदतें, बड़ा बदलाव

पृथ्वी को बचाने के लिए बड़े अभियानों से अधिक आवश्यकता हमारी छोटी-छोटी आदतों में बदलाव की है। प्लास्टिक, रासायनिक उत्पादों और अनावश्यक उपभोग ने प्रकृति के संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है। ऐसे में रिसाइक्लिंग योग्य वस्तुओं को अपनाना, प्राकृतिक विकल्पों को प्राथमिकता देना, वस्तुओं का सीमित और गुणवत्तापूर्ण उपयोग करना तथा इलेक्ट्रॉनिक कचरे के प्रति सजग रहना आज समय की मांग है।अनावश्यक और कम गुणवत्ता का सामान ख़रीदने की अपेक्षा, कम और गुणवत्तापूर्ण ख़रीदारी होनी चाहिए।प्लास्टिक हमारे पर्यावरण और प्रकृति का सबसे बड़ा शत्रु है।प्लास्टिक और यूज एंड थ्रो जैसी वस्तुओं के स्थान पर बारंबार इस्तेमाल में आने वाले दूसरे विकल्पों को चुनें।

यूज एंड थ्रो जीवनशैली  जीवन को अंसतुलित कर रही है ।

डिस्पोजेबल संस्कृति, पैक्ड पानी और कृत्रिम सुविधा के नाम पर बढ़ता प्लास्टिक उपयोग न केवल प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि हमारी सेहत के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका है। माइक्रोप्लास्टिक का मानव रक्त और माँ के दूध तक में पाया जाना इस बात का संकेत है कि सुविधा और उपभोग की  आदतें धीरे-धीरे जीवन के मूल स्रोतों को ही विषाक्त बना रही हैं।समय की मांग है कि “यूज़ एंड थ्रो” की मानसिकता को छोड़कर पुनः उपयोग और संयमित जीवनशैली की ओर लौटें।

सतत जीवनशैली केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव भी है।

समाधान के दरवाजे पर विकल्पों की दस्तक

सुविधा और आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम एक समस्या का समाधान खोजते-खोजते अनजाने में दूसरी समस्या को जन्म दे जाते हैं। इसलिए विकल्प चुनते समय उसके दूरगामी परिणाम भी सोचना होगा।

     प्लास्टिक के विकल्प के रूप में बढ़ता पेपर स्ट्रॉ और टिशू पेपर का चलन भले ही पर्यावरण हितैषी प्रतीत हो, पर इनके पीछे पेड़ों की निरंतर कटाई और रासायनिक प्रक्रियाओं  का सच भी छिपा है।

सुविधा और आधुनिकता के नाम पर अपनायी गई “इस्तेमाल करो और फेंको” की संस्कृति ने हमें प्रकृति से दूर कर दिया है। आज आवश्यकता केवल नए विकल्प खोजने की नहीं, बल्कि उस पुरानी जीवनशैली को पुनः अपनाने की  है।बांस, मिट्टी, कपड़ा, स्टील और पत्तों से बने विकल्प केवल पर्यावरण हितैषी वस्तुएं नहीं, बल्कि टिकाऊ भविष्य की ओर बढ़ते छोटे किंतु महत्वपूर्ण कदम हैं।

प्रकृति हमें हर दिन यह याद दिलाती है कि विकास वही सार्थक है, जिसमें सुविधा के साथ संवेदना और उपभोग के साथ संतुलन भी बना रहे।

प्रकृति संरक्षण केवल “विकल्प” बदलने से नहीं, बल्कि अनावश्यक उपभोग को सीमित करने और पुनः उपयोग की संस्कृति अपनाने से संभव होगा। शायद समय हमें फिर उसी तत्वों  की ओर ओर लौटने का संकेत दे रहा है, जहां जल ,मिट्टी, कपड़ा और पुनः इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं जीवन का स्वाभाविक हिस्सा रही।

प्रकृति से जुड़ाव : संवेदनशील जीवन की ओर

आज का मनुष्य महानगरों की भीड़, कंक्रीट के जंगल और कृत्रिम जीवनशैली के बीच प्रकृति से दूर होता जा है।

पर्यावरण से संबंध केवल बड़े जंगलों या नदियों तक सीमित नहीं, बल्कि घर की छोटी-सी बालकनी, आंगन या छत से भी शुरू हो सकता है। अपने हाथों से मिट्टी को स्पर्श करना, पौधों को उगाना और बच्चों को प्रकृति के निकट लाना केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि संवेदनशील जीवनशैली की ओर एक कदम बढ़ाना है।आज के समय में भागदौड़, कृत्रिमता और मानसिक तनाव के बीच यदि अपने घर के किसी छोटे से कोने में एक फिश एक्वेरियम या छोटासा जल-सरोवर बनाते हैं, जिसमें रंग-बिरंगी छोटी मछलियाँ तैरती हों, कमल के फूल खिलते हों,तो यह संवेदनशीलता और प्रकृति से जुड़ने का एक सुंदर प्रयास बन सकता है।

 जब घरों में कृत्रिम रोशनी के बीच एक छोटा-सा जललोक बसता है, जहाँ मछलियाँ निश्चल भाव से तैरती हैं और कमल अपनी पंखुड़ियों में सौंदर्य समेटे खिलता है, ऐसे छोटे-छोटे प्राकृतिक तत्वों से मनुष्य अनायास ही प्रकृति के निकट लौटने लगता है। यही लौटना सस्टेनेबिलिटी का प्रथम स्पर्श है बल्कि स्थिरता की ओर लौटता एक भावनात्मक कदम भी है ।जहाँ मनुष्य फिर से प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व सीखने लगता है।

मिट्टी तनाव से मुक्त करने का काम करती है,आम दिनचर्या में बग़ीचे या किसी भी अन्य प्रकार से इससे जुड़े रहना चाहिए।धरती के साथ जुड़ाव ही वह संस्कार है, जो आने वाली पीढ़ियों को संतुलित और टिकाऊ भविष्य दे सकता है।

पेड़ लगाना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी उनका संरक्षण भी है। वृक्ष यक़ीनन हमसे बहुत कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन उनके पास वही भाषा नहीं है, जो कि हमारे पास है।  जरूरत इस बात की है कि हम ख़ुद को उनकी बात समझने के योग्य बनाएं। क्योंकि मनुष्य प्रकृति और प्राणिकी का सबसे बड़ा शत्रु बन गया है। वृक्षों के मानुषीकरण हमारे सनातन संस्कृति का हिस्सा रहे है। भारत में वृक्ष को मनुष्य तो क्या देवता तक माना जाता रहा है। देवों की तरह उन्हें पूजा जाता हैऔर यह कपोल-कल्पना भर नहीं है, किसी कविता का विषय नहीं है। वास्तव में पेड़ों के पास सचमुच का एक संचार तंत्र होता है ‌जिससे वो भूमि के ऊपर सामान्य साथ होते है पर जमीन के अंदर इसी माध्यम से जुड़े।आस-पास का वातावरण अर्थात् जल धरा प्राणी इसी के अंग है।

अन्न परमो ब्रह्म:!अपने बच्चों को शुरू से ही अन्न की अहमियत समझाएं, उन्हें भोजन व्यर्थ करने से रोकें। पसंदीदा हो या ना हो!

 कल की ख़ातिर :आज बदलनी होगी जीवनशैली

वर्तमान में सक्षमता और सुविधासंपन्न होने के अहंकार और छोटी-मोटी समस्याओं से अलग, प्रकृति के हित में कार्य करने की आवश्यकता है। चारदीवारी से पहले यह पृथ्वी हमारा घर है। और सस्टेनेबल जीवनशैली अपनाकर हम इस पृथ्वी को भी सतत स्थिरता प्रदान कर सकते हैं।

पर्यावरण संरक्षण केवल अभियानों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी के दैनिक व्यवहार और जीवनशैली से जुड़ा विषय है।उपभोग, भोजन की बर्बादी और सुविधा के नाम पर बढ़ती निर्भरता ने हमें प्रकृति से दूर कर दिया है। ऐसे में जरूरी है कि हम आने वाली पीढ़ियों को केवल संसाधन ही नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, संतुलन और जिम्मेदारी के संस्कार भी दें।

सस्टेनेबल जीवनशैली किसी बड़े त्याग का नाम नहीं, बल्कि छोटी-छोटी सजग आदतों का विस्तार है। मिट्टी, जल, अन्न और प्रकृति के प्रति आदर का भाव ही वह आधार है,।यदि हम सभी अपने जीवन में थोड़ा-सा परिवर्तन करने का संकल्प लें, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए  सांस लेने योग्य पृथ्वी अवश्य बचा सकते है।

—“अति सर्वत्र वर्जयेत्” भारतीय ज्ञान परंपरा का यह शाश्वत सूत्र आज के तकनीकी युग में पहले से अधिक प्रासंगिक हो उठा है। आधुनिकता और तकनीक जीवन को सहज बनाने के साधन अवश्य हैं, किंतु जब यही साधन प्रकृति, संवेदनाओं और संतुलन पर भारी पड़ने लगें, तब आत्ममंथन आवश्यक होता है।

आज मानव ने अंतरिक्ष की दूरियां नाप ली  पर  उपभोग की अंधी दौड़ में हम असंतुलित जीवनशैली के शिकार हो गए।यदि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और सांस लेने योग्य भविष्य देना है, तो केवल “सस्टेनेबिलिटी” शब्द जानना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारना होगा। क्योंकि प्रगति तभी सार्थक है, जब वह मानव और प्रकृति दोनों के अस्तित्व को साथ लेकर चले।

      मनीषा आवले चौगांवकर दिल्ली

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