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मुझसे शादी करोगी -सांत्वना पुरस्कार प्राप्त कहानी

राजभाषा हिंदी सम्मान प्रतियोगिता २०२४

कहने को तो बॉम्बे सपनों की नगरी है। दुनिया की हर सुख-सुविधा यहाँ मौजूद है। जी हाँ, वही मुंबई जहाँ लोगों के सपने साकार होते हैं और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने सपनों के पीछे भागते-भागते अंत में इस संसार से ही विदा हो जाते हैं। यह मायानगरी है, यहाँ की माया निराली है। कुछ लोग तो मालामाल हो जाते हैं, कुछ लोग कंगाल हो जाते हैं। इस नगरी का विचित्र रिवाज है—आकर्षण में यह रंभा और मेनका से कम नहीं है। जो भी इसका नाम सुनता है, इसके आकर्षण में बँधा चला आता है।

इसी नगरी में 30 साल पहले वैभव अपनी पत्नी को लेकर आया था। नई-नई शादी, नए-नए सपने थे। आईटी क्षेत्र की अच्छी नौकरी थी।

एक साल बाद उसके घर एक नन्हे मेहमान राघव ने जन्म लिया। वैभव की दुनिया में मानो सारे जहाँ की खुशियाँ समा गई थीं। दोनों पति-पत्नी बहुत खुश थे।

उसकी पत्नी सविता पढ़ी-लिखी और समझदार औरत थी। अपने पति और बच्चों का ख्याल रखती थी।

राघव ने कहा—
“मैं अपने बेटे को अपने से भी बड़ा इंजीनियर बनाऊँगा। आईटी के क्षेत्र में इसका बड़ा नाम होगा।”

सविता ने कहा—
“नहीं! मैं अपने बेटे को तुम्हारी तरह मशीन नहीं बनाऊँगी। इसे मैं प्रशासनिक अधिकारी बनाऊँगी।”

वैभव बोला—
“ठीक है, देखते हैं! बेटे में किसके गुण अधिक आते हैं।”

समय बीतता गया। वैभव को पदोन्नति मिलती गई। उसके पास अच्छा पैसा हो गया। उसने मुंबई में ही मकान खरीद लिया और सदा के लिए वहीं बस गया।

एक दिन सविता पति का इंतज़ार कर रही थी। तभी दरवाज़ा खटका और उसने आगे बढ़कर दरवाज़ा खोल दिया।

वैभव ने पूछा—
“क्या बात है? आज कुछ बेचैन दिख रही हो?”

उसने बैग एक ओर रखा और बोली—
“चाय पियोगे?”

वैभव ने शरारत से कहा—
“पिलाओगी तो पी लेंगे।”

वह चुपचाप किचन में चली गई और थोड़ी ही देर में दो कप चाय लेकर सामने सोफ़े पर बैठ गई।

वैभव ने कहा—
“क्या बात है? आज सरकार के तेवर बदले हुए लग रहे हैं। बेटे से झड़प हो गई क्या?”

सविता बोली—
“मज़ाक छोड़िए और मेरी बात सुनिए। राघव 27 साल का होने जा रहा है। अब उसे शादी कर लेनी चाहिए। हम कब तक उसकी बात मानते रहेंगे?”

वैभव ने समझाते हुए कहा—
“सविता! ज़माना बदल गया है। बच्चे बड़े हो जाते हैं तो हमें उनकी बात माननी पड़ती है।”

सविता चुपचाप सोने चली गई, पर नींद उससे कोसों दूर थी।

वह सोचने लगी—देखते-देखते 30 साल कैसे निकल गए। इन वर्षों में ज़माना बदल गया। संसार ने कोरोना जैसी महामारी भी देखी और उसके बाद के बदलाव भी। इंसान मशीन बन गया है। खाने, सोने, काम करने—सबके तरीके बदल गए हैं। इंटरनेट, लैपटॉप और मोबाइल जीवन का अभिन्न अंग बन गए हैं।

आज अर्थयुग और मशीनी युग में पति-पत्नी दोनों कमाते हैं। बच्चों को समय नहीं मिलता। मोबाइल उनका साथी बन जाता है। इंटरनेट के माध्यम से वह सब खुलेआम परोसा जा रहा है जो कभी गुप्त ज्ञान कहलाता था। परिणामस्वरूप मानसिकता विकृत हो रही है।

आज सीरियल और फ़िल्मों में खुलेआम गालियाँ, हिंसा और अश्लीलता दिखाई जाती है। यह सब देखकर भावी पीढ़ी क्या सीखेगी? क्या यह वही देश है जहाँ राम, कृष्ण, गौतम और महावीर की शिक्षाएँ दी जाती थीं? जहाँ सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता था?

सोचते-सोचते उसकी आँख लग गई।

कुछ दिन बाद तीनों साथ खाना खा रहे थे। सविता ने कहा—
“बेटा, अब तुम्हें अपना घर बसा लेना चाहिए।”

राघव बोला—
“मम्मी! 30 का हुआ हूँ, बूढ़ा नहीं। अभी मुझे करियर बनाना है। विदेश जाना है। मैं शादी नहीं कर सकता।”

राघव पिछले तीन वर्षों में तीन बार विदेश जा चुका था। अब उसे वहीं बसने का सपना था।

इसी बीच सविता को तेज बुखार हुआ। जाँच के बाद डॉक्टर ने कहा—
“आपकी पत्नी को लास्ट स्टेज का कैंसर है।”

यह सुनकर वैभव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सविता ने भी रिपोर्ट पढ़ ली। इलाज शुरू हुआ, पर लाख कोशिशों के बावजूद सविता बच न सकी।

एक दिन वह इस संसार से विदा हो गई।

घर अस्त-व्यस्त हो गया। राघव ब्रेड-बटर और नूडल्स पर जीवन चला रहा था। वैभव का मन घर में नहीं लगता था। पाँच साल बीत गए।

एक दिन वैभव ने कहा—
“बेटा, अब तुम्हें शादी करनी ही होगी।”

राघव बोला—
“पापा, मुझे सर्विस वाली लड़की चाहिए। आजकल की लड़कियाँ घर नहीं संभालतीं।”

वैभव ने कहा—
“हमें पैसे की नहीं, घर को घर बनाने वाली गृहलक्ष्मी चाहिए।”

आखिरकार राघव मान गया।

भोपाल में एक लड़की—मंजू—देखी गई। संस्कारी, शिक्षित, शांत स्वभाव की। पर राघव टालता रहा।

एक दिन झुंझलाकर राघव बोला—
“आपको उस लड़की की इतनी चिंता है तो आप ही उससे शादी कर लीजिए!”

ये शब्द वैभव के दिल में हथौड़े की तरह लगे।

रातभर वह सोचता रहा। सुबह उसने मंजू को फोन किया।

“क्या आप मुझसे शादी करेंगी?”

दो दिन बाद मंजू का फोन आया। मुलाक़ात तय हुई।

रेस्टोरेंट में दोनों आमने-सामने बैठे थे। सन्नाटा पसरा था।

मंजू बोली—
“मैं शादी के लिए तैयार हूँ, पर मेरी दो शर्तें हैं।”

“मेरे पापा को कैंसर है। उनका ऑपरेशन करवाना होगा। और मेरे भाई की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी आपको लेनी होगी।”

वैभव ने उसकी ओर देखा। उसे वह किसी देवी से कम नहीं लगी।

उसने शांत स्वर में कहा—
“शादी के बाद तुम्हारा परिवार मेरा परिवार होगा। हम मिलकर दोनों परिवारों की ज़िम्मेदारी निभाएँगे। तुम्हारे भाई मोहित और मेरे बेटे राघव—दोनों का भविष्य संवारना है।”

यह कहते हुए वैभव ने अपना हाथ मंजू के हाथ पर रख दिया।
मंजू ने धीरे से उसकी ओर देखा और उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

डॉ. सुधा चौहान राज
इंदौर

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