शूरवीरो की गाथा

गुमनाम नायक – छोटानागपुर केसरी बाबू रामनारायण सिंह

कैफे सोशल मासिक पत्रिका में हम अपने उन महान नायकों को याद करते आ रहे हैं जिन्होंने देश को स्वतंत्र कराने और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। इस अंक में हम एक ऐसे नायक के विषय में जानने का प्रयास कर रहे हैं जो न केवल स्वतंत्रता सेनानी थे बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता के साथ राजनीतिज्ञ भी थे। वे थे बाबू रामनारायण सिंह जी।


उन्हें छोटा नागपुर केसरी या फिर छोटा नागपुर के शेर के रूप में जाना जाता था।

बाबू रामनारायण सिंह जी का जन्म १९ दिसंबर १८८४ को तेतरिया गांव,चतरा जिला बिहार (अब झारखंड) में हुआ था। उनके पिता का नाम भोली सिंह था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा तेतरिया गांव में हुई थी, उसके बाद आगे की पढ़ाई सेंट जेवियर्स कॉलेज कलकत्ता से कर कानून की डिग्री हासिल की। इसके बाद वह वकालत करने लगे।

सन् १९२० में महात्मा गांधी ने अहिंसात्मक असहयोग आंदोलन का आह्वान किया जिसमें विशेष रूप से वकीलों और विधार्थियों से सक्रिय सहयोग की अपील की थी।

गांधी जी के आह्वान पर उन्होंने वकालत छोड़ कर देश सेवा करने का प्रण लेकर कांग्रेस से जुड़ गए। यहां पर उनका सम्पर्क कृष्ण बल्लभ शाह, राजवल्लभ सिंह, बद्री सिंह जैसे युवा नेताओं से हुआ और इन्हीं लोगों के साथ मिलकर असहयोग आंदोलन में भाग लिया। सन् १९२१ में अंग्रेजों ने उन्हें १ महीने के लिए जेल भेज दिया। सन् १९३१ से सन् १९३९ तक जेल यात्रा करनी पड़ी, इस दौरान उन्हें बड़ी बेरहमी और कष्ट दिए गए।सन् १९४१-४२ में महात्मा गांधी की बिहार यात्रा में वह अन्य प्रमुख नेताओं के साथ शामिल हुए। बाद में वे हजारी बाग जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने जहां पर उन्हें राजेंद्र प्रसाद, जय प्रकाश नारायण जैसे अनेक राष्ट्रीय नेताओं के साथ काम करने का अवसर मिला। सन् १९४२ में भारत छोड़ो आंदोलन के समय उन्हें गिरफ्तार कर हजारीबाग केंद्रीय कारागार भेज दिया गया। दीपावली की रात में वह अन्य क्रांतिकारियों के साथ वहां से भागने में सफल रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उन्होंने कांग्रेस पार्टी से खुद को अलग कर लिया और सन 1951 में छोटा नागपुर संथाल परगना जनता पार्टी बनाई और हजारीबाग पश्चिम से लोकसभा चुनाव जीता।

बाबू रामनारायण सिंह ही वह पहले नेता थे जिन्होंने अलग झारखंड राज्य की स्थापना के लिए आवाज उठाई थी। वह डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पसंदीदा नेताओं में से एक थे वह उनके साथ कश्मीर दौरे पर भी गए थे। उन्होंने सन 1947 में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के सक्रिय सदस्य होने के साथ इसे पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सामाजिक सुधार आंदोलन के लिए ओपन माझी, बंगमा माझी जैसे संथाल नेताओं के साथ मिलकर बहुत काम किया।

उन्होंने अपना स्वराज लुट गया नामक पुस्तक की रचना भी की थी जो उनकी निर्भरता एवं जागरूकता की कहानी को बयां करती है। वही 1927से 1946 तक केंद्रीय विधानसभा के सदस्य के रूप में अपने विचारों से राष्ट्रवाद की धारा प्रभावित करते रहे थे। 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की प्रथम कार्रवाई हुई उसमें सदस्य के रूप में पंचायती राज, शक्तियों का विकेंद्रीकरण, मंत्री और सदस्यों का अधिकतम वेतन ृ500 करने की वकालत की थी।

उन्होंने जून १९६४ में अंतिम सांस ली।
कैफे सोशल उन्हें शत् शत् नमन करता है।

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