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स्वदेशी यात्री विमान निर्माण की दिशा में भारत

महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी
भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में ‘राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली’ में कार्यरत

भारत के नागरिक उड्डयन मंत्री द्वारा हाल ही में की गई यह घोषणा कि देश अगले 2 वर्षों के भीतर अपना पहला स्वदेशी वाणिज्यिक यात्री विमान तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, भारत के औद्योगिक और तकनीकी परिदृश्य में एक युगांतरकारी कदम है। यह उद्घोषणा केवल एक नई औद्योगिक परियोजना की शुरुआत मात्र नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बहुत बड़ा और साहसिक संकल्प है। वर्तमान में वैश्विक यात्री विमान निर्माण उद्योग पर मुख्य रूप से केवल 2 विदेशी कंपनियों, अमेरिका की बोइंग और यूरोप की एयरबस, का पूर्ण एकाधिकार है। पूरी दुनिया की हवाई यातायात कंपनियां अपने विमानों के बेड़े के विस्तार और नवीनीकरण के लिए पूरी तरह से इन्हीं 2 निर्माताओं पर निर्भर हैं। इस असीमित निर्भरता के कारण नए विमानों की आपूर्ति में भारी देरी होती है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी प्रकार की बाधा आने पर पूरे विश्व का विमानन तंत्र बुरी तरह से प्रभावित होता है। ऐसे परिदृश्य में भारत द्वारा अपना स्वयं का यात्री विमान विकसित करने का दृढ़ निर्णय इस वैश्विक एकाधिकार को तोड़ने और एक नया, सुलभ तथा किफायती विकल्प प्रस्तुत करने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहल है।

Airbus completes 16th C295 delivery to IAF, India to build 40
SARAS MK II prototypes, ETInfra

आज भारत विश्व का सबसे तेजी से उभरता हुआ नागरिक उड्डयन बाजार बन चुका है। देश के भीतर हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। मध्यम वर्ग के तीव्र विस्तार, बढ़ती आर्थिक क्षमता और हवाई यात्रा के प्रति आम जनमानस की बढ़ती पहुंच के कारण देश की विमानन कंपनियों ने अपने ढांचे को विस्तृत करने के लिए अप्रत्याशित स्तर पर नए विमानों की खरीद के ऐतिहासिक समझौते किए हैं। हाल के वर्षों के आंकड़ों का मूल्यांकन करें तो ज्ञात होता है कि भारतीय विमानन कंपनियों ने 1600 से अधिक नए यात्री विमानों की खरीद के आदेश दिए हैं, जिनका कुल वित्तीय मूल्य अरबों रुपये से भी अधिक आंका गया है। यदि भारत अपने स्वयं के यात्री विमानों का निर्माण करने में पूर्णतः सक्षम हो जाता है, तो देश की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा की भारी बचत होगी और देश का पैसा देश के भीतर ही रहेगा। इसके अतिरिक्त, जिस तीव्र गति से देश में हवाई अड्डों की संख्या बढ़ रही है, उसे देखते हुए स्वदेशी विमानों की आवश्यकता और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। पिछले एक दशक में देश में छोटे और बड़े हवाई अड्डों की संख्या 74 से बढ़कर 160 के पार पहुंच गई है और सरकार की योजना आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय संपर्क योजना के अंतर्गत इसे और भी अधिक विस्तृत करने की है। इतने बड़े और व्यापक बुनियादी ढांचे के सुचारू संचालन के लिए देश को विमानों की निरंतर आवश्यकता होगी, जिसकी पूर्ति स्वदेशी निर्माण से ही स्थायी और निर्बाध रूप से की जा सकती है।

स्वदेशी विमान निर्माण की रूपरेखा और इसके व्यावहारिक पहलुओं पर विचार करें तो यह स्पष्ट होता है कि यह लक्ष्य अत्यंत जटिल है और इसे रातोंरात प्राप्त नहीं किया जा सकता। उड्डयन प्रौद्योगिकी अत्यंत संवेदनशील होती है, जहां त्रुटि की कोई गुंजाइश नहीं होती। हालांकि, भारत ने इस दिशा में अपना वैमानिकी आधारभूत ढांचा और एक मजबूत औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना आरंभ कर दिया है। सरकार की दूरदर्शी योजना है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना को किसी अंतरराष्ट्रीय संयुक्त उद्यम के माध्यम से धरातल पर उतारा जाए। भारत के पास रक्षा क्षेत्र में सैन्य विमानों और हेलीकॉप्टरों के निर्माण का दशकों पुराना और समृद्ध अनुभव है। वर्तमान समय में गुजरात राज्य के वडोदरा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण परियोजना के तहत उन्नत सैन्य परिवहन विमानों का निर्माण किया जा रहा है। इस तरह की विशाल परियोजनाओं से देश में उच्च स्तरीय वैमानिकी अभियांत्रिकी, विमान के कलपुर्जों के निर्माण की आपूर्ति श्रृंखला और अत्यंत कुशल एवं प्रशिक्षित कार्यबल का एक बहुत ही मजबूत आधार तैयार हो रहा है। यही आधारभूत ढांचा और रक्षा क्षेत्र का अनुभव भविष्य में नागरिक यात्री विमानों के निर्माण में एक मील का पत्थर साबित होगा। वैमानिकी क्षेत्र में एक सशक्त औद्योगिक ढांचा तैयार होने से देश के भीतर ही हजारों सूक्ष्म, लघु और मध्यम दर्जे के उद्यमों को भी भारी बढ़ावा मिलेगा, जो इन विशाल विमानों के लिए आवश्यक छोटे कलपुर्जे, तार और तकनीकी प्रणालियां बनाएंगे।

यद्यपि यह राष्ट्रीय संकल्प अत्यंत उत्साहवर्धक है, लेकिन इसके मार्ग में कई अत्यंत गंभीर चुनौतियां भी विद्यमान हैं। किसी भी नए वाणिज्यिक यात्री विमान का निर्माण करने से भी अधिक जटिल कार्य उसकी उड़ान सुरक्षा को प्रमाणित करना होता है। नागरिक उड्डयन क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानक अत्यंत कठोर और समझौताहीन होते हैं। किसी भी नए विमान को आम यात्रियों को ले जाने की अनुमति प्राप्त करने से पूर्व राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विमानन सुरक्षा नियामक एजेंसियों से अनेक प्रकार के कठिन सुरक्षा परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। इस संपूर्ण प्रमाणन प्रक्रिया में ही कई वर्षों का समय लग सकता है। दुनिया के अन्य विकसित देशों का अनुभव भी यही प्रमाणित करता है कि एक नया वाणिज्यिक विमान पूर्ण रूप से विकसित करने और उसे व्यावसायिक रूप से आकाश में उड़ान भरने के योग्य बनाने में एक दशक से भी अधिक का समय लग जाता है। विमान के शक्तिशाली इंजन का निर्माण, उसकी वायुगतिकीय संरचना, उन्नत तकनीकी प्रणालियां और आपातकालीन सुरक्षा उपाय, ये सभी तत्व अत्यंत उच्च कोटि की वैज्ञानिक विशेषज्ञता और निरंतर अनुसंधान की मांग करते हैं। भारत को इन सभी तकनीकी मोर्चों पर अपनी क्षमता को सिद्ध करना होगा।

इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, भारत का वर्तमान दृष्टिकोण अत्यंत रणनीतिक, संतुलित और व्यावहारिक है। विदेशी तकनीकी सहयोग और पूर्व में स्थापित सफल संरचनाओं के आधार पर किसी संयुक्त उद्यम के माध्यम से आगे बढ़ने से अनुसंधान और विकास में लगने वाले बहुमूल्य समय और अपार धन दोनों की भारी बचत की जा सकती है। इसके साथ ही, भारत के पास एक विशाल और अत्यंत प्रतिभावान युवा वैज्ञानिक शक्ति है, जो कंप्यूटर प्रोग्रामिंग और अभियांत्रिकी के विविध क्षेत्रों में अपनी श्रेष्ठता की वैश्विक पहचान पहले ही बना चुकी है। आधुनिक युग के विमानों का एक बहुत बड़ा हिस्सा कंप्यूटर आधारित प्रणालियों और उन्नत नियंत्रण उपकरणों पर निर्भर करता है, और इस विशिष्ट क्षेत्र में भारत की स्वाभाविक विशेषज्ञता इस स्वदेशी विमान परियोजना के लिए एक बहुत बड़ा और निर्णायक लाभ सिद्ध होगी।

C-295 assembly facility in Vadodara illustrates aircraft assembly, engineering and India’s growing aerospace manufacturing capabilities.

आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो स्वदेशी वाणिज्यिक विमान का निर्माण देश में व्यापक स्तर पर रोजगार सृजन का एक बहुत बड़ा स्रोत बनेगा। अनुसंधान, रूपरेखा निर्माण, विनिर्माण, तकनीकी परीक्षण और भविष्य में इन विमानों के रखरखाव के स्तर पर लाखों नए और उच्च कौशल वाले रोजगार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अवसर उत्पन्न होंगे। इससे देश की औद्योगिक उत्पादन क्षमता में भारी वृद्धि होगी और समग्र विनिर्माण क्षेत्र को एक नई और अभूतपूर्व गति मिलेगी। जब भारत पूर्ण रूप से अपना यात्री विमान बनाने में सफल हो जाएगा, तो यह न केवल हमारी असीमित घरेलू जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि भविष्य में विकासशील देशों और विश्व के अन्य राष्ट्रों के लिए भी किफायती विमानों का एक प्रमुख निर्यातक देश बन सकता है। यह भारत की वैश्विक छवि को एक आयातक देश से बदलकर एक उच्च तकनीकी निर्यातक देश के रूप में स्थापित करेगा।

निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि यह पहल केवल एक परिवहन साधन के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की उस अनंत आकांक्षा का स्पष्ट प्रतीक है, जो उसे एक पूर्ण रूप से विकसित, सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में स्थापित करना चाहती है। यह पूरी परियोजना देश की अर्जित तकनीकी संपदा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और दृढ़ औद्योगिक इच्छाशक्ति का जीवंत प्रमाण होगी। यदि भारत अपने इस निर्धारित लक्ष्य को समयबद्ध तरीके से प्राप्त करने में सफल रहता है, तो वह दिन बिल्कुल भी दूर नहीं, जब दुनिया के विशाल आकाश में भारत की भूमि पर निर्मित यात्री विमान पूरे गर्व और शान से उड़ान भरेंगे। इसके साथ ही वैश्विक उड्डयन मानचित्र पर भारत का नाम मात्र एक उपभोक्ता के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रमुख और सक्षम निर्माता के रूप में स्वर्ण अक्षरों में अंकित होगा। यह संपूर्ण देशवासियों के लिए अत्यंत गर्व, स्वाभिमान और राष्ट्रीय उपलब्धि का एक ऐतिहासिक क्षण होगा।

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