रेल की रगों में दौड़ती संचार व्यवस्थाके मजबूत प्रहरी परमानंद शर्मा

रेलवे जैसे विशाल और जटिल तंत्र को सुचारु रूप से चलाने के लिए जितना जरूरी इंजन, पटरियां और डिब्बे हैं, उतनी ही आवश्यक है – संचार व्यवस्था। ट्रेनें समय पर चलें, स्टेशन मास्टर एक-दूसरे से जुड़ें, सिग्नलिंग में त्रुटि न हो, किसी आपात स्थिति में तत्काल सूचनाएं जाएं – यह सब रेलवे टेलीकॉम विभाग की रीढ़ से ही संभव हो पाता है।
ट्रैक पर गाड़ियों की आवाजाही जितनी निर्बाध लगती है, उसके पीछे 24/7 संचार निगरानी और तकनीकी दखल की मेहनत होती है। टेलीकॉम विभाग ही वह इकाई है, जो रेलवे के हर स्टेशन, कंट्रोल रूम और फील्ड ऑपरेटर को आपस में जोड़ती है – सुरक्षा, समन्वय और समय की कसौटी पर खरा उतरते हुए।
इस अहम जिम्मेदारी को सालों तक निभाने वाले व्यक्ति हैं – परमानंद शर्मा, जिनकी भूमिका ने अनगिनत यात्रियों की सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित की है, पर हमेशा पर्दे के पीछे रहकर।
कर्तव्य की पटरियों पर चलता एक कर्मयोगी
परमानंद शर्मा रेलवे टेलीकॉम विभाग में वर्षों तक फील्ड और वायरिंग सेक्शन में तैनात रहे। चाहे सर्दी की कड़कड़ाती रात हो या गर्मी की चिलचिलाती दोपहर, जब कभी सिग्नल या कम्युनिकेशन लाइन में कोई गड़बड़ी आती, शर्मा जी सबसे पहले मौके पर पहुंचते। ट्रेनें रुकी रहें, यह उन्हें मंजूर नहीं था। हर तार, हर कनेक्शन में उन्हें जैसे अपनी जिम्मेदारी की डोर दिखती थी।
“रेलगाड़ी के हर पहिए को अगर वक्त पर घुमाना है, तो संचार को हर पल जिंदा रखना होता है।”

उनकी ड्यूटी का कोई निश्चित समय नहीं था – न दिन, न रात। जब भी रेलवे की आवाजाही में कोई रुकावट आती, शर्मा जी ड्यूटी पर तैनात पाए जाते। तकनीकी ज्ञान, तेज निर्णय क्षमता और शांत व्यवहार की वजह से वे केवल विभाग में ही नहीं, वरिष्ठ अधिकारियों के बीच भी सम्मानित रहे।
एक समर्पित कर्मयोगी का पारिवारिक और सामाजिक जीवन
पेशेवर जीवन जितना व्यस्त रहा, व्यक्तिगत जीवन उतना ही जिम्मेदार। बचपन में पिता का साया उठ गया, फिर भी उन्होंने समाजशास्त्र में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। परिवार की जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाया – मां का सम्मान, छोटे भाई की मदद और बच्चों की परवरिश को पत्नी रीता कुमारी के साथ मिलकर सहेजा।
रीता जी ने घरेलू मोर्चा पूरी समझदारी से संभाला, जिससे परमानंद जी पूरी निष्ठा से अपने रेलवे कर्तव्यों में लगे रहे। उनकी पुत्री की शादी हो चुकी है और पुत्र अच्छे पद पर कार्यरत हैं – ये उनके संतुलित जीवन के साक्ष्य हैं।
“कर्तव्य का बोझ तब हल्का लगता है, जब परिवार की नींव मजबूत होती है।”
साधना, सेवा और संवेदना का संगम
सेवानिवृत्ति के बाद भी परमानंद शर्मा सामाजिक कार्यों से जुड़े हैं। जरूरतमंदों की मदद करना, आध्यात्मिक चिंतन में समय देना और नई पीढ़ी को अच्छे मूल्यों की शिक्षा देना – आज भी उनके जीवन का हिस्सा है। वे मानते हैं कि रिश्तों में संवाद और समझ जरूरी है, तकनीक नहीं।
“ईश्वर सब देखता है – यही सोचकर जियो, और फिर तुमसे कभी गलती नहीं होगी।”
नव पीढ़ी के लिए संदेश
परमानंद जी का स्पष्ट संदेश है:
“परिश्रम से मत घबराओ, विकल्प खोजो, और सच्चे मन से आगे बढ़ो।”
उनका जीवन दर्शाता है कि एक साधारण नौकरी करने वाला व्यक्ति भी देश की प्रगति में असाधारण भूमिका निभा सकता है, अगर वह अपने कार्य और जीवन मूल्यों को ईमानदारी से निभाए।
रेलवे नेटवर्क में हजारों किलोमीटर की दूरी पर फैले स्टेशन, ट्रेनें और कंट्रोल रूम – ये सभी एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं केवल सशक्त संचार प्रणाली के माध्यम से। परमानंद शर्मा जैसे तकनीकी कर्मयोगी ही इन कड़ियों को मजबूत रखते हैं। उनके कार्य की वजह से दूर-दराज के स्टेशनों पर होने वाली गड़बड़ियों की जानकारी मुख्यालय तक तुरंत पहुँचती है और आवश्यक कदम तुरंत उठाए जा सकते हैं। यह न केवल ट्रेन संचालन को सुरक्षित बनाता है, बल्कि यात्रियों को भी भरोसा देता है कि वे सही हाथों में हैं।
रेलवे में कोई भी तकनीकी खराबी केवल देरी नहीं, बल्कि संभावित दुर्घटनाओं का कारण भी बन सकती है। ऐसे में जब सिग्नलिंग प्रणाली या वायरिंग में फॉल्ट आता है, तो परमानंद शर्मा जैसे अनुभवी तकनीशियन अपनी सूझबूझ और तत्परता से हालात को संभालते हैं। बगैर शोर के, बिना लाइमलाइट के, वे ऐसी तकनीकी विफलताओं को समय रहते ठीक कर यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। वास्तव में, आपात स्थिति में ये मूक रक्षक ही असली हीरो साबित होते हैं।
रेलवे जैसी संस्था में कार्य करना केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि सघन अनुशासन और सेवा भाव का समर्पण है। परमानंद शर्मा की दिन-रात की ड्यूटी, तकनीकी दक्षता और धैर्य यह दर्शाते हैं कि कैसे किसी एक कर्मचारी की निष्ठा, हजारों लोगों की यात्रा को सरल और सुरक्षित बना सकती है। उन्होंने न केवल वायरिंग और नेटवर्किंग के क्षेत्र में विशेषज्ञता दिखाई, बल्कि युवा तकनीशियनों को प्रशिक्षित कर एक सशक्त टीम भी तैयार की। यह दर्शाता है कि वे केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक व्यवस्था निर्माता हैं।
“नींव के पत्थर दिखाई नहीं देते, पर पूरी इमारत उन्हीं पर टिकी होती है – परमानंद शर्मा भी उन्हीं में से एक हैं।”




