Satire

गुरुजी, आपने तब अपनी मंशा क्यों नहीं बताई!

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, राजस्थान

एक खबर अखबार की सुर्खी बनी कि गुरुजी ने परीक्षा में एक बच्चे को नकल करने से रोक दिया। बच्चा आहत हुआ और उसने आत्महत्या कर ली। पूरे मामले ने बाद में जातिगत भेदभाव के मुद्दे का रूप ले लिया। खबर पढ़कर मैं भीतर तक ठगा-सा रह गया। जीवन में पहली बार लगा कि हमारे गुरुजी ने हमारे साथ कितनी बड़ी नाइंसाफी की थी। वे हमें पीटते रहे, मुर्गा बनाते रहे, कान ऐंठते रहे, पूरी कक्षा के सामने हमारी बौद्धिक प्रतिष्ठा का पंचनामा करते रहे, मगर एक बार भी उन्होंने यह नहीं बताया कि वे ऐसा किस सामाजिक, राजनीतिक अथवा जातिगत मंशा से कर रहे हैं। हम बेचारे सारी कुटाई को शिक्षा और संस्कार हमारे भीतर कूट-कूटकर भरने की उनकी मंशा ही समझते रहे।

हमारे जमाने में पिता बच्चे को स्कूल में दाखिल नहीं कराते थे, लगभग गुरुजी के हवाले कर आते थे—“यो आपको ही बच्चा है, आप ही याके माई-बाप अब। चाहे पीटो, कूटो, कुछ भी करो, लेकिन बनिया के बैल से इंसान बनाय देयो याय।” यानी एक बाप बाकायदा अपने बापपन की शक्तियाँ दूसरी जगह हस्तांतरित करके आता था।

गुरुजी भी दूसरे बाप होने का फर्ज पूरी ईमानदारी से निभाते थे। कुटाई का काम घर से स्कूल में ट्रांसफर हो गया था। बस इतना फर्क पड़ा कि घरवाले बिना किसी पाठ्यक्रम के कूटते थे और गुरुजी पाठ्यक्रमानुसार।

कुटाई का बाकायदा पाठ्यक्रम निश्चित था। गणित का सवाल गलत होने पर दो उँगलियों के बीच पेंसिल डालकर दबाना, हिंदी में मात्रा गलत हुई तो कान मरोड़ना, भूगोल में नदियाँ उलटी बहा दीं तो मुर्गासन। परीक्षा में दूसरे की कॉपी की तरफ गर्दन भी घुमाई तो गुरुजी ऐसी खा जाने वाली नजरों से देखते कि हमारी टीपने की मंशा उनकी नजरों के सामने ही धराशायी हो जाती। हमें तब यह समझ नहीं आता था कि यह अनुशासन था, शिक्षा थी या हमारी भावनाओं पर कोई योजनाबद्ध हमला।

एक बार गुरुजी ने मुझे बड़ी श्रद्धा से कूटा। मैं रोता-बिलखता घर पहुँचा। बड़ी हिम्मत करके बोला—“आज गुरुजी ने बहुत मारा।”

पिताजी ने आव देखा न ताव। गुरुजी की श्रद्धा में जो थोड़ी-बहुत कमी उन्हें दिखाई दी, उसे उन्होंने वहीं पूरा कर दिया।

अगले दिन मुझे साथ लेकर स्कूल पहुँचे। मैं समझ रहा था कि अब गुरुजी की शिकायत होगी। पिता ने गुरुजी से कहा—“मास्साब, ढंग से नहीं की कुटाई! मुझे घर पर पूरी करनी पड़ी।”

उस समय हमारे मानवाधिकार शायद छुट्टी पर रहते थे।

गुरुजी ने कभी बताया ही नहीं कि यार, हम इसलिए कूट रहे हैं कि तुम्हारी भावना आहत हो। हम जानते ही नहीं थे कि भावना किस चिड़िया का नाम है। हम तो कूटे जाने के बाद बस यही प्रार्थना करते थे कि अब गुरुजी घर पर न बता दें, वरना वहाँ इससे भी ज्यादा कुटाई होगी।

जाति-वाति कभी दिमाग में घुसी ही नहीं। हमें तो लगता था कि गुरुजी की जाति चाहे कुछ भी हो, वे केवल एक ही जाति के विद्यार्थियों से विशेष नाराज रहते थे—नालायक विद्यार्थी। उसमें हम सब बराबर के सदस्य थे। बनिया हो, ब्राह्मण हो, गुर्जर हो, मीणा हो, जाट हो या कोई और। उनका डंडा धर्मनिरपेक्ष था, कान पकड़ने की नीति सर्वसमावेशी और मुर्गा बनाने की योजना में सौ प्रतिशत समान अवसर था।

लेकिन अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि हम कितने अनभिज्ञ थे। संभव है गुरुजी के भीतर कोई गहरी जातिगत योजना रही हो और हमें पता ही न चला हो! मैं बनिया था और गुरुजी दूसरी जाति के थे। हो सकता है वे मुझे इसीलिए पीटते रहे हों कि मैं बनिया हूँ। मगर मुझे अब याद आ रहा है कि मेरे साथ जिस लड़के को उन्होंने अगले पीरियड में मारा था, वह गुरुजी की ही जाति का था। अब उसका क्या करें? शायद वह सबूत मिटाने के लिए मारा गया होगा।

हम तब इतने सीधे थे कि कारण ढूँढ़ने के बजाय अपनी गलती ढूँढ़ते थे। गुरुजी ने थप्पड़ मारा तो हम सोचते—“मैंने क्या गलत किया?” आज का समझदार विद्यार्थी पूछ सकता है—“गुरुजी ने मुझे ही क्यों मारा?” इन दोनों प्रश्नों के बीच ही शायद पूरा युग बदल गया है।

काश, हम आज के जमाने में पढ़े होते!

गुरुजी परीक्षा में नकल करने से रोकते तो सबसे पहले मोबाइल निकलता। आधा मिनट का वीडियो बनता—“देखिए दोस्तों, मेरे साथ अभी क्या हुआ!” उसके बाद हैशटैग बनता, दो-चार संगठन सक्रिय होते, स्कूल के गेट पर धरना होता। गुरुजी का पुराना फेसबुक खंगाला जाता और पता लगाया जाता कि सन् 2012 में उन्होंने किस पोस्ट को लाइक किया था। फिर उस लाइक के सहारे उनकी वर्तमान मंशा का ऐतिहासिक विश्लेषण किया जाता।

हम भी दो-चार रील बनाते। एक स्लो मोशन में—मैं उदास चेहरा लिए स्कूल के गेट से निकल रहा हूँ। पीछे कोई भावुक संगीत चलता। दूसरी रील में कैप्शन होता—“मेरी गलती सिर्फ इतनी थी कि मैं…” आगे जो सबसे अधिक वायरल होने योग्य पहचान होती, वह भर देते।

दो दिन में हम विद्यार्थी से पीड़ित पक्ष बन जाते। पढ़ाई पीछे छूट जाती, मगर फॉलोअर्स बढ़ जाते। गुरुजी के पढ़ाए अध्याय पर जीवन भर पाँच सौ व्यू न आए हों, मगर गुरुजी के खिलाफ हमारी रील पाँच लाख पार कर जाती।

गुरुजी, बड़ा धोखा हुआ हमारे साथ। आपने कभी बताया ही नहीं कि आप हमें मानसिक दबाव में लाने के लिए डाँट रहे थे, हमें अपमानित करने के लिए कान पकड़वा रहे थे और परीक्षा में नकल से रोककर हमारे अधिकारों का उल्लंघन कर रहे थे! हम तो मूर्ख थे कि इसे पढ़ाई का हिस्सा समझते रहे।

आपको भी आज के शिक्षक की तरह कक्षा में प्रवेश करते समय बाकायदा डिस्क्लेमर देना चाहिए था—

“बच्चो, आज मैं जो कुछ कहूँगा, वह किसी जाति, धर्म, वर्ग, क्षेत्र, भाषा, लिंग अथवा सोशल मीडिया समूह की भावना को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं कह रहा हूँ। यदि परीक्षा में किसी को दूसरे की कॉपी देखने से रोकूँ तो इसे किसी प्रकार के व्यक्तिगत, जातिगत अथवा वैचारिक पूर्वाग्रह का प्रमाण न समझा जाए।”

शायद फिर हम भी निश्चिंत रहते कि गुरुजी की डाँट के पीछे कोई छिपा एजेंडा नहीं है।

आज जब पुरानी स्मृतियों का पुनर्मूल्यांकन कर रहा हूँ तो मेरे मन में अपने गुरुजी के प्रति एक ही शिकायत बची है—गुरुजी, आपने उस समय अपनी मंशा क्यों नहीं बताई?

हमें कम-से-कम पता तो चलता कि जिस डंडे को हम अपने अधूरे होमवर्क का परिणाम समझ रहे थे, उसमें कितने सामाजिक विमर्श छिपे थे।

गुरुजी, शिक्षा में यह अध्याय आपसे सचमुच छूट गया।और आज वही अध्याय सबसे ज्यादा काम आ रहा है।

लेखक नाम:
 डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान

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