शूरवीरो की गाथा

गुमनाम नायक – स्व.श्रीदेव सुमन जी

रियासत और राजशाही के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद कर अपने प्राणों को न्यौछावर करने वाले भारत माता के सपूत श्रीदेव सुमन जी उत्तराखंड के पहले आंदोलन कारी थें।
‌‌श्रीदेव सुमन जी का जन्म टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड के जौल ग्राम में 25 मई 1916 में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री हरिराम बडोनी तथा माता का नाम श्रीमती विनय लक्ष्मी था।

आपके पिता अपने क्षेत्र के एक प्रसिद्ध वैद्य (चिकित्सक) थें। सन् 1919में पूरे क्षेत्र में हैजा फेल गया था। बहुत से लोग ने अपनी जान गंवा चुके थे। आपके पिता भी संक्रमित व्यक्तियों का इलाज करते हुए खुद संक्रमित हो गये। और उनकी मौत हो गई।तब वह मात्र 36 वर्ष के थें। पिता का साया उठने के बाद आपकी माताजी ने आपका तथा अन्य भाई बहनों का लालन-पालन किया।
अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव से ही करने के बाद सन् 1931 में टिहरी से मिडिल की परीक्षा पास की। तत्पश्चात् वह देहरादून चले गए, जहां पर नेशनल स्कूल में पढ़ाई की। पढ़ाई करने के साथ साथ अध्यापन कार्य करने लगे। पंजाब विश्वविद्यालय से रत्न भूषण, प्रभाकर विशारद और साहित्य रत्न की परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे आप समाचारपत्र हिंदू और राष्ट्रमत में सहकारी सम्पादक के रुप में कार्य करने लगे।

उस समय टिहरी रियासत द्वारा जनता पर तरह तरह से जुल्म किए जा रहे थे तब जनता की आवाज बनने एवं उनकी सेवा करने के उद्देश्य से सन् 1937 में “हिमालय सेवा संघ” की स्थापना की। इसके तहत पर्वतीय क्षेत्रों में जन जाग्रति और चेतना लाने का प्रयास किया। लगातार टिहरी गढ़वाल में वहां की दयनीय स्थिति को सब तरफ फैलाने के लिए हिमाचल नामक पुस्तक छपवा कर बंटवाने लगें।इस पुस्तक में रियायत के खिलाफ बातें थीं।इस कारण से रियासत ने आपको गिरफ्तार कर लिया ।

15 माह जेल में रहने के बाद रिहा कर दिया। सन् 1942 में जब देश में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो उससे जुड़ गए। देवप्रयाग में गिरफ्तार कर 10 दिन के लिए मुनि की रेती जेल भेज दिया। पुनः जेल से रिहा होने के बाद जनता और रियासत के मध्य संधि का प्रस्ताव भेजा लेकिन रियासत ने उसे अस्वीकार कर दिया।तब आपने जनता का साथ लेकर आवाज उठाई।इस पर 29 दिसंबर 1943 को चम्बारवाल में गिरफ्तार कर टिहरी जेल भेज दिया। जेल में आप पर सितम कर भयंकर यातना दी गई तथा झूठा मुकदमा लगा दिया।

31जनवरी 1944 में आपको 2 साल की सजा और 200 रू का दंड लगाया।जेल में तब आपने 3 मई 1944 को आमरण अनशन शुरू कर दिया। जेल में उन्हें परेशान किया गया,उन पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार किए गए लेकिन आप लगातार अनशन करते रहे। लगातार अनशन की वजह से आपकी तवियत बिगड़ने लगी तव रियासत की और से अफवाह फैला दी गई कि उनको न्यूमोनिया हो गया। स्वास्थ्य सही होते ही उन्हें रिहा कर दिया जाएगा।यह समाचार जब आप तक पहुंचा तो उन्होंने कहा कि जब तक प्रजामंडल रजिस्टर्ड नहीं होगा तब तक वह अनशन खत्म नहीं करेंगे।

इधर जेल में आपको कुनेन के इंजेक्शन लगाए गए।इसके कारण शरीर में खुश्की फैल गई और पानी के लिए तड़पने लगे लेकिन उन्हें पानी नहीं दिया गया।

अंततः तड़पते हुए आपने 25 जुलाई 1944 को अपने प्राण त्याग दिए। श्रीदेव सुमन जी की मृत्यु की खबर से जनता में आक्रोश फैल गया। और तब टिहरी प्रजामंडल का अधिवेशन हुआ। जनता ने टिहरी, देवप्रयाग और कीर्तिनगर पर अधिकार कर लिया। अंततः 1अगस्त 1949 को टिहरी गढ़वाल राज्य का भारत में विलय हो गया।

श्रीदेव सुमन जी ने अपने देश, राज्य उत्तराखंड और अपनी पहाड़ी संस्कृति और पहाड़ी समाज को बचाए रखने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए जिससे उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में सदा के लिए अमर हो गया।

कैफे सोशल उत्तराखंड के इस महान वीर सपूत को शत् शत् नमन करता है।

संजीव जैन
संपादक – मंडल
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