वीरांगना – रानी अब्बक्का चौटा
भारत माता की इस पवित्र भूमि में अनगिनत वीर, वीरांगनाओं ने समय-समय पर जन्म लेकर अपनी वीरता और शौर्य से जन्मभूमि की रक्षा की।

इस संस्करण में हम एक ऐसी वीर, साहसी महिला के बारे में पढ़ेंगे, जिन्होंने 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पुर्तगालियों से डटकर अनेक बार सामना किया। वो वीर जैन रानी थीं “रानी अब्बक्का चौटा”।
रानी अब्बक्का, रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेन्नम्मा, रानी रुद्रम्मा देवी के समान साहसी, दृढ़निश्चयी और निडर महिला थीं। जिन्होंने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में अपना स्थान बनाया था।
सन् 1500 के दशक में तुलुनाडू (तमिलनाडु) का कुछ भाग चौटा वंश के नाम से जाने वाले दिगंबर जैन राजवंश के अधीन था, जो मातृसत्तात्मक उत्तराधिकार प्रणाली का पालन करते थे। जैन राजा 12वीं शताब्दी में गुजरात से पलायन कर यहां पहुंचे थे। इसी परिवार में अब्बक्का का जन्म हुआ था। उनके मामा चौटा के तिरुमाला राय ने रानी का ताज पहनाया।
राजकुमारी अब्बक्का ने बचपन से ही युद्ध कला, तलवारबाजी, सैन्य रणनीति और राज प्रबंधन का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उनका विवाह बैदूर के राजा लक्ष्मप्पा बंगेरा अरसा से हुआ था। विवाह के बाद पुर्तगाली शासकों की अन्यायपूर्ण और अमानवीयता का सामना करने का निश्चय किया, लेकिन उनके पति पुर्तगाली सेना का सामना करने से डरते थे। वो रानी को मना करने लगे। इस कारण से उनमें विवाद हो गया। अंततः यह विवाह दुर्भाग्यपूर्ण रहा।
पुर्तगालियों ने अपनी उन्नत नौसैनिक तकनीक के बल पर हिंद महासागर पर एकाधिकार कर बंदरगाहों पर किले बना दिए थे। चूंकि यह क्षेत्र भारतीय, अफ्रीकी, अरब और फारसियों के लिए एक मुक्त व्यापार क्षेत्र था, लेकिन पुर्तगालियों ने अब इन मार्गों पर संचालन के लिए परमिट भुगतान कर दिया। इस पर इन देशों ने उनका सामना तो किया, लेकिन वो मजबूती से सामना नहीं कर सके।
एक बात अवश्य रही कि रानी पुर्तगालियों के विस्तारवाद में बाधा बनकर सामने डटी रहीं। सन् 1526 में मंगलोर बंदरगाह पर कब्जा करने के बाद पुर्तगालियों की निगाह उल्लाल पर टिक गई। उस समय उल्लाल एक समृद्ध बंदरगाह और चौटा वंश की सहायक राजधानी था।
रानी इन सबके बीच अरबों के साथ व्यापार चालू रखा, साथ में पुर्तगालियों की अनुचित करों की मांगों से क्रोधित हो गईं। रानी ने राज्य की प्रजा को एकजुट किया। उनकी सैन्य शक्ति में सभी जातियों और धर्म के लोग शामिल थे।
पुर्तगालियों ने पहली बार सन् 1556 में एडमिरल डॉन एल्वेरोंडी सिल्वेरा के नेतृत्व में उन पर हमला किया, लेकिन रानी ने डटकर सामना किया। यह युद्ध बाद में तनावपूर्ण युद्धविराम पर समाप्त हुआ।
दूसरी बार उन्होंने एक बड़ी सेना लेकर उल्लाल में अब्बक्का की बस्ती को नुकसान पहुंचाया, लेकिन रानी ने सैन्य और कूटनीतिक कुशलता से सामना किया। चार दशक से अधिक समय तक चले खूनी युद्ध में पुर्तगालियों के अनेक हमलों का डटकर सामना किया। इस कारण लोग उनको निडर रानी, अभय रानी कहकर बुलाने लगे।
एक बार फिर से पुर्तगालियों ने उनसे युद्ध किया और इस बार महल पर कब्जा कर लिया, लेकिन रानी चतुराई से भाग निकलीं। एक दिन रात के अंधेरे में रानी और उनके सैनिकों ने पुर्तगालियों पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में जनरल जो आओ पेइक्सोटो और 70 सैनिक मारे गए। बाकी के जान बचाकर भाग गए।
रानी की बढ़ती लोकप्रियता और बहादुरी से पुर्तगालियों ने उन्हें गिरफ्तार करने की योजना बनाई। उन्होंने उल्लाल और अब्बक्का के खिलाफ जनता को सख्त चेतावनी दी कि यदि उन्होंने रानी के साथ किसी भी तरह से संबंध रखा तो उसे मौत दी जाएगी। इस पर रानी क्रोधित हो उठीं।
सन् 1581 में पुर्तगालियों ने गोवा के पुर्तगाली वायसराय एंथनी डी नोरोन्हा को 3000 सैनिकों और युद्धपोतों के एक बेड़े को उल्लाल पर हमला करने के लिए भेजा। एक सुबह रानी मंदिर से दर्शन करके लौट रही थीं, तब अचानक हुए हमले से स्तब्ध रह गईं।
फिर भी “मातृभूमि की रक्षा करो, जमीन और समुद्र पर उनसे लड़ो, उन्हें पानी में वापस धकेल दो” के नारे लगाते हुए घोड़े पर सवार होकर पुर्तगालियों से डटकर सामना किया। युद्ध इतना भयानक हुआ कि जहाजों की आग में समुद्र लाल हो उठा।
इस वीर विद्रोही रानी को गोलीबारी में काफी गहरी चोट लग गई और कुछ गद्दारों की मदद से अब्बक्का को बंदी बना लिया गया। अपनी अंतिम सांस तक दृढ़ निश्चय के साथ युद्ध करते हुए प्राण त्याग दिए।
पुर्तगालियों के खिलाफ लड़ाई में अग्निबाण का प्रयोग करने वाली जैन रानी अब्बक्का अंतिम ज्ञात महिला थीं।
ऐसी बहादुर भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, निडर रानी, अभय रानी, महान रानी, जैन रानी को कैफे सोशल पत्रिका शत-शत नमन करता है।
रानी उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ने वाली पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं।
संजीव जैन
संपादक – मंडल




