तुम्हारा अक्स – राजभाषा हिंदी सम्मान प्रतियोगिता 2024
“राजभाषा हिंदी सम्मान प्रतियोगिता 2024 – की प्रथम पुरस्कार विजेता कहानी”


आज दिपदिपाती रोशनी में नहाया हुआ है सवि का आशियाना। कैसे तिनका-तिनका जोड़ कर सवि और सुधीर ने इसे बनाया था अपना नीड़। विवाह के पाँच बरस बाद ही इसी नीड़ में उनके प्रेम का प्रतीक शुभांशु उसकी गोद में आया तो यह नीड़ चहक उठा। उसका दामन खुशियों से भर गया।
“सुधीर आज तुम्हारा लाडला बैंड बाजे के साथ बहू ले आया है उसे आशीर्वाद दो सुधी!” कहते वह फफक कर रो पड़ी।
सामने हार चढ़ी तस्वीर में से सुधीर की आँखें चश्मे में से मुस्कुरा रही थीं पर सवि की आँखें धुंधला गईं और अतीत अपनी पूरी विराटता के साथ सामने खड़ा हो गया।
पौंsss…पौंsss…पौंsss… नीरवता तोड़ता, होर्न देता इंजन, ट्रेन बेतहाशा पटरियों पर दौड़े जा रही थी। गंतव्य तक पहुँचने की भागदौड़ पर इसी तेज़ रफ़्तार दौड़ती ट्रेन ने उसके जीवन की गति को थाम दिया था। तार-तार कर दिया उसका जीवन। दिल्ली से राउरकेला जाते हुए उसके जीवन में अनचाहा-अवांछनीय मोड़ आ गया। सुधीर के पेट में दर्द उठा। पुदीन हरा, चूर्ण, एंटासिड देकर वह निश्चित हो गई और शायद पेट दर्द में आराम भी हो गया। पति पैर सिकोड़ कर, मुँह फेर कर सो गए और वह भी पुनः पुस्तक पढ़ने में लीन हो गई।
“पेट दर्द से राहत मिल गई न! सुधी! सुधी!” वह सुधीर को इसी नाम से पुकारती थी। सवि के हाथों का स्पर्श पाते ही सुधीर सूखे पत्ते की तरह ढरक गया। हाथ नीचे को लटक गया। लगभग चीखते हुए “सुधी! सुधी…! सुधी…!” उसकी आवाज़ ट्रेन के शोर में दबकर रह गई। कोई उत्तर नहीं। सुधीर के मुख पर गहरी शांति थी, दर्द का कोई नामों निशां शेष नहीं। श्वास तंतु टूट चुके थे। नब्ज जम गई थी।
वह बुरी तरह घबरा गई थी। क्या करें? कहाँ जाए? यदि शोर मचाया तो…? राउरकेला के लिए छह घंटे शेष हैं शायद उसे यहीं उतरने के लिए विवश कर दिया जाए! फिर! फिर क्या होगा? अनजान जगह! कुछ भी समझ नहीं पा रही थी। आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
दिल पर पत्थर रख उसने सुधीर को चादर ओढ़ा दी और धीरे से आँखों में उमड़ते-घुमड़ते तूफान को अपने दुपट्टे में समेट लिया पर दिल में उठते झंझावातों का क्या करे? उसकी जिंदगी की गाड़ी तो पटरी से उतर गई थी। यह सुनामी तो शायद सब कुछ बहा कर ले जाएगी। हे भगवान्! पास में सोए नन्हे शुभांशु को उसने छाती से चिपका लिया। मेरी ज़िन्दगी के भूचाल से अनजान अपने ही ताल, गति, लय में मग्न ट्रेन पटरियों पर सरपट दौड़ रही थी।
दिल की भावनाओं का तूफान संवेदना शून्य मस्तिष्क को ले चला यूनिवर्सिटी के कैंपस में जहाँ खड़े थे सौम्य-सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी सुधीर और तीसवें वसंत में षोडशी सी वह स्वयं! एक ही यूनिवर्सिटी में व्याख्याता! कितनी ही शामें एक-दूसरे की आँखों को पढ़ने में निशब्द बिता दीं। पता नहीं शायद प्रेम की गहराई नापते रहे। मूक नेत्र बातें करते रहे पर कभी भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन न किया। करती भी कैसे? कड़े शब्दों में छात्रों को अनुशासन का पाठ पढ़ाती, संस्कारों और मर्यादा की घुट्टी पिलाती, वह स्वयं कैसे उसे पार कर सकती थी?
एक दिन यही प्रेम भाषा, शब्द और फिर स्वर पाकर मुखरित हो गया। कितनी शालीनता से सुधीर अपने मन की बात कह गए और वह भी बिहारी की नायिका सी लज्जा नत ठगी सी खड़ी रह गई। रक्तिम हो आए गालों की लाली अनायास कानों तक खिंच गई। एक सुखद प्रतीति, हृदय को गुदगुदा गई। सुधीर ने धीरे से उसके कोमल हाथों को थाम चूम लिया। वह सिमटकर पैर सिकोड़ तेजी से उठ खड़ी हुई।
“माँ राह देख रही होंगी। बहुत देर हो रही है।” लगभग दौड़ती हुई सी वह स्कूटर स्टैंड की ओर चल दी। कोमल लता सी देह अभी भी सूखे पत्ते की तरह काँप रही थी।
खटांग…खटांग… ट्रेन किसी नदी के ऊपर से गुज़र रही थी। चेतना शून्य सवि वैसे ही गठरी बनी बर्थ पर बैठी रही।
घर में रोज रिश्तो की बातें होतीं, साँवली, सलोनी, तीखे नैन-नक्श, लंबी कद-काठी, विदुषी लावण्यमयी सवि कृष्ण की कृष्णा से कहाँ कमतर थी? फिर ऊँचा पद रिश्तों की कोई कमी न थी। एक से बढ़कर एक रिश्ते उसके लिए आए पर कोई न कोई बहाना बनाकर टाल जाती।
एक दिन माँ ने फोन पर सुधीर से बातें करते रंगे हाथों पकड़ लिया। बस फिर क्या था? घर में भूचाल आ गया। बैठक से उठते तीव्र उग्र स्वर दीवारें भेद उसके कमरे तक पहुँच गए और कोई अपराध न कर भी वह अपराधी बना दी गई। बैठक में उसे बुलाया गया। अपराधिनी सी वह सिर नीचा किए हाज़िर हुई। वह कुछ कह पाती, उसके पहले ही एक अनचाहा रिश्ता उस पर थोपने का निर्णय सुना दिया गया।
वह खूब रोईं थी, आँसू बहाए, बाऊजी के सामने हाथ जोड़े-गिड़गिड़ाई, उनके पैर पकड़े पर सब व्यर्थ! माँ से लिपट खूब रोई। सब कुछ समझती-बूझती माँ मौन थीं या उनमें पति और बेटे का विरोध करने का दुस्साहस न था और कदाचित कभी रहा ही नहीं! बस उसकी सिसकियों का करुण स्वर दीवारों ने सहेज लिया।
ट्रेन किसी सुरंग से निकल रही थी। गहन अंधकार… उसका जीवन भी तो अंधियारे से घिर गया था।
दूसरी ओर सुधीर के घर के हालात भी कुछ बेहतर न थे। उसकी माँ ने भी घर में महासंग्राम खड़ा कर दिया था। सोने से मढ़ी, गोरी-चिट्टी बहू लाने का उनका सपना भरभरा कर ढेर हो गया था। वे सदमे को नहीं झेल पाईं और सीने में दर्द की शिकायत लिए पाँच-छह दिन अस्पताल में आतिथ्य पा गईं।
यूनिवर्सिटी केंपस में छात्रों का शोरगुल! वे दोनों शांत किंतु संतप्त हृदय लिए फिर मिले, हमेशा के लिए बिछड़ने के लिए किंतु विधि को कुछ और ही मंजूर था। उस दिन दोनों ने एक दूसरे का हाथ थामा पर फिर कभी नहीं छोड़ने के लिए।

✨ तैयार हो जाइए!
14 सितंबर 2025 से शुरू हो रहा है राजभाषा हिंदी सम्मान प्रतियोगिता 2025।
अपने शब्दों से मन जीतिए, देशभर में पहचान बनाईए।
अभी भाग लें और अपने हुनर को सम्मान दिलाएं!
आप भी इस वर्ष के प्रतियोगिता के विजेता बन सकते हैं, तो देर किस बात की! आगे की जानकारी के लिए हमारे इंस्टाग्राम @cafesocialmagazine को फ़ॉलो करें।
देवालय में दोनों ने ईश्वर को साक्षी मान कर एक दूसरे को पुष्प हार पहना दिए और पाणिग्रहण संस्कार में बंध गए, गठ बंधन सात जन्मों का। एक सुखद अनुभूति पर एक अनजाना भय भी सिर उठा रहा था।
सुनहरे बॉर्डर वाली लाल साड़ी में सजी वह, सिंदूर भरी मांग, गले में पुष्प हार, शंख और सीपी की सफेद लाल चूड़ियों सजी कलाइयाँ! कैसी दीपशिखा सी लग रही थी वह!
सुधीर ने द्वार खटखटाया। तात की बॉर्डर वाली साड़ी पहने, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी, पान से रंगे होठ, काजल सजी बड़ी-बड़ी आँखें, कमल से अरुणाभ कपोल, खिचड़ी बालों वाली अधेड़ उम्र की महिला ने द्वार खोला। सवि ने आगे बढ़कर चरण-स्पर्श करने की कोशिश की और दोनों ने आशीर्वाद प्राप्ति की लालसा से माँ का मुख, स्नेह से निहारा पर सब व्यर्थ! अपशब्दों की वृष्टि! इतना ही नहीं उसे धक्के मारकर बाहर की ओर धकेल दिया।
वह कुछ समझ पाती, उससे पूर्व ही चेतना शून्य हो गई। द्वार बंद होने का तेज स्वर ‘भड़ाक’… द्वार बंद, हमेशा के लिए।
घटना के मूक दर्शक बने, इकट्ठे हुए, सहृदयी पड़ोसियों के हृदय में करुणा उपजी और दौड़ कर पानी ले आए। पानी के छींटे उसके तप्त मुख पर पड़े और कुछ चेतना लौट आई। संघर्ष का प्रथम चरण! सामना करने को कमर कस ली! सारी शक्ति संचित कर उठ खड़ी हुई और सुधीर का हाथ थाम अपना नया जीवन आरंभ करने के लिए आगे कदम बढ़ाए।
ट्रेन बढ़ती जा रही थी। शायद दो स्टेशन और पड़ेंगे। धुंधलाई आँखें कुछ देख नहीं पा रही, शायद कोई स्टेशन ही है, दूर रोशनी दिख रही है पर उसका जीवन? काला स्याह अंधियारा कब छंटेगा? सुधीर गहरी नींद में हमेशा के लिए सो गए थे… हमेशा-हमेशा के लिए। नींद में बेसुध शुभांशु को उसने छाती से चिपका लिया और सुधीर के निष्प्राण ठंडे पड़ गए हाथों को अपनी गर्म कोमल हाथ में थाम अंदर ही अंदर फूट पड़ी। ट्रेन अंधेरे को चीरती चली जा रही थी, लेकिन सवि का जीवन जैसे शून्य में ठहर गया था।
सुधीर के बिना अब हर कदम एक चुनौती थी। उसकी यादें, उसकी बातें और वह अधूरी हँसी सब कुछ एक पल में स्मृतियों के अनंत समंदर में समा गए। रेंगते हुए ट्रेन अपने गंतव्य पर पहुँची।सवि ने अपने भीतर के तूफान को शांत करने का प्रयास किया। वह जानती थी कि अब उसे कमजोर पड़ने का अधिकार नहीं था। उसने रेलवे पुलिस कर्मियों और स्टेशन पर मौजूद स्टाफ की मदद ली। बुत बनी वह पुलिस और रेलवे की सारी औपचारिकताएँ पूरी कर सुधीर की निष्प्राण देह के साथ घर लौटी।अंतिम विदाई देने का समय आ गया था।
अगले दिन सवि ने काँपते हाथों से सुधीर को विदाई दी और देर तक फूट-फूटकर रोती रही। उसके आँसू पोंछने वाला कोई न था सिवाय शुभांशु के। उसके नर्म-कोमल हाथों का स्पर्श उसके दुख से संतप्त हृदय को कुछ ठंडक पहुँचा रहा था। नन्हा शुभांशु कुछ ही पलों में बड़ा हो गया था। शुभांशु के नन्हे काँपते हाथ उसके आँसू पोंछ रहे थे।
अपने को संभालते हुए उसने शुभांशु को कसकर अपने आँचल में भर लिया।शुभांशु का हाथ थामे वह धीरे से खड़ी हुई और वहाँ खड़े होकर उसने खुद से वादा किया-“सुधी, तुम्हारे बिना ये सफर मुश्किल है लेकिन मैं हार नहीं मानूंगी। तुम्हारी यादें मेरे साथ हैं, और शुभांशु हमारा अंश है। मैं उसे तुम्हारे सपनों की ऊँचाई तक पहुँचाऊँगी।”
रेत सा फिसलता समय भी उसे पहाड़ सा प्रतीत हो रहा था। एक अकेली माँ होने का संघर्ष आसान नहीं था। उस पर उसकी सुंदरता उसके लिए पग-पग पर रोड़ा बन आगे खड़ी हो जाती। यूनिवर्सिटी आते-जाते कितनी ही निगाहों को अपने चेहरे और पीठ पर चिपका हुआ महसूस करती।कॉलेज के ही कुछ सहकर्मियों की निगाहें अब बदल गई थीं।
दिसंबर के रविवार की ही बात थी। नहा-धोकर धोकर आँगन में धूप सेकती पेपर पढ़ रही थी कि डोर बेल की आवाज़ सुन दरवाजा खोला तो सामने अंग्रेजी के प्रोफेसर खन्ना साहब खड़े थे।
“नमस्ते सविता जी। यहाँ से गुज़र रहा था तो सोचा आपके हाल-चाल पूछता चलूँ।”अपनी बत्तीसी दिखाते हुए वे स्वयं ही घर में प्रविष्ट हो गये।
“घर तो बहुत सुंदर है आपकी ही तरह।” और दाँत निपोरने लगे।उनकी स्कैन करती निगाहों ने से सवि परेशान हो गई।
“मि.खन्ना अभी व्यस्तता है इसलिए…प्लीज़ बुरा मत मानिएगा।”सवि ने हाथ जोड़ विनम्रता के साथ मि.खन्ना को यह समझा दिया कि उसके घर के हर किसी के लिए नहीं खुले हैं।
उस दिन से यूनिवर्सिटी में उसके नाम के आगे घमंडी ,नकचढ़ी और न जाने कितने विशेषण लग गए पर बिना किसी बात की परवाह किए वह अपना काम पूरी लगन और ईमानदारी से करती रही। इन्हीं कारणों से वह छात्रों में अत्यंत प्रिय थी।
ज़िंदगी की ही धुरी पर घूमते हुए उसका एक मात्र लक्ष्य था शुभांशु को एक अच्छा इंसान बनाना, जिसके लिए वह हर संभव कोशिश करती।दिन-रात खटती और थक कर चूर हो जब वह सुधीर की तस्वीर के सामने बैठती तो सुधीर की मुस्कुराती तस्वीर उसे नई ऊर्जा दे, सुधीर के साथ होने का अहसास दिलाती। हर सुबह, शुभांशु की मासूम आँखों में जीवन की चमक उसे जीवन जीने की उमंग देती।उसकी इस तपस्या का ही सुपरिणाम है कि शुभांशु न केवल एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर बन गया बल्कि एक अच्छा इंसान भी बना।
कल ही शुभांशु और शुभी का विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ है।शुभी और शुभांशु कॉलेज में साथ ही पढ़ते थे।उस दिन जब शुभांशु शुभी के साथ अचानक ही उसके सामने आ खड़ा हुआ तो उसे यह समझते देर न लगी कि शुभी ही उसकी भावी बहू है।
शुभी ने जब सिर झुकाकर उसे प्रणाम किया तो उसने बड़े प्यार से उसके सिर पर अपना हाथ रख उसे ढेरों आशीर्वाद दे दिए।
यह वही दिन था जिसका सपना सवि और सुधीर ने कभी साथ देखा था। सवि ने शुभांशु को दूल्हे के रूप में देखा तो उसकी आँखें भर आईं। उसके गालों पर बहते आँसू अब पीड़ा के नहीं बल्कि गर्व और संतोष के थे।

बहू के कोमल पगों की छाप जब उसके घर-आँगन में पड़ी तो मन-मयूर खुशी से नाच उठा।हर्षातिरेक से उसकी आँखें भर आईं और सुधीर से दो बातें करने उसकी तस्वीर के सामने आ खड़ी हुई। अपना चश्मा उतार आँसू पोंछ तस्वीर को निहारते हुए, उसने धीमे से कहा, “देखो सुधी, तुम्हारा सपना पूरा हो गया। शुभांशु आज उस मुकाम पर है जहाँ तुम उसे देखना चाहते थे।हमने जो घर तिनका-तिनका जोड़कर बनाया था, वह आज खुशियों से भर गया है।
सुधी, चलते-चलते मैं कभी थकी,कभी टूटी,कभी हारी भी लेकिन तुम्हारी यादों और हमारे प्रेम की ताकत ने मुझे हमेशा संभाला है। हमारा प्यार कभी खत्म नहीं होगा। शुभांशु में तुम्हारा अक्स हमेशा जिंदा रहेगा।”
तस्वीर में सुधीर की मुस्कुराती आँखें जैसे सवि को ही देख रही थीं।
“धत्!”सवि ने हल्की मुस्कान के साथ सिर झुका लिया।

https://www.instagram.com/cafesocialmagazine/reel/DM0fLxShyXc

✨ तैयार हो जाइए!
14 सितंबर 2025 से शुरू हो रहा है राजभाषा हिंदी सम्मान प्रतियोगिता 2025।
अपने शब्दों से मन जीतिए, देशभर में पहचान बनाईए।
अभी भाग लें और अपने हुनर को सम्मान दिलाएं!
आप भी इस वर्ष के प्रतियोगिता के विजेता बन सकते हैं, तो देर किस बात की! आगे की जानकारी के लिए हमारे इंस्टाग्राम @cafesocialmagazine को फ़ॉलो करें।



