हमसफ़र हूँ तेरी
– महावीर अग्रवाल

सुरंजना के हाथ में महेंद्र के एग्जाम का रिजल्ट था।
महेंद्र फेल होते-होते बचा था। अधिकांश विषयों में उसे पास मार्क्स से सिर्फ एक-दो नंबर ही ज्यादा मिले थे। गनीमत थी कि किसी भी विषय में लाल निशान नहीं लगा था और वह पास घोषित कर दिया गया था। ऊफ!
उसकी नजरों में घोर अविश्वास भर गया। ऐसा कैसे हो सकता है भला! जो शख्स उच्च माध्यमिक (कॉमर्स) में पूरे बंगाल में प्रथम दस में उत्तीर्ण हुआ हो, बी.कॉम ऑनर्स में प्रथम श्रेणी में द्वितीय आया हो, जिसे राष्ट्रीय छात्रवृत्ति घोषित हुई हो और जिसका स्कूल-कॉलेज की हर कक्षा में प्रथम आने का ट्रैक रिकॉर्ड रहा हो — वह सी.ए. इंटर में इतना नीचे क्यों कर आ सकता है! असंभव!
सुरंजना बेचैनी से भर उठी। मन में एक झंझावात चल रहा था। ऐसे अप्रत्याशित परिणाम की उम्मीद खुद महेंद्र को भी कतई नहीं थी। रिजल्ट आने के बाद से महेंद्र भी उदास था। वह खुद इस खराब प्रदर्शन को पचा नहीं पा रहा था।
बी.कॉम के शानदार रिजल्ट के बाद सब कुछ यथावत चल रहा था। अचानक ऐसा क्या उथल-पुथल हो गया महेंद्र की जिंदगी में कि सब कुछ उलट-पुलट हो गया!
सुरंजना इन दो-तीन साल के भीतर महेंद्र को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं का विश्लेषण करने में जुट गई…
अचानक सुरंजना का कलेजा धक से रह गया। उसे याद आया — सी.ए. इंटर एग्जाम के करीब छह माह पूर्व ही महेंद्र से उसका विवाह हुआ था। निश्चय ही यह घटना उसके जीवन की बेहद टर्निंग पॉइंट वाली घटना थी। विवाह के बाद यह पहली परीक्षा थी और इसमें महेंद्र बुरी तरह असफल रहा।
यानी कि उसका महेंद्र की जिंदगी में आना महेंद्र के लिए अशुभ साबित हुआ..! उसकी पूरी देह इस सोच मात्र से सूखे पत्ते की तरह कांप गई। त्वरित गति से याद आने लगे वे अनगिनत कटाक्ष जो महेंद्र के मित्रों ने चुहल के रूप में ही सही, विवाह के अवसर पर उसको लक्ष्य करके उछाले थे।
1. परिचय और प्रेम की शुरुआत
महेंद्र से उसका परिचय कॉलेज में उस समय हुआ जब वह बी.कॉम के तृतीय वर्ष में थी और महेंद्र फाइनल ईयर में।
लाइब्रेरी में किताबें इशू करने के लिए दो क्लर्क थे। महेंद्र और वह दो विपरीत दिशाओं से लाइब्रेरी में आए और उन क्लर्कों के पास जाकर एक ही लेखक की अकाउंटेंसी की पुस्तक की मांग कर बैठे। संयोग से उस समय किताब की एक ही प्रति मौजूद थी।
दोनों क्लर्क मुस्कुराए और उनमें से एक, जो जरा रंगीन व मजाकिया तबीयत का था, बोल पड़ा —
“वाह! क्या ही अच्छा होता कि आप दोनों एक होते तो यह विकट समस्या नहीं आती। दोनों साझे में एक ही किताब से बखूबी काम चला लेते कि नहीं, ऐंय? अब हम क्या करें आप ही बताओ जी!”
उसकी बात सुनकर एक बारगी सुरंजना शर्म से लाल हो उठी। उससे कुछ कहते नहीं बना। पर महेंद्र ने मुस्कुराते हुए तुरंत बात को संभाल लिया —
“ठीक है सर, हम आपकी ‘काश’ को अस्थायी तौर पर वास्तविकता में बदल लेते हैं। किताब मेरे नाम से जारी कर दें, हम दोनों साझे में काम चला लेंगे।”
फिर किताब और उसे साथ लिए महेंद्र कॉलेज भवन के सामने के ग्राउंड की ओर बढ़ गया। नवंबर की गुनगुनी धूप धरती से लेकर आकाश तक छितराई हुई थी।
ग्राउंड में छोटे-छोटे झुंडों में छात्र-छात्राएं मटरगश्ती कर रहे थे। महेंद्र सुरंजना के साथ ग्राउंड के एक ओर खड़े पीपल के नीचे आ बैठा।
महेंद्र कॉलेज में चैंपियन स्टूडेंट के रूप में ख्यात था। सुरंजना उसके व्यक्तित्व से पहले से ही प्रभावित थी। पीपल के पेड़ तले बातचीत, हंसी-मजाक और चुटकुलों-लतीफों का दौर शुरू हुआ तो दो घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला।
इसके बाद दोनों के बीच घनिष्ठता निरंतर बढ़ती गई और यह प्यार के लहलहाते पौधे में कब तब्दील हो गई, दोनों में से कोई नहीं जान सका। अब दोनों कॉलेज से बाहर भी मिलने लगे।
महेंद्र का अधिकांश समय पढ़ाई में बीतता। व्यस्तता के बीच रोज कुछ समय निकाल कर सुरंजना को साथ लेता और बाइक से शहर के उत्तरी किनारे की झील पर चला आता।
झील का वातावरण बड़ा मनोरम था — फूल-पौधों के छोटे-बड़े छतनार पेड़, पेड़ों पर लुका-छिपी खेलते पक्षियों का कलरव! किसी झाड़ी की ओट में बैठकर दोनों किसी और ही दुनिया में खो जाते। भावी जीवन के ताने-बाने कसमों और वादों के सतरंगी धागों से बुने जाते।
महेंद्र अक्सर उन्माद से भर कर सुरंजना को बाहों में समेट लेता और उसके होंठों पर चुम्बन अंकित कर देता। सुरंजना भी सिहर कर किसी चूजे की तरह उसकी छाती में छुप जाती।
पर दूसरे ही पल मर्यादा का बोध होते ही दोनों शरीफ बच्चों की तरह अलग हो जाते।
2. विवाह और जीवन की दिशा
उस दिन शाम की धूसर छाया उतरने लगी थी झील पर।
सुरंजना उसकी नजरों में झांकती हुई “आपकी नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे” की कड़ियाँ गुनगुना रही थी।
गीत से रोमांचित हो महेंद्र ने दोनों बाहों से उसके चेहरे को थाम कर नीचे झुकाया और तप्त अधरों को उसकी बिंदी पर टिका दिया —
“डार्लिंग, अब दूरी सही नहीं जाती। हमारे बीच की मर्यादा की सो-काल्ड लक्ष्मण रेखा कब मिटेगी यार… कब?”
“धैर्य वत्स धैर्य! अभी देवी की पूजा-अर्चना पूरी नहीं हुई है!”
सुरंजना खिलखिलाई तो उसकी खिलखिलाहट में पायल की रुनझुन घुल गई।
दूसरे ही पल गंभीर होकर बोली — “हमारे परिवार तो जब कहें शादी कराने को तैयार हैं माही। मैं ही चाहती हूँ कि ब्याह कुछ समय बाद हो।”
“सुना है नारी की कमनीय काया और मांसल सौंदर्य के मोह में फंस कर पुरुष कर्तव्य से भटक जाता है और जिम्मेदारियों से विमुख हो जाता है। शंकित हूँ कि लक्ष्मण रेखा के टूटते ही तुम अपने स्टडी के प्रति उदासीन न हो जाओ। छह महीने बाद ही सी.ए. इंटर का एग्जाम है। कहीं मेरा संसर्ग मेरा प्यार टॉपर आने के तुम्हारे सपने को ध्वस्त न कर दे!”
“हाहाहा!” महेंद्र ठहाका लगा उठा —
“क्या दूर की कौड़ी लाई हो यार! तुम्हारा प्यार नई प्रेरणा ही देगा, भटकाव नहीं।”
अगले महीने ही दोनों विवाह सूत्र में बंध गए।
विवाह की रस्में एक के बाद एक पूरी होती गईं। सप्तपदी के बाद जैसे ही दोनों एकांत रूम में आए, दोस्तों ने उन्हें घेर लिया।
“लो जी, नोट कर लो आज के इस ऐतिहासिक पल को! एक होनहार छात्र की प्रतिभा की इतिश्री हो गई!” सौरभ आंखें नचाते बोला।
“इतनी सुंदर दुल्हन मिली, ब्याह के बाद महेंद्र का पढ़ाई में मन लगेगा भी?”
“सच! स्कूल के जमाने से आज तक हर एग्जाम में टॉपर रहा है। सी.ए. इंटर में भी गोल्ड मेडल जरूर हासिल करता, पर अब! अब तेरा क्या होगा कालिया!”
मनीष ने ‘गब्बर’ के अंदाज में डायलॉग बोला तो सभी खिलखिला पड़े।
उनके कटाक्ष सुनकर सुरंजना मन ही मन अपराधबोध से भरी जा रही थी।
पर महेंद्र आत्मविश्वास से बोला —
“फ्रेंड्स, चिंता नक्को! भविष्य की चिंता में वर्तमान को क्यों भुला रहे हो यारों! बाद की बाद में देखेंगे, जिंदगी की इस बेहतरीन उपलब्धि पर मित्र को बधाई तो दो न!”
शादी के बाद दो-तीन महीने मधुरात्रि के सेलिब्रेशन में गुजर गए। कभी कश्मीर की डल झील में शिकारे पर, कभी शिमला की वादियों में, तो कभी दार्जिलिंग की पहाड़ियों पर!
इन रोमांच भरे दिनों में जब-जब सुरंजना ने पढ़ाई की बात छेड़ी, महेंद्र टाल जाता —
“ओके यार, बस एक-दो दिन में ही पढ़ाई शुरू करता हूँ!”
लेकिन वही “एक-दो दिन” पूरे हफ्ते में ढल जाते।
3. नई शुरुआत
सुरंजना ने एकांत देने के उद्देश्य से मायके का रुख किया।
महेंद्र के अकेलेपन ने उसे बेचैन कर दिया और वह लौट आयी।
स्मृतियों में अब भी वह प्यार की हिलोरें, सिहरन और मिलन की मादकता यादें ताजा कर रही थीं।
लेकिन उसी रात सुरंजना ने ठान लिया — अब दिशा बदलनी होगी।
सुबह किसी के झकझोरने पर महेंद्र की नींद टूटी।
सुरंजना खड़ी थी — सद्यस्नात, गुलाब की खुशबू में लिपटी। हाथ में भाप उड़ाती कॉफी।
“सुबह का समय अध्ययन के लिए सबसे उपयुक्त होता है माही! कॉफी लो, सारा आलस्य दूर हो जाएगा।”
महेंद्र ने आश्चर्य से देखा — स्टडी रूम का कायाकल्प हो चुका था। किताबें करीने से सजी थीं। फूलदान में ताजे गुलाब थे।
फिर नाश्ते की प्लेट — टोस्ट, पकौड़े, चाय — सब उसका मनपसंद!
सुरंजना ने मुस्कुराते हुए कहा —
“चार घंटे बिल्कुल एकाग्र होकर स्टडी में लग जाइए। समझ रहे हैं न… आपको मेरी कसम!”
उस दिन से उनकी दिनचर्या बदल गई।
सुबह पढ़ाई, दोपहर विश्राम और प्यार के पल, शाम को झील की सैर, और रात को अध्ययन।
धीरे-धीरे महेंद्र के चेहरे पर आत्मविश्वास लौटने लगा।
सुरंजना अब हमसफर ही नहीं, गुरु भी बन गई थी।
रात को वह प्रोफेसर बनकर महेंद्र को पढ़ाती, ऑडिट और लॉ के चैप्टर सुनाती।
महेंद्र मनोयोग से सुनता और नोट्स बनाता।
कभी वह उसके सिर को सहलाती, तो कभी कॉफी पकड़ा देती।
दिन बीतते गए।
महेंद्र ने खुद को एक नई लय में पा लिया —
किताबें, कॉपियाँ, ऑनलाइन क्लासें, और बीच-बीच में सुरंजना का स्नेह।
4. सफलता का शिखर
नियत समय पर परीक्षाएं हुईं।
जब परिणाम घोषित हुए, महेंद्र का परिश्रम रंग लाया।
महेंद्र को प्रथम श्रेणी मिली और वह गोल्ड मेडल से सम्मानित हुआ।
नगर के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में उसकी तस्वीर छपी थी।
स्थानीय न्यूज़ चैनल ‘इस समय’ पर उसका इंटरव्यू प्रसारित हुआ जिसमें महेंद्र ने कहा —
“नारी पत्नी के रूप में सच्ची हमसफर बन जाती है।
नारी का रूप व सौंदर्य पुरुष को लक्ष्य से भटकाता नहीं है, जैसी कि आम धारणा है।
वह लक्ष्य के प्रति समर्पण का भाव भरता है।
मुझे ही देखें, मेरी इस अप्रतिम सफलता के पीछे पत्नी का हाथ है।
वह हमसफर ही नहीं, देवी दुर्गा भी है और जॉन ऑफ आर्क भी!”
Prince Readymade
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