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अस्तित्व की खोज – पुरुस्कृत कहानी

विजेता कहानी | राजभाषा हिंदी सम्मान प्रतियोगिता २०२४

‘‘यहाँ सब ठीक नहीं लग रहा तो लौट जाओ अपने घर। …’’ 

यह सुनते ही लगा कि लड़की का जीवन लूडो की गोटी के समान है। गोटी काटो और फिर उसी घर में बिठा दो।…  क्या ! जीवन भी लूडो का खेल है ? लावण्या रौ में बोल रही थी। उसका गला रूंधता जा रहा था। राज चुप-चाप लावण्या को देख रहा था। वर्षों बाद बाद लावण्या राज से आमने-सामने हुई। राज तो लावण्या को पहचान भी नहीं पाया। वह रास्ता काटकर कदमताल करते हुए आगे बढ गया़ था। लावण्या राज को पहचान गई। उसने आवाज दी, ‘‘राज’’

राज ठिठक गया। उसने सिर घुमाया तो सामने खड़ी लड़की बोली, ‘‘ तुमने पहचाना नहीं, मैं लावण्या।’’  कितना बदल गई है – लावण्या। सदा घुँघरूओ की तरह बजने वाली लावण्या, अब बुझ सी गई है। ना उसके ओठो पर मुस्कान है, ना चेहरे पर चमक। बचपन के किस्से राज को याद आने लगी। राज ने पूछा, ‘‘

“अब लूडो खेलती हो या नहीं ?…”

‘‘तुम तो लूडो की चैंपियन हुआ करती थी। लाल रंग पसंद था। लाल गोटी का मतलब लावण्या की जीत पक्की।”

लावण्या की आँखों में उदासी तैर आई, “हाँ मुझे तब लाल रंग पसंद हुआ करता था।’’

राज आश्चर्य से बोला, “और अब !”

“तब मेरी आँखें रूमानी सपने देखती थी। सपनों का रंग लाल हुआ करता था। ठीक दिल की तरह, लाल लाल दिल,और दिल में इश्क था। मासूम सपने थे। लाल रंग देखते ही उत्साहित हो जाती थी। लाल झुमके, लाल बिंदी, लाल साड़़ी सब पसंद था। पर जिंदगी के थपेड़ों में सभी रंग आपस में मिल गए। जीवन मटमैला रंग सा हो गया है। अब कोई भी रंग डालो कोई फर्क नहीं पड़ता।”

राज लावण्या की पीड़ा से पीड़ित हो रहा था। मुंबई के एक मॉल में अचानक हुई मुलाकात से उसे जितनी खुशी हुई थी। उतना ही दुख उसे लावण्या से बात कर हुआ। राज लावण्या की बातों को तफशील से सुनना चाहता था। ढ़लती रात राज को रूकने की इजाजत नहीं दे रही थी। लावण्या से विदा होकर उसने घर की राह पकड़ ली। पूरे रास्ते बचपन के किस्से उसे याद आते रहे।

लावण्या उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर हापुड़ की थी। सभी भाई बहनों में बड़ी होने के साथ-साथ तेज-तर्रार भी थी। पढ़ाई-लिखाई में अव्वल थी। बचपन में ही जिम्मेदारी समझने लगी थी। अपने काम को अपने तरीके से करने की आदत थी। पहले इंजीनियरिंग फिर एमबीए की पढ़ाई पूरी की। उसका हर फैसला अपना था। जो सपने बुनती उसे साकार करती। चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक साफ़ झलकती थी। आत्मविश्वास से उपजी महत्वाकांक्षाओं ने उसे बड़े-बुजुर्गो की नजर में शरारती साबित कर दिया था। उसकी हाजिरजवाब स्वभाव को बड़े-बुजुर्ग बत्तमीजी भी समझते थे । पर वो हर बात हँसी में उछाल कर आगे बढ जाती। 

घर में उसकी शादी की फुसफुसाहट शुरू हुई। रुप-रंग तो सामान्य ही था, पर उसके स्वालंबी स्वभाव ने उसकी महात्वाकांक्षा को एक अलग ही रंग दे दिया था। उसके लिए योग्य वर की तालाश शुरू हुई।

लावण्या का फोटो बायोडाटा भेजा जाने लगा। लड़के का बायोडाटा भी आने लगा। बड़े-बुजुर्ग कुंडली मिलान की बात करते तो लावण्या कहती, ‘‘ कुंडली नहीं ‘जीन’ का मिलना जरूरी है।’’ माँ बाप को दो और लड़कियों चिंता सताने लगी थी। राज, लावण्या के घर के पड़ोस में ही रहता था। घर में आना-जाना काफी था। बचपन में काफी संग-साथ रहा। लावण्या उम्र में तीन साल बड़ी थी। राज में दोस्त की छवि देखती थी। दोनो की दोस्ती खुशबू का अहसास घर वालों को भी था। राज बारहवीं के बाद बीबीए करने बॉम्बे चला आया था।

लावण्या मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रही थी। स्वालंबी बन चुकी थी। लावण्या जब भी किसी लड़के को रिजेक्ट करती तो घर वाले सोंचते, ‘‘शायद वह किसी को पसंद करती हो ? मन टोने के ख्याल से माँ ने एक बार कहा भी था, ‘‘देखो गोल मार्केट वाले शर्माजी की बेटी ने पसंद से शादी कर ली है । कितना अच्छा कीया ?’’

“काश ! कोई होता….तो मैं भी बता देती।’’ ओठो पर मुस्कान बिखेरते हुए लावण्या बोली।

लवण्या के ओठो की मुस्कान पर उसकी माँ को लावण्या की अतीत याद आई। कहीं राजीव तो नहीं बसा है इसके दिल में। उस वक्त लावण्या चैदहवें बसंत में प्रवेश कर रही थी। स्कूल के वार्षिकोत्सव समारोह में स्कूल में पढ़ने वाला लड़का राजीव के साथ नाटक में भाग लिया था । उसके बाद सहेलियों ने मजाक बनाना शुरू कर दिया था। स्कूल में जब भी राजीव पर उसकी नजर पड़ती लावण्या के दिल की धड़कन बढ़ जाती। दिल की हलचल को उसके चेहरे के बदलते रंग को राजीव ने भी महसूस किया। राजीव हर उस जगह पर उपस्थित रहने का प्रयास करता। जहाँ से लावण्या गुजर सकती हो। ना राजीव कुछ कह पाता न लावण्या। 

एक दिन लावण्या के घर के फोन की घंटी बजी। लावण्या फोन का रिसिवर उठाकर बोली, ‘‘ हेलो।’’  

कुछ देर की चुप्पी के बाद लावण्या के कानों में आवाज गूँजी , ‘‘ मै राजीव।’’

राजीव की आवाज सुनते ही लावण्या थड़थड़ाते हुए फोन का रिसिवर रख दीया । फोन के पास ही बैठकर स्वयं को संयमित करने का प्रयास करने लगी। फिर फोन की घंटी बजी। लावण्या ने फिर फोन काट दीया । राजीव पर तो जैसे जुनून चढ़ा था। वह बार-बार फोन कर रहा था। लावण्या काट दे रही थी। लावण्या समझ गयी कि अब बात करनी ही पड़ेगी। फिर फोन की घंटी बजी, लावण्या ने रिसिवर उठाकर बोली, ‘‘हेलो।’’

‘‘ लावण्या मेरी कदमों की चाल से तुम्हारे दिल की धड़कन बढ़ जाती है। उसके अश्क तुम्हारे चेहरे पर दिखाई देती है। यह प्यार नहीं तो और क्या है ?’’

‘‘राजीव लच्छेदार बातें करते जा रहा था। लावण्या को उसकी बाते अच्छी लग रही थी। लेकिन कुछ बोल नहीं पा रही थी। फोन का रिसिवर पकड़े लावण्या डर रही थी। कहीं कोई कमरे में न आ जाए। लावण्या उस दिन सिर्फ इतना बोल पायी थी, ‘‘ ऐसी कोई नहीं, बाद में बात करते हैं।

फोन पर हुई बातों के बाद मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ। कुछ ही महीने में राजीव मैट्रिक की परीक्षा पास कर राजीव ने कालेज में दाखिला लिया। राजीव चाहकर भी लावण्या से मिल नहीं पा रहा था। उसने लावण्या के घर के आस-पास के लड़के को दोस्त बनाना शुरू किया। दोस्तो से मिलने के बहाने राजीव लावण्या पर नजरें रखने लगा। लावण्या घर के आसपास राजीव से मिलना नहीं चाहती थी। लावण्या अक्सर राजीव की नजरों से बचने का प्रयास करती। लावण्या अक्सर छत पर जाकर खुले आसमान को निहारती। आसमान में उड़ रही पतंगो को देखकर रोमांचित होती। पतंगों की तरह उड़ान भरने के ख्यालों में खुश रहती। एक दिन लावण्या छत पर पहुँची ही थी कि धप्प की आवाज सुनाई दी। लावण्या डर गई, उसकी आँखे बंद हो गयी। जब डरते हुए आँख खोली तो सामने राजीव खड़ा था। लावण्या वापस लौटना के लिए मुड़ी तो राजीव लपककर उसका हाथ पकड़ कर अपने साथ बिठा लिया। राजीव के स्पर्श से लावण्या का मन पुलकित तो हो रहा था लेकिन डर भी रही थी। किसी ने देख लिया तो क्या होगा ? यह सोचकर लावण्या परेशान भी हो रही थी।

लावण्या पसीने-पसीने हो रही थी और राजीव उसे देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। लावण्या नजर उठायी तो उसकी नजर पड़ोस वाली भाभी पर पड़ी। भाभी पर नजर पड़ते ही लावण्या हाथ छुड़ाकर भाग गयी। लावण्या घबरा गई। भाभी बात का बतंगड़ बनाने के लिए पूरे मुहल्ले में मशहूर है। जैसे-तैसे रात कटी। अगले दिन उसकी मम्मी ने लावण्या से राजीव के बारे में पूछा। लावण्या कुछ नहीं बोली। शाम को ही लावण्या के माता-पिता राजीव के घर गए। उसके बाद राजीव का लावण्या के इर्द-गिर्द मँडराना बंद हो गया। उसी साल राजीव पढ़ाई के लिए बाहर चला गया। बगल वाली भाभी ने ही लावण्या को बताया कि लड़का दूसरी जाति का था। उसके बाद लावण्या और राजीव का संपर्क कभी नहीं रहा। वक्त के साथ लावण्या राजीव को भूल चुकी थी। लेकिन लावण्या के माता-पिता को लगता कि शायद राजीव के कारण ही लावण्या शादी के हर रिश्ते में मीन मेख निकालती है।   

अचानक लावण्या ने घर वालों के समक्ष समर्थ से शादी करने का प्रस्ताव रखा। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर समर्थ से बातचीत हुई थी। दो-तीन महीने की ऑनलाइन बातचीत में ही लावण्या ने समर्थ के साथ घर बसाने का फैसला कर लिया था । समर्थ इकलौता था, कनाडा में नौकरी कर रहा था। रंग-रूप, कद काठी से साधारण ही था। लावण्या को पसंद था, तो घर वालों ने सहमति जता दी। करोना की वजह से शहरों में लॉकडाउन की शुरूआत हो चुकी थी। समर्थ भी इंडिया आ गया। लावण्या खर्चीले शादी के खिलाफ पहले से ही थी। वह समर्थ को बता भी चुकी थी। समर्थ भी शादी की रश्म निभाने को आतुर था। लावण्या के माँ-बाप भी खुश थे। उनकी मुरादे पूरी हो रही थी। सादे समारोह लावण्या की शादी हुई।

 शादी के बाद लावण्या पुनः दिल्ली आ गई। दिल्ली शहर उसके लिए नया नहीं था लेकिन ससुराल का माहौल उसके लिए नया अवश्य था। तितली की तरह उड़ने वाली लावण्या के लिए ससुराली घर किसी पिंजड़ा से कम नहीं था। सास-ससुर में लावण्या माता-पिता की छवि देखना चाहती थी। सास-ससुर के दिल में टीस थी कि शादी उनके शान-शौकत की तरह नहीं हुआ। शान-शौकत का दर्द जब भी छलकता तो इल्जाम लावण्या पर लगता। लावण्या हर इल्जाम को हँसी में उड़ा देती। लॉकडाउन  खत्म होना शुरू हुआ तो लावण्या ने जॉब छोड़,समर्थ के साथ कनाडा चली गयी। कनाडा में लावण्या की गृहस्थी जमने लगी। करोना से आयी आर्थिक मंदी के कारण लावण्या जॉब नहीं मिली ।लावण्या अपनी खुशी पूरी करना चाहती थी। हर खुशी के लिए उसे समर्थ के सामने हाथ फैलाना पड़ता। समर्थ थोड़ा ज्यादा ही किफायती था।

लावण्या और समर्थ के अहम टकराने लगे। छह महीने के अंदर ही लावण्या हापुड़ लौट आयी। शुरूआत में समर्थ फोन कर लावण्या की खबर ले लेता था। लावणया अपनी जिद्द पर अटल रही। घरवाले समझाते रहे लेकिन किसी की एक न सूनी। बसा-बसाया घर कुछ ही महीने में बिखरने लगा। लावण्या शोक में डूबती चली गयी। लावण्या के चेहरे का लावण्य गायब हो गया। वह गहरे सदमे में थी। लावण्या की हालत देख उसके पापा की चिंता बढ़ने लगी। एक दिन लावण्या के पिता ने समझाते हुए कहा, ‘‘ बेटी व्यक्तित्व के टकराव में अपने अस्तित्व की बलि क्यों चढ़ाना ?’’ 

पिता की कोई सलाह पहली बार लावण्या को भाया था। बिस्तर पर पड़ी लावण्या सिराहने बैठे पिता के जंघा पर सर रखकर सुबकते हुए बोली, ‘‘मेरे अरमान आसमान से उँचे हैं। मैं अब अस्तित्व की खोज करूंगी।’’ 

लावण्या को मुंबई में नई नौकरी मिल गयी तो मुंबई शिफट कर गयी। अचानक एक दिन मॉल में राज से मुलाकात हुई। अब राज नियमतः हर वीकेंड लावण्या से मिलता है। चुप्पी की चादर ओढ़ी लावण्या को  हँसाने की कोशिश करता। बचपन याद दिलाता है, और फिर उसे हँसाने का प्रयास करते हुए खुद ही रो देता । राज के आँखों में आँसू देख लावण्या राज का हाथ पकड़कर कहती, ‘‘ अब मैं पहले से ठीक हूँ राज।’’ 

राज अपनी जिम्मेदारी समझते हुए लावण्या की टूटती उम्मीदों को सहारा देने का प्रयास करता। लावण्या भी धीरे-धीरे राज पर डिपेंड हाने लगी। लावण्या का खुलापन ,आजाद ख्याल होना ,दुनिया को अपनी नजरों से देखने की प्रवृति का कायल तो राज पहले से ही था। अपने से ज्यादा विश्वास राज को लावण्या पर हुआ करता था। राज लावण्या के पुराने आत्मविश्वास को जगाने का भरपूर प्रयास करता। राज लावण्या को लेकर मनोचिकित्सक के पास गया। मनोचिकित्सक ने सेशन्स देना शुरू किया। मनोचिकित्सक ने राज बताया, ‘‘लावण्या को साकारात्मक और भावनात्मक सहयोग देते रहे। वह जल्द ही स्वस्थ्य हो जाएगी।’’        

राज, लावण्या को ड्राइव पर ले जाता। मुंबई की सैर कराता। लावण्या भी खुश रहने का प्रयास करने लगी। अक्सर राज मुंबई की सड़को पर भटक जाता। उसे याद ही नहीं रहता किस रास्ते से आए थे और किधर जाना है ? राज जब भी रास्ता भूलता। लावण्या कहती, ‘‘ अरे ! यार तुम कब बड़े होंगे। पहले भी पिट्ठू में तुम्हें जिस पत्थर पर मारना होता, उसके अलावा तुम्हें सभी पत्थर दिखते थे। और आज भी तुम्हारा यही हाल है।’’ 

एक दिन लावण्या ने राज को कहा, ‘‘ चलो हटो मैं गाड़ी ड्राइव करती हूँ।’’

राज ड्राइविंग सीट छोड़कर बगल वाली सीट पर बैठ गया। लावण्या स्टीयरिंग पकडा और गूगल मैप के सहारे राज को लाँग ड्राइव पर ले गयी। लावण्या को आत्मविश्वास के साथ गाड़ी ड्राइव करते देख, राज सोचने लगा, ‘‘ कितना अच्छा होता कि लावण्य यूँ ही सब कुछ संभाल लेती।’’ राज को भी अहसास होने लगा कि लावण्या अब जल्द ही सामान्य हो जाएगी।

राज लावण्या को समझाते हुए कहा, ‘‘ तुम्हे समर्थ से एक बार मिलना चाहिए। शायद बदलते वक्त के साथ जीवन को एक नया मुकाम मिल जाए।’’

‘‘ राज, उसे बंदिशे पसंद है और मुझे आजादी।’’

‘‘ सीमाओं में भी विस्तार संभव है – लावण्या।’’

‘‘ एक बार मिलना तो पड़ेगा ही। मुझे सिर्फ यह पूछना है, ‘‘जैसे उसने कहा अपने घर लौट जाओ वैसे ही यह क्यों नहीं कहा – कनाडा चली आओ या फिर दिल्ली, पापा-मम्मी के पास रहो।’’ 

राज मैं तुमसे पूछती हूँ – कहाँ है मेरा घर ?’’

भीतर से टूट रही लवण्या आपा खो दे, उससे पहले राज सचेत होकर बोला, ‘‘ जहाँ संवेदनाओं से सृजन की संभावना हो।’’

लावण्या आगे बोलने ही वाली थी कि मोबाइल की घंटी बजी। उसके पापा का फोन था। उन्होंने लावण्या को बताया कि समर्थ ने तालाकनामा भेजा है। उसकी आखिरी उम्मीद भी टूट गई। एक दर्द भरी खामोश सिसकियों में गुम हो गई। राज बेबस सा लावण्या को देख रहा था। वो चाहकर भी लावण्या के लिए कुछ नहीं कर पा रहा था।

बारिश हो रही थी। बाहर का मौसम थोड़ा सर्द था। लावण्या की हालत देख राज उसके पास रुक गया। राज ने स्वयं भोजन बनाया। लावण्या के मुँह में निवाला रखा। लावण्य राज की गोद में सर रख के सुबकने लगी। नन्ही सी गुड़िया की तरह सिमटने लगी। राज को कसने लगी। राज के भीतर भी सिरहन सी हुई और दोनों के हाथ एक दूसरे लिपटते चले गए।

         बारिश की वजह से बिजली कट चुकी थी। लावण्या की रेड मिडी थोड़ा अयस्त-व्यस्त हो चुकी थी। वक्ष के पास के तीन हुक खुल चुके थे। बाहर बिजली कड़क रही थी। बिजली की चमक के सहारे राज लावण्या के अन्र्तमन को सहलाने का प्रयास कर रहा था। दो युवा शरीर से उठती गंध से कमरा दमकने लगा। लावण्या की साँसे तबले की थाप सी उठ और गिर रही थी। राज के दिल की धड़कनें भी नर्तन करने को आतुर थी।

लावण्या गीली रेत में पड़े सफेद शंख सी चमक रही थी। राज की सलेटी देह उस शंख को पूरी तरह से ढक लेना चाहता था। दो देहों के बीच दस उँगलियाँ थरथरा रही थी। होंठों की थिरकन धीरे-धीरे कटि प्रदेश तक जा पहुँची। अचानक आसमन में बिजली कड़की, चमकती बिजली की चमक का एक हिस्सा लावण्या के चेहरे पर आ गिरा । राज को लावण्या पहले से अधिक सुन्दर और मासूम दिखी। उसकी मासूमियत देख राज के मन में विचार आया की भावनाओं के आवेग में बहते हुए जिस्म के जंगल में खो जाना ठीक नहीं। राज ने अपनी पकड़ ढ़ीली कर लावण्या के बिखड़े घुघराले बालों को सहेजने लगा। राज उसे सहलाते रहा और लावण्या सिमटती रही और दोनो कब सो गए ?, पता ही नहीं चला।  

सुबह में जब राज की नींद खुली तो लावण्या नहा-धोकर तैयार थी। राज जैसे ही बिस्तर से उठा लावण्या चाय लेकर हाजिर हुई। राज जिस लावण्या की खोज कर रहा था, वह उसके सामने थी। चाय की चुस्की लेते हुए लावण्या बोली, ‘‘ मुझे जुहू बीच ले चलो, नारियल पानी पीते हुए मुझे समुद्र की लहरों में सकून ढ़ूढ़ना है।”

‘‘ सकून की खोज समुद्र की लहरों में’’ मुस्कुराते हुए राज ने कहा।

‘‘ हाँ राज, तुफान में फँसी कश्ती को बाहर निकालने का हुनर तो सीखना ही होगा।’’

राज फौरन तैयार होकर लावण्या को जुहू बीच ले गया। समुद्र के किनारे सुबह की ठंडक मन को सुकून दे रही थी। लावण्या के चेहरा सकून भरा और शांत नजर आ रहा था। रात भर हुई बारिश के बाद सूरज की चमक लावण्या के चेहरे  par इन्द्रधनुषी छटा बिखेर रही थी।।राज बड़े ध्यान से लावण्या को देख रहा था। लावण्या के हाथों को अपने हाथ में रख राज ने सहलाते हुए पूछा, “अब कैसा महसूस कर रही हो।”

“ आजाद ! मानो किसी कैद से आजाद हुई हूँ। मुझे खुले आसमान में उड़ना है – राज। पूरी पृथ्वी और ये समुद्र सब नापना है।’’

‘‘ तुम जीवन की नई उड़ान भरो। मैं भी यही चाहता हूँ। लावण्या कई बंधन हमें कमज़ोर नहीं मज़बूत करते हैं।बिन डोर की पतंग आसमान में कहीं खो जाती है ,पर अगर पतंग की डोर सही हाथों में हो ,तो वो कोई भी ऊँचाई छू सकती है ।मैं तुम्हें ऐसे ही डोर से बंधना चाहता हूँ ।मैं तुम्हें एक ऐसा आसमान देना चाहता हूँ ।जहाँ तुम बेख़ौफ़ उड़ सको।और मैं तुम्हें उडता देख सकूं पा सकूँ ।बोलो क्या तुम तैयार हो ऐसी नई उड़ान के लिए ’’ 

‘‘ राज, मैं किसी के पैरों की बेड़ियाँ नहीं बनना चाहती और ना चाहती कोई मेरे पैरों की बेड़ियाँ बने।’’ राज के हाथों को कसते हुए लावण्या बोली।…

राज आगे कुछ बोलता कि लावण्या की फोन बज उठा। फोन लावण्या के ऑफिस से था। बात करने के बाद लावण्या बोली, ‘‘ मुझे आफिस जाना होगा, “अर्जेन्ट है।’’ 

दूसरे ही दिन लावण्या ने राज को घर बुलाया। राज के लिए लावण्या के घर का रास्ता नया नहीं था पर जानी-पहचानी गलियां अनजान लग रही थी। रास्ता काटे नहीं कट रहा था। रास्ते में राज ने रजनीगंधा के फुल ख़रीदे । लावण्या रजनीगंधा की खुशबू से खुश होती है। लावण्या का पसंदीदा फूल लिए राज लावण्या के घर पहुँचा। ब्लू जींस और वाइट टॉप के अंदर लाल रंग कुच वस्त्र पहनी लावण्या की कांतिमय छवि को देख राज मोहित होने लगा। हाथ में फॉसिल की घड़ी और खुले बाल ,कान में छोटे-छोटे सिल्वर स्टड्ज चमक रहे थे। लावण्या के चेहरे पर अजीब सी कशिश थी। आँखों का लाइनर आँखों को हसीन बना रहा था। राज आज लावण्या में खोता रहा था। लावण्या ने चुटकी बजाकर हँसते हुए पूछा ,कहाँ हो जनाब। “

राज फूलों का गुलदस्ता लावण्या के हाथों में देते हुए बोला, ‘‘बहुत अच्छी लग रही हो आज।’’ 

लावण्या हँसते हुए आँखे झुका ली। बिना कोई जवाब दिए किचन में चली गयी। कुछ देर बाद दो कप चाय लेकर हाजिर हुई। मजाकिया लहजे में राज ने कहा, “अरे आज तो बिना बोले चाय बना ली तुमने।’’

लावण्या अपनी आँखे राज पर टिकाते हुए बोली, ”राज तुमसे कुछ माँगना चाहती हूँ। बोलो ! क्या दे सकोगे ? ”

”बस जान मत माँगना जानेमन !’’ हँसते हुए राज ने कहा। 

लावण्या मासूमियत के साथ बोली,” राज मेरी आत्मा के घाव मुझे तुम्हारे साथ कभी खुश नहीं रहने देंगे। मुझे अपने अस्तित्व की खोज करनी है। मैं पूरी तरह से तुम्हारी होना चाहती हूँ। टुकड़ों में बटना नहीं चाहती। मुझे अतीत से मुक्ति पानी होगी। मैं तुम्हें किसी बंधन में बाँधना नहीं चाहती। पर ये जरूर चाहती हूँ कि मरने से पहले तुम्हारे साथ जी सकूँ।’’

राज कुछ समझ नहीं पा रहा था। वह लावण्या की बातों को गंभीरता से सुन रहा था। राज बिलकुल चुप्प था। अगले क्षण क्या होने वाला है। उसे समझ में नहीं आ रहा था।

घर का वातावरण बिलकुल शांत हो गया था । खामोशी के बीच लावण्या राज के हाथों को पकड़कर बोली, ‘‘ कंपनी की तरफ से मुझे डेनमार्क जाने का ऑफर है। उस दिन भी तुम्हें बताना चाहती थी, पर बता नहीं पायी। मुझे दो साल के लिए वहाँ जाना है। क्या तुम दो साल इंतजार कर सकते हो ? ’’

राज का दिल अचानक पत्थर सा हो गया।यहाँ तो राज से दो मिनट का सब्र बर्दाश्त नहीं हो रहा और लावण्या दो साल की बात कर रही थी । राज ने खुद को सँभालते हुए बमुश्किल से सिर्फ ”हाँ’’ कहा। शायद राज का जुबान साथ नहीं दे रहा थी ।राज के आँखों में नमी उतर आयी। लावण्या ने राज की गोद में सर रखकर बोली, ‘‘राज तुमने हर परिस्थिति में मुझे संभाला है। तुमसे बेहतर मुझे और कौन समझ सकता है ?’’

लावण्या के आँखों की चमक और उसकी मुस्कुराहट उसके लिए अनमोल है। उसने धीरे से लावण्या के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके माथे को चूमा। उसकी कमर को अपनी बाहों के घेरे में बाधा और बोला, ”तुम्हारी हर परेशानी में हमेशा तुम्हारे साथ खड़ा मिलूंगा। जाओ … मैं यहीं मिलूँगा।” 

तभी लावण्या का डोर बेल बजा। राज ने दरवाजा खोला तो देखा दरवाजे पर टैक्सी खड़ी है। राज समझ गया कि एयरपोर्ट के लिए टैक्सी आ चुकी थी। राज अंदर गया। लावण्या सूटकेस लेकर बाहर आयी। राज को फ्लैट की चाबी देते हुए बोली, ‘‘ अब यही रहना राज। दो साल बाद यहीं मिलूगी।’’ 

लावण्या ने एक बार फिर राज की ओर मुड़कर देखा। फिर चल पड़ी अपने अस्तित्व की खोज में। 

लावण्या की यह यात्रा हमें सिखाती है कि जीवन की सबसे बड़ी जीत आत्मसम्मान और अस्तित्व की पहचान है।


लेखक:
डॉ. ऋचा गुप्ता
सहायक प्रोफेसर,
दिल्ली विश्वविद्यालय, गाजियाबाद

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