विदेश में स्वदेश-राग : मातृभूमि के रुझान का आत्मीय संगीत

विदेश में रहने वाले मनुष्य का जीवन अक्सर एक ऐसे अदृश्य द्वैत में बदल जाता है, जिसे पासपोर्ट पर दर्ज नहीं किया जा सकता। उसका शरीर एक देश में रहता है, लेकिन उसकी स्मृतियाँ दूसरे देश में साँस लेती रहती हैं। वह जिस देश का नागरिक बन चुका है, वहाँ उसका वर्तमान आकार लेता है; लेकिन जिस मिट्टी में उसका बचपन, भाषा, संस्कार और संबंधों की पहली दुनिया बनी, वह उसके भीतर अपना घर बनाए रखती है।
यही इस विमर्श का केंद्रीय तर्क है—नागरिकता बदल सकती है, निवास बदल सकता है, जीवन-शैली बदल सकती है; लेकिन सांस्कृतिक स्मृति और स्वदेश-बोध का बदल जाना अनिवार्य नहीं है। मनुष्य कानूनी रूप से किसी दूसरे राष्ट्र का नागरिक हो सकता है, पर उसके भीतर का स्वदेश किसी सरकारी दस्तावेज़ से समाप्त नहीं होता।
विदेश में बसना इसलिए केवल दूरी तय करना नहीं है। यह कई बार अपने ही जीवन के एक हिस्से को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने जैसा है। पीछे छूट जाता है वह घर, जिसकी दीवारों पर बचपन की आवाज़ें थीं; वह आँगन, जहाँ ऋतुएँ परिवार के साथ बदलती थीं; वह स्कूल, जिसकी घंटी आज भी स्मृति में सुनाई देती है; वे गलियाँ, जिनमें रास्तों से अधिक रिश्ते थे; माँ की रसोई, पिता की आवाज़, भाई-बहनों की नोकझोंक, त्योहारों की चहल-पहल और पड़ोस की वह सहज आत्मीयता, जिसके लिए किसी परिचय-पत्र की आवश्यकता नहीं होती थी।

विदेश में मनुष्य नया घर बना लेता है, लेकिन पुराना घर उसके भीतर बना रहता है।
यही स्वदेश-राग की पहली पीड़ा है।
वह नए देश में पूरी तरह जीवन जीता है—काम करता है, कमाता है, कर देता है, घर और सामाजिक संबंध बनाता है, नई भाषा और नई जीवन-शैली अपनाता है। फिर भी कभी किसी अपरिचित भीड़ में अचानक अपनी भाषा सुनकर ठिठक जाता है; किसी पुराने गीत की धुन सुनकर आँखों में बचपन उतर आता है; किसी भारतीय व्यंजन की खुशबू से माँ की रसोई सामने आ जाती है। उस क्षण वर्तमान कुछ पल के लिए पीछे हट जाता है और स्मृति वर्तमान पर अधिकार कर लेती है।
यह केवल याद करना नहीं है; यह अपने ही भीतर लौटना है।
इसीलिए विदेश में रहने वाले व्यक्ति का अनुभव केवल “यहाँ” और “वहाँ” के बीच नहीं होता। वह एक साथ दो समयों में भी जीता है—वर्तमान में विदेश और स्मृति में स्वदेश; जीवन में नया संसार और मन में पुराना घर। बाहर वह अपने नए समाज का हिस्सा होता है, भीतर वह उन रिश्तों और संस्कारों से संवाद करता रहता है, जिनसे उसकी पहचान की पहली नींव पड़ी थी।
यह द्वैत कभी सुख देता है, कभी पीड़ा। नया देश अवसर देता है, पर पुराना देश आत्मीयता की कमी का एहसास करा सकता है। नई दुनिया में उपलब्धियाँ मिलती हैं, लेकिन कभी-कभी उन्हीं उपलब्धियों के बीच यह प्रश्न भीतर उठता है—जिसे मैंने पाया है, उसके साथ मैंने क्या-क्या पीछे छोड़ दिया?
यही वह क्षण है जब स्वदेश केवल भौगोलिक स्थान नहीं रह जाता। वह एक भावनात्मक आश्रय बन जाता है।
स्वदेश की यह उपस्थिति सबसे अधिक तब दिखाई देती है, जब व्यक्ति को किसी परिचित कंधे की जरूरत होती है, किसी ऐसी आँख की तलाश होती है जो बिना शब्दों के उसे समझ सके, या किसी ऐसी आवाज़ की प्रतीक्षा होती है जिसमें औपचारिकता नहीं, अपना होने का भरोसा हो। विदेश में रहने की सबसे गहरी अनुभूति शायद यही है कि मनुष्य भीड़ में अकेला नहीं होता, लेकिन अपनापन न मिले तो अकेलापन बहुत गहरा हो सकता है।
इसी रिक्ति को संस्कृति भरती है।
भारतीय सिनेमा, टेलीविजन, संगीत, साहित्य, नृत्य, भोजन और त्योहार विदेश में बसे भारतीयों के लिए केवल मनोरंजन नहीं रह जाते। वे स्मृति और वर्तमान के बीच पुल बन जाते हैं। पर्दे पर दिखाई देता एक भारतीय परिवार, सुनाई देता कोई गीत, किसी त्योहार की झाँकी, माँ के हाथ के भोजन जैसा कोई स्वाद—ये सब उस संसार को फिर से उपस्थित कर देते हैं, जो भौगोलिक रूप से दूर हो चुका है।
इसलिए किसी विदेशी शहर में बैठकर भारतीय फिल्म देखना कभी-कभी केवल फिल्म देखना नहीं होता; वह अपने अतीत से कुछ देर मिलना होता है। किसी भारतीय व्यंजन को खाना केवल स्वाद लेना नहीं, बल्कि स्मृति का स्वाद लेना हो सकता है। कोई पुराना गीत केवल संगीत नहीं रहता—वह किसी व्यक्ति, किसी ऋतु, किसी त्योहार या किसी घर का दरवाज़ा खोल देता है।
इस अर्थ में संस्कृति विस्थापन के बीच केवल पहचान बचाने का माध्यम नहीं; वह आत्मीयता को पुनः रचने की प्रक्रिया भी है। वह विदेश में बसे व्यक्ति को यह अनुभव कराती है कि उसका स्वदेश पूरी तरह पीछे नहीं छूटा—उसका एक अंश उसके साथ चला आया है।
शायद इसीलिए विदेश में भारतीय घरों के भीतर अक्सर एक अदृश्य भारत बसता है। बाहर की सड़क, भाषा, मौसम और सामाजिक व्यवस्था भले ही विदेशी हों, लेकिन घर के भीतर कोई गीत, कोई पूजा, कोई किताब, कोई व्यंजन, कोई त्योहार या कोई मातृभाषा अचानक उस स्थान का अर्थ बदल देती है।

घर के बाहर विदेश हो सकता है; घर के भीतर स्वदेश जीवित रह सकता है।
और यहीं यह प्रश्न और गहरा हो जाता है—क्या मनुष्य सचमुच अपने देश से दूर चला जाता है, या उसका देश उसके भीतर उसके साथ चलता रहता है?
शायद प्रवासन की सबसे मार्मिक सच्चाई यही है कि मनुष्य जगह बदल सकता है, पर अपनी स्मृतियों से पूरी तरह निर्वासित नहीं हो सकता। वह नए भूगोल में अपना वर्तमान रचता है, लेकिन उसके भीतर पुराना भूगोल अपनी आवाज़ बनाए रखता है।
इसी आवाज़ का नाम है—स्वदेश-राग।
एक ऐसा राग, जिसमें दूरी भी है और निकटता भी; उपलब्धि भी है और विरह भी; नया जीवन भी है और पीछे छूटा हुआ संसार भी।
जिसे नागरिकता बदल नहीं सकती, दूरी मिटा नहीं सकती और समय पूरी तरह मौन नहीं कर सकता।




