समझदारी से करें पैरेन्टिग
बच्चे जब बालिग और समझदार हो जायें तथा रोजी-रोजगार से लग जायें तब ‘‘माता-पिता‘‘ को अच्छा स्रोता बन जाने मे ही समझदारी है.यह समय चक्र है और ठीक वैसा ही है जब बच्चों को आप तरह-तरह की हिदायत देते थे और वो सुनते थे। बच्चों के पास यह लिबर्टी होती है कि वे आपकी किस बात को माने और किस बात को नहीं। लेकिन आपके पास ऐसी लिबर्टी बहुत ही सीमित होती है। यही सृष्टि का चक्र है जो चलता आ रहा है और चलता रहेगा। यह गणित का फार्मूला नहीं है जिसका उत्तर हू-ब-हू मिल जाये। लेकिन थोड़ा-बहुत उन्नीस-बीस के साथ यह बिल्कुल एक ढर्रे पर चलने वाला फार्मूला है।

इसमे एक तथ्य और जोड़ लीजिए बच्चा बालिग, समझदार, रोजगार युक्त और शादी-शुदा भी हो गया है तब पैरेंट्स की स्थिति तलवार के धार पर चलने वाली हो जाती है क्योंकि आप परिवार को जोड़कर और साथ लेकर चलना चाहते हैं और बच्चे उन्मुक्त जीवन जीना चाहते हैं। लड़के को बहु अपनी ओर तथा लड़की दामाद को अपनी ओर खींचेगी। ऐसी स्थिति मे पैरेंट्स तेजी से बुढ़ापे और लाचारी की ओर खिसकते चले जाते हैं। मैं उपर कह चुका हूं कि ऐसी सिचुएशन को संभालने या इससे बाहर निकलने का कोई निर्धारित फार्मूला नहीं है। और जरूरी यह भी नहीं कि सभी परिवार की स्थिति एक समान हो।
एकल संतान (लड़का या लड़की) वाले पैरेंट्स के साथ की स्थिति थोड़ी और अलग है। अगर आपने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा-दीक्षा दी है तब वह नौकरी-रोजगार केलिए दूर-दराज भी जायेगा इसमे परदेश भी शामिल है। क्योंकि प्रदेश या केन्द्र सरकार के पास नौकरी सीमित है और बच्चे पैकेज वाली नौकरी की इच्छा रखेंगे ही। ऐसे मे बच्चों को रोकना भी उचित नहीं। उन्हें खुद निर्णय लेने दें क्योंकि उन्हें आपने अच्छी शिक्षा और दीक्षा दी है। अपने स्वार्थ मे उन्हें रोकना कतई उचित नहीं। अच्छी शिक्षा-दीक्षा के बाद सबकुछ प्रभु की इच्छा और समय चक्र पर छोड़ देना ही उचित है।

Senior Journalist, Author, Actor, and
Administrative Officer
Magadh University, Bodh Gaya
डॉ. अमरनाथ पाठक
लेखक शिक्षाविद, वरिष्ठ पत्रकार,
साहित्यकार व फिल्म कलाकार




