पिताजी – राजभाषा हिंदी सम्मान प्रतियोगिता 2024 की विजेता कहानी
“राजभाषा हिंदी सम्मान प्रतियोगिता 2025 में सांत्वना पुरस्कार प्राप्त यह कहानी मासूमियत, रिश्तों और अनजाने पलों में छिपी भावनाओं को बारीकी से चित्रित करती है। सरल जीवन की इस छोटी-सी घटना में प्यार, पछतावा और सीख—तीनों का अनोखा संगम मिलता है।”

पीपल का घना वृक्ष और उस वृक्ष की धड़ को घेरे ईंट से बना एक चबूतरा, जो अब कई कोनों से ढह चुका था। एक कोना जो अब तक सुरक्षित बचा था, उस पर अपने आप को टिकाए धरती को अपनी गंभीर नज़रों से रसातल में पहुँचाने की चेष्टा करता वो।

जीवन की इस छोटी-सी आयु में ही जितना मैंने उसको जाना था, उतना उसको कोई और तो क्या, वो खुद भी नहीं जानता था। हम दोनों को अक्सर लोग राम-लखन कहा करते थे। न लोगों ने बताया और न हमने जानने की कोशिश कि हममें से कौन राम है और कौन लखन—दोनों ही राम थे और दोनों ही लखन।
लंबाई में हम दोनों में मात्र उन्नीस-बीस का फ़र्क था। वो बीस था, सिर्फ लंबाई में नहीं बल्कि सब कुछ में। इसलिए उसे दुख भी मुझसे बीस ही मिले थे। वो कहते हैं न—ईश्वर जिसको दुख देता है, उसे उस दुख को झेलने की हिम्मत भी देता है।
औसत से तनिक लंबा, मिट्टी जैसे रंग का शरीर और साथ में ऐसा मुख जिस पर हमेशा छाई रहती थी एक मुस्कान जिसे आज तक किसी ने फीकी नहीं देखी थी; मैंने भी नहीं… लेकिन आज… आज वो मुख निर्वाण पड़ा था और जैसे रेगिस्तान में पानी का कोई अता-पता नहीं मिलता, बिल्कुल वैसे ही आज उसके मुख पर फीकी मुस्कान का भी अता-पता नहीं था।
बिल्कुल शांति से मैं उसके करीब जा बैठा और पढ़ने की कोशिश करने लगा उसके चेहरे को और उस पर आने वाले अनेकानेक भावों को गुत्थी मानकर सुलझाने का प्रयास करने लगा। उसके चेहरे पर आने वाले भावों में कोई कमी नहीं हुई और न ही उसे आभास हुआ मेरे वहाँ होने का। अंत में जब मैं उन गुत्थियों को सुलझाने में विफल रहा और खुद ही उलझने लगा उनमें, तो थक-हारकर मैंने ही उस चुप्पी को खत्म करने की ओर कदम बढ़ाया।
उसके कंधे पर अपना दाहिना हाथ रखते हुए पूछा मैंने—
“क्या बात है, आज वो कहाँ गई?”
मेरे हाथ रखते ही उसके शरीर में एक कंपन हुई और तुरंत ही अपने आप को संभालते हुए उसने पूछा—
“कौन वो?”
“मुस्कान।”
“मुस्कान? वो कौन है?”
“अरे वही… तुम्हारे चेहरे पर हमेशा छाई रहने वाली मुस्कान।” — खिलखिलाकर हँसते हुए मैंने उसे छेड़ने की कोशिश की। लेकिन उसके चेहरे पर कोई भी भाव नहीं आया और उसने सवाल का जवाब देने की अनिवार्यता को पूरा करने के लिए सिर्फ अपना सिर हिलाया।
मैं चाहता तो उससे कुछ और पूछकर या अपने मज़ाक से उसके चेहरे पर एक फीकी ही सही, लेकिन मुस्कान ला सकता था—लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। उसे जूझने दिया अपने सवालों से और अनवरत उसे निहारता रहा।
कुछ देर बाद शायद उसे अपने भीतर के सवालों के जवाब मिल गए, या वो ऊब गया उन सवालों से और फिर अचानक उठकर खड़ा हो गया। मेरी ओर देखते हुए उसने कहा—

“तुम अभी तक यहीं हो! चलो चलते हैं रामसागर के यहाँ जलेबी खाने।”
ऐसा कहकर मेरी प्रतिक्रिया जाने बिना वो आगे बढ़ने लगा और मजबूरन मुझे भी उसके साथ जाना पड़ा।
मिठाई की दुकान तक जाने के दौरान भी वो चुप ही रहा और मैं उसकी चुप्पी का कारण जानने की कोशिश में लगा रहा। मेरा अंतर्मन शायद उसकी चुप्पी का कारण जानता था, लेकिन मैं उसके मुख से उसकी पुष्टि चाहता था। हम रामसागर के यहाँ पहुँचे और आज वो उस कोने वाली टेबल के पास जा बैठा जहाँ अमूमन सोमरस ग्रहण करने वाले अपना आधिपत्य जमाए रहते हैं। उसे उस टेबल की ओर जाता देखकर मैं तो हतप्रभ था ही, साथ में रामसागर जी का पोता भी मेरी तरह ही आश्चर्यचकित था। उसने एक नज़र मुझ पर डाली जैसे वो पूछ रहा हो—कोई ऐसी-वैसी बात तो नहीं हुई है न? इसका जवाब तो मेरे पास भी नहीं था, लेकिन मैं हँसते हुए उसकी नज़रों से ओझल हो गया।
उस टेबल के पास रोशनी बहुत थोड़ी मात्रा में ही पहुँच पाती थी। मैं भी उसका साथ देने के लिए उस अंधकार को अपनाने में जुट गया। वो अभी भी सिर झुकाए किसी शून्य की तलाश में था। उसकी तरह मैं गंभीर होना ही चाहता था कि इतने में मेरे नाक तक जलेबी की सोंधी-सी खुशबू पहुँची और मेरा ध्यान अपनी ओर खींच ले गई। मैं उठा और दो दोने में गरम-गरम जलेबी लेकर जीभ लपलपाता हुआ उसके पास पहुँचा।
दोने को उसके सामने रखते हुए मैंने चुप्पी की सत्ता को समाप्त किया और सीधे उससे पूछ बैठा—
“देखो! मैं दोबारा नहीं पूछूँगा इसलिए पहली बार में ही बता दो कि बात क्या है?”
उसने कहा—“बताता हूँ।”
थोड़ी देर शांत रहने के बाद जैसे ही उसने अपना सिर उठाया, तो उसकी आँखें उगते सूर्य के समान लाल हो चुकी थीं। इसका मतलब वो इतनी देर से सिर झुकाए चुपचाप रो रहा था? मैं उससे इसका कारण पूछने ही वाला था कि वो अपनी आँखें पोंछते हुए बोल उठा—
“अरे! घबरा मत, ये तो खुशी के आँसू हैं।”
“खुशी के आँसू? क्यों? ऐसा क्या हुआ?”
विपुल अब सामान्य स्थिति में पहुँच चुका था लेकिन उसकी आँखों में अभी भी भाव कम नहीं हुए थे—और शायद वो उन्हें कम भी नहीं करना चाहता था। उसने भर्रायी आवाज़ में कहा—
“आज पिताजी ने मुझे नाम से पुकारा।”
“सच में?”
“हाँ! और उन्होंने कहा कि मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।”
“तो क्या बात हुई?”
“कुछ नहीं।”
“क्यों?”
“अरे, वो कुछ लोग उनसे मिलने आ गए थे, इसलिए उन्होंने कहा कि बाद में बात करेंगे।”
“क्या लगता है तुम्हें? क्या बात करनी होगी?” — उसने बिना रुके ही मुझसे ये पूछ लिया।
“शायद वो तेरे बाहर पढ़ने जाने की बात करने वाले हों।” — मैंने हवा में तीर चलाया ताकि उसे थोड़ी शांति मिले।
“चल, चल… ज्यादा सोच मत। तुम वो सब कर लोगे जिससे तुम्हारे पिताजी तुम पर गर्व कर सकें। चिंता मत कर।” — मैंने उसे झंझावातों से बचाने का प्रयास किया और हम साथ-साथ रामसागर के यहाँ से घर की ओर निकल पड़े।
गाँव की पक्की सड़क पर चलते हुए दाहिने तरफ का पोखर और उसके पास ही बना बजरंगबली का मंदिर जिसे छाया पहुँचा रहा था वही पीपल का घना वृक्ष जिसके चबूतरे से उठाकर ले गया था मैं उसे… हम फिर आ पहुँचे थे वहीं और वो फिर से चिंताओं से घिरकर बैठ जाना चाहता था उस वृक्ष के नीचे जैसे उसके सारे सवालों के जवाब उसे पोखर से आती ठंडी हवा में मिलते या उसे उस घने वृक्ष के पत्तों पर लिखा मिलता।
जब भी उसे चिंताएँ घेरती थीं, वो आकर बैठ जाता था इस पेड़ के नीचे और हर बार जब वो उठता था यहाँ से तब उसके चेहरे पर छाई वो मुस्कान—जो आज नदारद थी—इस बात की पुष्टि करती थी कि उसे उसके सवालों के जवाब मिल गए।
जब भी मुझे चिंताएँ घेरती थीं तो हर बार वो कहता था कि जाकर बैठ जा उस पेड़ के नीचे और तुझे वहाँ सारे सवालों के जवाब मिल जाएँगे।
मैंने छेड़ा था उसे कि वहाँ कौन देता है तुझे तेरे सवालों के जवाब? उस पोखर से आती शीतल एवं मंद बयार, या उस पेड़ की पत्तियाँ जो सूखने पर आ जाती हैं धरती पर? और उसने कहा था कि ये सब तो देती ही हैं मेरे सवालों के जवाब, लेकिन कोई और है जो हर लेता है मेरे सारे संकट को।
“अच्छा! वो कौन है?” — मैंने उससे पूछा था।
“तूने सुना नहीं है?”
“क्या?”
“को नहीं जानत है जग में कपि… संकटमोचन नाम तिहारो।” — ये कहते-कहते वो भावविह्वल हो चुका था।
आज मैं भी बैठ गया था उसके साथ उसके सवालों के जवाब ढूँढने के लिए, लेकिन कुछ ही वक्त बीतने के बाद मैं उन सवालों को सुलझाने की जगह खुद ही उनमें उलझने लगा था। विपुल के चेहरे पर उमड़ने वाले भाव भी ये बता रहे थे कि आज उसे भी कुछ विशेष सफलता नहीं मिल रही है। मैं नहीं चाहता था कि विपुल अभी बेकार की चिंताओं में खुद को फिर से उलझा ले, इसलिए मैंने उसे किसी तरह वापस घर भेज दिया और मैं खुद बैठा रहा उस विशाल वृक्ष के नीचे—अपने हृदय को विशाल किए क्योंकि उन उलझे सवालों को सुलझाने के लिए हृदय को बेहद कठोर बनाने की आवश्यकता थी।
उसके जाने के बाद भी मैं उसके सवालों के ही जवाब ढूँढने में लगा रहा। सवाल क्या थे? बस जिज्ञासाएँ थीं… आज इतने वर्षों के बाद राघवेंद्र चाचा ने विपुल को क्यों पुकारा? क्या बात करनी है उनको?
इन सवालों के जवाब ढूँढते-ढूँढते मुझे मिला एक और सवाल, जो इन सवालों की उत्पत्ति का कारण बना था—राघवेंद्र चाचा और विपुल में कब से बात बंद हुई थी? और क्यों ऐसा हुआ था? ऐसा क्या हुआ जो दोनों के बीच का मतभेद शायद मनभेद तक बढ़ गया था?
इन सब सवालों के जवाब मुझे पता हैं—but आपका भी इसे जानना बहुत आवश्यक है। भारतीय परिवेश में ऐसा हमेशा से देखा गया है कि बेटे के एक उम्र की दहलीज पार करने के बाद उसकी पिता से दूरी बढ़ने लगती है और बीच में केवल एक सुराख़ ही नहीं रहता बल्कि बन जाती है एक खाई; जिसे पाट पाना न पिता से हो पाता है और न ही पुत्र से… यही हुआ था इन दोनों के बीच भी।
राघवेंद्र चाचा घर के बाहर मितभाषी नहीं थे लेकिन घर में आते ही केवल उनकी चुप्पी ही बोलती थी। चूँकि राघवेंद्र चाचा के छोटे भाई-बहन उनसे डरते थे, तो इसका प्रभाव विपुल पर भी पड़ा। विपुल उनके व्यक्तित्व को समझने का प्रयास करता रहता और उनके मध्य संवादों की कमी ने उसे केवल उनके स्नेह से वंचित नहीं रखा बल्कि दोनों के मध्य बन गई एक खाई।
विपुल जब अपने बाल्यावस्था से किशोरावस्था की ओर बढ़ रहा था, तब उसके पिताजी उससे बहुत दूर रहने लगे थे और इस कारण उनके बीच की खाई कभी भर ही नहीं पाई। लेकिन पिछले कुछ समय से राघवेंद्र चाचा वापस अपने घर आ गए थे। अब विपुल किशोरावस्था में प्रवेश कर चुका था और इस उम्र के बच्चों में जो विद्रोह की उद्भावना जागृत हो जाती है; वही विपुल में भी हुई थी।
राघवेंद्र चाचा की समझ आमजनों से बहुत बेहतर थी और उनकी दूरदृष्टि उन्हें भीड़ से अलग करती थी, लेकिन उनकी इस दूरदृष्टि को अगर कोई नहीं समझ पाता था, तो वो था विपुल—और इसी ने दोनों के बीच मतभेद को उत्पन्न किया था।
इन मतभेदों के होने के बाद भी विपुल अपने पिताजी का बहुत सम्मान करता था और उस सम्मान के कारण उनसे बात करना तो क्या, वो उनसे नज़रें नहीं मिला पाता था। मेरे बड़े पापा ने एक बार विपुल से कहा भी था कि—
“बेटे, सम्मान करने और डरने में बहुत महीन अंतर होता है और इस अंतर का ज्ञान हमेशा होना चाहिए।”
विपुल को उस अंतर का ज्ञान हुआ था या नहीं; ये नहीं पता। शायद उसके भीतर अपने पिता के प्रति सम्मान की ही अधिकता थी, जिसके कारण उसने कभी भी ऐसा कुछ नहीं किया जिससे उसके पिता का सिर झुक जाए—और उसे इसमें अपार सफलता भी मिली थी।
तो आज ऐसा क्या हुआ जिसके बारे में राघवेंद्र चाचा विपुल से बात करना चाहते थे? दिन ढल चुका था और आसमान में चंद्रमा अपनी सत्ता स्थापित करने में जुट चुका था। अब सारे सवालों के जवाब तब ही मिलेंगे जब चंद्रमा की सत्ता को विस्थापित करने आसमान में सूर्य का आगमन फिर से होगा।
मैं पूरी रात चंद्रमा से ‘घृणा’ करता रहा और सूर्य की प्रतीक्षा में आसमान को तकते-तकते ख्वाबों की दुनिया में राघवेंद्र चाचा और विपुल के मध्य होने वाले संवादों की बुनियाद रखने लगा। ख्वाबों की दुनिया में विचरते-विचरते नींद के आगोश में चला गया और जब उठा तो सूर्य की सत्ता स्थापित हो चुकी थी। मैं विपुल की बाट जोहने लगा और दिन ढलने के ठीक पहले उसका खुशनुमा चेहरा मेरी आँखों के सामने था।
“ऐसा क्या कह दिया राघवेंद्र चाचा ने कि तेरे चेहरे पर इतना नूर आ गया है?” — मैंने बिना वजह की देरी किए तपाक से पूछ लिया।
“मुझे गलत रास्ते पर जाने से बचा लिया।”
“तू कौन सा गलत रास्ते पर जा रहा था, जो उन्होंने तुझे बचा लिया?”
“मैंने पैसे कमाना ही सबसे बड़ा धर्म मान लिया था।”
“अच्छा! वो कैसे?”
“मैंने ये मान लिया था कि पैसे कमाने से मेरी सारी समस्या हल हो जाएगी।”
“ऐसा कब होता है? समस्याओं का अंत थोड़े ही है।”
“मैं तो अब तक यही समझता था।”
“तो गलत थे तुम—but उन्होंने ऐसा क्या कह दिया कि एक रात में तुम्हें अपनी गलती का एहसास हो गया?”
“पहले पूछा उन्होंने कि आगे क्या करना चाहते हो? तो मैंने कह दिया कि ढेर सारे पैसे कमाने हैं।”
“अच्छा! और उससे क्या होगा?” — राघवेंद्र चाचा ने कहा।
“मेरी सारी परेशानियाँ खत्म हो जाएँगी।”
“इसका मतलब तुम्हारे लिए पैसे कमाने वाले ही अच्छे और महान इंसान होंगे?”
“हाँ।”
“इसके अनुसार तो मैं बुरा इंसान हूँ क्योंकि मैंने तो जीवन में उतने पैसे नहीं कमाए।”
विपुल के पास इसका कोई जवाब नहीं था और वो चुप रहा।
“बेटा, बात अगर केवल पैसे कमाने की है तो मैं कल से पैसे कमाने में ही लग जाता हूँ—और ऐसा नहीं है कि मुझे पैसे कमाने के मौके नहीं मिले। बल्कि मुझे पैसे की कभी उतनी ज़रूरत ही नहीं पड़ी और सबसे बड़ी बात कि मैं कभी गलत रास्ते पर चलकर पैसे नहीं कमाना चाहता था।”
विपुल चुपचाप अपना सिर झुकाए उनकी बातों को सुन रहा था और उसके मन में बहुत सारे सवाल बन रहे थे—but वो उन सवालों के जवाब खुद ढूँढना चाहता था।
“देखो! इधर देखो… मुझे कभी ऐसा नहीं लगा था कि तुम पैसे के पीछे दीवाने हो जाओगे। तुमने इस छोटी-सी उम्र में ही सही—but कभी कुछ ऐसा नहीं किया कि हम सबको कभी तुम्हें रोकना या टोकना पड़े।”
विपुल के चेहरे पर कुछ भाव उमड़े।
“तुम्हारी पीढ़ी के बच्चे अपना सही-गलत बहुत बेहतर जानते हैं—but तुम सब में एक ही समस्या है कि सब बस प्रसिद्धि और पैसे के पीछे दिन-रात भागते रहते हो। हालांकि इसमें भी दोष तुम लोगों का नहीं है; बल्कि दोष है समय का।
तो बेटा, बाहर निकलो अपने फोन की दुनिया से और समाज को देखो। अपने बड़े-बुजुर्गों से जीवन के बारे में सुनो और उनको अपने समय की ज़रूरतों के हिसाब से अपने जीवन में भी शामिल करो—और फिर देखो कि जीवन जीना कितना सरल और रुचिकर हो जाता है।”
“जी।” — विपुल ने कहा था।
“दुनिया और समाज को समझ लो कुछ दिन, और उसके बाद जो सही लगे वो करना। इस बात की चिंता मत करना कि मैं क्या सोचूँगा और लोग क्या सोचेंगे। तुम बस सही रास्ते—जो कि तुम्हें सही लगे अपनी बुद्धि के अनुसार—उस पर चलते चले जाना और फिर देखना, तुम्हें सब कुछ मिलेगा जिसकी तुम्हें जरूरत होगी।” — राघवेंद्र चाचा ने कहा था।
“और हाँ! एक और बात… मुझे पता है कि तुम कभी गलत रास्ते पर नहीं जाओगे, तो बस जो सही लगे वो करना।” — इतना कहकर राघवेंद्र चाचा कमरे से बाहर चले गए थे।
इतना कहते-कहते विपुल की आँखें आँसुओं से नम हो चुकी थीं। आगे उसने कहा—
“जानते हो, आज सुबह से बैठा था उसी विशाल वृक्ष के नीचे जहाँ मुझे मेरे सवालों के जवाब तो मिलते ही हैं और जहाँ मेरे सारे संकटों का हरण भी होता है। अभी वहीं से आ रहा हूँ।”
“तो मिल गए सारे जवाब?”
“हाँ! मिल गए—and अब जा रहा हूँ उन सवालों के मिले जवाबों का असल जिंदगी में प्रयोग करने के लिए।” — इतना कहते-कहते विपुल अचानक से उठा और मेरे सामने से बिल्कुल तेज़ रफ़्तार से चला गया।
मैं चाहता तो था कि उसको रोक लूँ या उसके पीछे चला जाऊँ—but मैं अभी भी राघवेंद्र चाचा के द्वारा नई पीढ़ी को दी गई उस अमूल्य सलाह को अपने भीतर किसी कोने में सहेजकर रख रहा था।
विपुल मेरे यहाँ से जब निकला तो वो मुझसे नहीं भाग रहा था बल्कि अपने पिता की तरफ़ भाग रहा था क्योंकि आज उसे पैसे से भी बहुमूल्य धन मिल गया था। वो भागता-भागता पहुँचा अपने पिता के कमरे के पास और थोड़ी साँसें जमा करने के बाद उनके कमरे में दाखिल हुआ।
राघवेंद्र चाचा उस समय अपने कमरे में टहलते-टहलते एक किताब पढ़ रहे थे और विपुल को आया देखकर वे रुक गए। वे अपने चश्मे के ऊपरी हिस्से से विपुल को हाँफता देख ही रहे थे कि इतने में विपुल कलपते हुए उनके सीने से लिपट गया।
घबराते हुए राघवेंद्र चाचा ने सवालों की बौछार लगा दी—
“क्या हुआ विपुल? रो क्यों रहे हो? कुछ हुआ है क्या?”
कलपते हुए जवाब दिया था विपुल ने—
“हाँ!”
“क्या हुआ बेटे? बोलते क्यों नहीं?”
“आज मुझे मिल गया वो धन जिसके पीछे मैं दीवाना बना घूमता रहता था।”
विपुल की बात सुनकर अब राघवेंद्र चाचा भी कलपने लगे थे और दोनों पिता-पुत्र एक-दूसरे को सीने से लगाए कर रहे थे गणना उस बहुमूल्य धन की…





