नीव के पत्थर

नींव के पत्थर – इंद्रजीत पासवान: एक चपरासी की कहानी, जो हर ऑफिस का आधार है I

“हर इमारत ऊँची होती है, लेकिन नींव हमेशा ज़मीन में छुपी रहती है।”

जब भी हम किसी दफ्तर की बात करते हैं, हमारी सोच ज़्यादातर ऊपरी पदों तक ही सीमित रह जाती है — विभागाध्यक्ष, रजिस्ट्रार, प्राचार्य, मैनेजर, अधिकारी… लेकिन क्या कोई दफ्तर केवल इन पदों से चल सकता है? क्या कोई संस्थान सिर्फ आदेश देने से आगे बढ़ सकता है?

नहीं।

हर दफ्तर के भीतर कुछ ऐसे मौन और समर्पित कर्मवीर होते हैं, जिनकी भूमिका भले ही औपचारिक रूप से “चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी” कही जाए, लेकिन उनका योगदान संस्थान की आत्मा से कम नहीं होता। चपरासी या सहायक कर्मचारी उस नींव के समान होते हैं, जिन पर पूरी इमारत टिकी होती है। वे दरवाज़े खोलते हैं, चुपचाप फाइलें उठाते हैं, हर आदेश को बिना हिचक पूरा करते हैं, और बिना नाम या शोहरत की चाहत के अपने कर्म में लीन रहते हैं।

हर विभाग की गति, हर काम की निरंतरता, हर निर्णय की प्रक्रिया में उनका मौन सहयोग अनिवार्य होता है। उनके बिना विश्वविद्यालय हो या कार्यालय, अस्पताल हो या कोर्ट — सबका संचालन ठप हो सकता है।

आज हम कैफ़े सोशल मैगज़ीन के “नींव के पत्थर” स्तंभ में ऐसे ही एक कर्मयोगी की प्रेरक जीवन यात्रा प्रस्तुत कर रहे हैं — इंद्रजीत पासवान


एक सरल जीवन का महान संदेश

इंद्रजीत पासवान, मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के हिंदी विभाग में चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी के रूप में वर्षों से कार्यरत हैं। वे न तो मंच पर बोलते हैं, न अख़बारों में उनका नाम आता है, लेकिन हर दिन विश्वविद्यालय की धड़कनों में उनका श्रम शामिल होता है।

सुबह समय पर आना और शाम को समय पर जाना, यह उनके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है — सटीकता और अनुशासन उनकी आदत बन चुकी है। उनके जिम्मे फाइलें लाना-लेजाना, चाय-पानी की व्यवस्था, विभागीय सूचनाएँ पहुँचाना, छात्रों की मदद करना जैसे छोटे-छोटे लेकिन बेहद ज़रूरी काम होते हैं, जिन्हें वे बेहद ईमानदारी और तत्परता से करते हैं।

हिंदी विभाग से मुख्य कार्यालय की दूरी लगभग आधा किलोमीटर है, और यह दूरी वे एक दिन में कम से कम 25 बार तय करते हैं — कभी शिकायत नहीं, कभी थकान नहीं। उनका यह श्रम किसी को दिखाई न दे, लेकिन विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली उनके बिना संभव नहीं।


धैर्य और संतोष की मिसाल

इंद्रजीत जी को देखकर एक बात स्पष्ट होती है — जो व्यक्ति संतोषी होता है, वही वास्तव में सुखी होता है। वे न कभी अपनी नौकरी को बोझ मानते हैं, न किसी काम से पीछे हटते हैं। अगर किसी छात्र को कोई फॉर्म भरना है, कोई अभिभावक विभाग से जानकारी चाहता है, या किसी वरिष्ठ अधिकारी को तत्काल कोई फाइल चाहिए — इंद्रजीत पासवान तुरंत उपलब्ध होते हैं।

उनकी कार्यशैली में धीमा लेकिन सटीक प्रदर्शन है — कभी जल्दबाज़ी नहीं, कभी लापरवाही नहीं। उनके पास थोड़ा तकनीकी ज्ञान भी है, और आवश्यकता पड़ने पर वे कंप्यूटर से जुड़ा कार्य भी निपटा लेते हैं।


ईश्वर में आस्था, कर्म में विश्वास

उनके जीवन का एक विशेष पक्ष है — ईश्वर में अटूट आस्था। वे मानते हैं कि “इस संसार में जो कुछ भी मिलता है, वह केवल ईश्वर की इच्छा से ही प्राप्त होता है। मनुष्य मात्र एक माध्यम है। इसलिए किसी से ईर्ष्या करना या लोभ पालना व्यर्थ है।”

उनके पास भौतिक साधन कम हैं, लेकिन मानसिक शांति बहुत है। न कोई दिखावा, न कोई आकांक्षा — केवल एक शांति, जो उनके चेहरे की मुस्कान में झलकती है।


व्यक्तिगत जीवन: संघर्ष और समर्पण

जीवन हमेशा सरल नहीं होता। इंद्रजीत पासवान को भी गहरी व्यक्तिगत त्रासदी से गुजरना पड़ा — उनकी पत्नी का असमय देहांत हो गया। तब बच्चे छोटे-छोटे थे। अकेले पिता के रूप में उन्होंने बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाई। बाद में परिवार के दबाव में उन्हें दूसरी शादी करनी पड़ी, लेकिन उनकी विवाहिता ने भी सौतेले बच्चों को सगे बच्चों की तरह प्यार दिया।

इंद्रजीत जी ने अपनी सीमित आय में भी बच्चों की शिक्षा को सर्वोपरि रखा और आज भी अपने बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने में लगे हुए हैं। उनका सपना है कि उनके बच्चे वे ऊँचाइयाँ छुएं जो उन्हें परिस्थितियों के कारण नहीं मिल सकीं।


एक प्रिय सहकर्मी और मानवतावादी

इंद्रजीत जी का व्यक्तित्व ऐसा है कि विभाग का हर व्यक्ति उन्हें सम्मान और स्नेह देता है। चाहे वह लाइब्रेरियन मुन्ना हों या बड़ा बाबू परवेज — सभी के वे “अपने” हैं। कोई बाहर से आने वाला व्यक्ति भी उनसे कोई काम कहे, तो वे कभी मना नहीं करते।

उनके भीतर कोई अहंकार नहीं, न ही किसी के लिए कटुता। अगर कोई उन्हें कठोर शब्द भी कह दे, तो वे उसे हँसी में टाल देते हैं — “दूसरे के कहे का क्या बुरा मानना, जब हमारा मन शांत है।”

ऑफिस के बाहर लगे पेड़-पौधों की देखभाल करना, समय मिलने पर पुस्तकें पढ़ना, और हर एक के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना — यही उनकी दिनचर्या है।


विनम्रता और विचारों की ऊँचाई

इंद्रजीत पासवान का यह मानना है कि “धन से आदमी बड़ा नहीं होता, विचारों से होता है।” उनका जीवन इसी विचारधारा का प्रतीक है। वे मानते हैं कि पैसा एक अस्थायी ईश्वरीय देन है, जो कभी भी जा सकती है — लेकिन विचार और कर्म, ये स्थायी होते हैं।

उनका जीवन यह सिखाता है कि अगर आपके भीतर सज्जनता और स्पष्टता है, तो जीवन में नकारात्मकता खुद ब खुद दूर रहती है। यही कारण है कि उनके जीवन में विवादों की कमी है और लोगों से उनका रिश्ता आत्मीय बना रहता है।


एक आदर्श जो अनुकरणीय है

इंद्रजीत पासवान उन लोगों में से हैं जिनसे आप बात करें तो कोई शिकायत नहीं मिलेगी, कोई गिला नहीं होगा। उनके पास कोई बड़ी डिग्री नहीं, लेकिन जीवन का अनुभव और व्यावहारिक समझ अपार है।

उनके चेहरे पर हमेशा एक मुस्कान होती है, और आँखों में स्थिरता। उन्होंने कभी ज्यादा नहीं चाहा, लेकिन जो मिला, उसे पूरी श्रद्धा से स्वीकारा। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सीमित संसाधनों में भी महानता का जीवन जिया जा सकता है


अंतिम शब्द: जो दिखते नहीं, वही सबसे अधिक टिकाते हैं

इंद्रजीत पासवान जैसे कर्मचारी हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि समाज की असली रीढ़ वे ही हैं, जो बिना शोर किए अपने काम में लगे रहते हैं। वे मंचों पर नहीं दिखते, पुरस्कार समारोहों में नहीं बुलाए जाते — लेकिन हर संस्था की आत्मा उन्हीं में बसती है।

“नींव के पत्थर” के रूप में इंद्रजीत पासवान हमारे लिए एक जीवंत उदाहरण हैं — सादगी, समर्पण, और सेवा के।


लेखक टिप्पणी:
इंद्रजीत जी से बात करते हुए मैंने सीखा कि जीवन बड़ा नहीं होता, जीवन की सोच बड़ी होनी चाहिए।

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