ई-रिक्शा चालक की अनोखी कहानी!

ना पढ़ा-लिखा, ना अमीर, फिर भी समाज को सबक दे जाता है। अपने सदकर्मों से लोगों के दिल में जगह बनाई। इंसान होने का अपना कर्तव्य निभाता जा रहा है। हर दिन सुबह से शाम तक इंसान की सेवा करने में ही जिंदगी बसर कर रहा है।
नाम – राम लाल
पेशा – ई-रिक्शा (टोटो-टुकटुक) चालक
पता – गांधी चौक, मलोट
लेकिन अगर कोई इन कुछ शब्दों में राम लाल को समझने की कोशिश करे तो शायद वह चूक जाएगा। क्योंकि राम लाल उस भीड़ से अलग है, जो दो पैसे कमाने के लिए भाग रही है। वो उन चुपचाप इंसानियत निभाने वालों में हैं, जो बिना कुछ कहे समाज को आईना दिखा जाते हैं।
इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं
राम लाल कहते हैं कि “मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं, लेकिन इंसानियत को पहचानता हूं। इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।” यह कोई अहंकार नहीं, बल्कि समाज के उस वर्ग के लिए एक सीधी चुनौती है, जो सुविधा के बावजूद संवेदनहीन हो चुका है।
पिछले पांच वर्षों से मलोट में टोटो चला रहे हैं। आमदनी सीमित है, जिम्मेदारियां बड़ी हैं। उनके तीन बच्चे हैं, जिनमें से दो बीमार हैं और एक का इलाज चल रहा है। इसके बावजूद राम हर दिन एक संकल्प के साथ सड़कों पर निकलते हैं। मजबूरों और जरूरतमंदों की मदद करने के संकल्प के साथ हर दिन उनकी मदद के लिए आगे आते हैं और उन्हें सहायता पहुंचाते हैं।
राम लाल की ई-रिक्शा
राम लाल का टोटो सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि चलता-फिरता मानवता का प्रतीक है। उन्होंने अपनी टोटो पर अपना नंबर लिखवाया है और उस पर हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई धर्मों के प्रतीक चिह्न भी लगाए हैं। उनका सीधा संदेश है – “इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं।”
जब शहर की सड़कों पर कोई गरीब तड़पता दिखता है, जो अस्पताल तक जाने में असमर्थ है, तो राम लाल बिना एक पल गंवाए उसे अपने टोटो में बिठाकर निशुल्क अस्पताल पहुंचा देते हैं। इसके लिए वह कभी भाड़ा नहीं लेते, बस इतना कहते हैं – “दुआ में याद रखना।”

रात का सेवक, दिन का मददगार
हर सुबह 3–4 बजे के बीच, जब शहर सोता है, तब राम लाल जागते हैं। वह रांची बस स्टैंड के आस-पास पहुंच जाते हैं, जहां उन्हें अक्सर बाहर से आए मजबूर लोग मिलते हैं। जिन्हें किसी अस्पताल जाना होता है, उन्हें वे मुफ्त में छोड़ते हैं। यह काम वह एक-दो बार नहीं, बल्कि सैकड़ों बार कर चुके हैं।
स्कूली बच्चों के लिए ‘रामु चाचू’
राम लाल स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए भी रामु चाचू बन चुके हैं। हर सुबह और दोपहर में वे अपने इलाके के आसपास मौजूद स्कूलों के गरीब बच्चों को कई चक्कर लगाकर निशुल्क स्कूल पहुंचाते हैं। यह उनका रोज़ का रूटीन है।
जब उनसे पूछा गया कि वह यह सब क्यों करते हैं, तो राम लाल का जवाब था –
“हम खुद गरीब हैं, इसलिए गरीबों की परेशानी समझते हैं। ऊपरवाले पर भरोसा है, अच्छा करेंगे तो अच्छा मिलेगा।”
चुनौतियों के बीच जज़्बा
हालांकि, समाज में सभी लोग उनके नेक काम के समर्थक नहीं हैं। कुछ धूर्त लोगों ने उनके टोटो को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया है। उनके टोटो को पंचर कर दिया जाता है।
एक स्थानीय पंचर मिस्त्री ने मजाक में कहा –
“रामु को अपने टोटो के पंचर से ज्यादा दुख होता है, क्योंकि उसके काम रुक जाते हैं।”
इसके बावजूद, राम लाल की हिम्मत और हौसला नहीं टूटा। समाज के बड़े तबके ने उनके इस काम को सराहा है। कई लोग उन्हें सरफिरा समझते हैं, तो कई कहते हैं कि ऐसे लोग या तो भगवान के सीधे संपर्क में होते हैं या खुद फरिश्ते होते हैं।

चुपचाप इंसानियत का आंदोलन
राम लाल कोई सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हैं, न ही किसी एनजीओ से जुड़े हैं। लेकिन उनका जीवन अपने आप में एक आंदोलन है – मानवता का आंदोलन।
वह नारे नहीं लगाते, तस्वीरें नहीं खिंचवाते, सिर्फ चुपचाप अपना काम करते हैं। वो भी उस वक्त में जब खुद को और अपने परिवार को दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
रामु का मानना है –
“अगर आप किसी के लिए भला सोचें, तो आपके लिए भी दुनिया भली हो जाती है।”
उनकी यही सोच उन्हें समाज के लिए आदर्श बनाती है और रसूख वालों के लिए सीख है।
✍️ विजय गर्ग

सेवानिवृत्त प्रिंसिपल, शैक्षिक स्तंभकार, प्रख्यात शिक्षाविद्
गली कौर चंद एमएचआर, मलोट, पंजाब



