कफ़नचोर – सांत्वना पुरस्कार प्राप्त कहानी

सुनसान रास्ते पर दो लोग चले जा रहे थे।
“बाबा हम कहां जा रहे हैं?”
चलते चलते पंद्रह साल के अरजा ने अपने बाप से पूछा।
रफीक ने फौरन अपने बेटे को चुप रहने का इशारा किया और फिर चारों दिशा की तरफ देखने लगा। मानो वह तय कर लेना चाहता था कि कहीं कोई उसे देख तो नहीं रहा है।
जल्दी से कब्रिस्तान की छोटी सी चारदीवारी फांद कर वह कब्रिस्तान में घुस गया और पीछे – पीछे उसका बेटा।
वह दबे कदमों से एक कब्र के पास जा पहुंचा। कब्र नई थी। उस पर रखे फूल अभी भी ताजा थे और फिज़ा में महक रहे थे।
रफीक ने जल्दी जल्दी से कब्र से मिट्टी हटाना शुरू किया। बाप को मिट्टी हटाते देख अरजा भी बाप की मदद करने लगा। थोड़ी देर में ही मिट्टी हट गई। सामने सफेद कफन में लिपटी लाश नजर आई।
“बाबा अब हम क्या करेंगे?” अरजा ने उत्सुक होकर पूछा।
रफीक ने मानो अपने बेटे की बात सुनी ही न हो। उसका सारा ध्यान लाश के कफन पर था। उसने जल्दी से लाश से कफन को उतारा।

अरजा यह देख थोड़ा विचलित हुआ।
“ये क्या, इस मुर्दे के पास तो एक यही नाममात्र का कफन ही तो था। बाबा ने आखिर यह क्यों उतार लिया?”
अरजा कुछ समझ पाता उससे पहले ही रफीक ने नंगी लाश के ऊपर वापस से मिट्टी डालना शुरू कर दिया। थोड़ी देर लगी और कब्र फिर पहले जैसी हो गई। रफीक ने कब्र पर फूल त्यों के ज्यों डाल दिए और अपने बेटे का हाथ पकड़ कर कफन को दूसरे हाथ में समेटे बाहर निकल आया।
कफन को धुलते धुलते वह थक गया। उसने अच्छे से निचोड़ने के बाद उसे सूखने के लिए डाल दी।
सुबह नींद खुली तो पाया कफन तो रात भर में अच्छे से सुख गई है। उसने कफन को तह किया और बेटे को साथ लेके बाजार की तरफ निकल पड़ा।
“मियां यह तो मखमल है, पूरे चार सौ दूंगा।” एक दुकानदार ने कपड़े की जांच करते हुए कहा।
“मालिक ये तो और महंगी होगी।” रफीक ने हाथ जोड़ लिए।
“अच्छा अच्छा ठीक, ये लो पचास और रखो। इससे ज्यादा मैं और नही दे सकता।” चार सौ के साथ पचास का एक और नोट बढ़ाते हुए दुकानदार ने कहा।
रफीक ने रुपए थामे और आगे निकल आया।
“बाबा मैंने आपका काम सीख लिया है। अब से मैं भी आपका हाथ बंटाया करूंगा।” अरजा ने माशूमियत से कहा।
बाजार से लौटते लौटते दोपहर हो गई। बीबी को कुछ रुपए पकड़ा कर रफीक ने खाने की जुगत करने को कहा। कई दिन के फांकों के बाद आज रफीक ने भर पेट खाना खाया और फिर खाट पर लेटे लेटे सो गया।
2.
बक्कन की अम्मा को घर से पास गुजरे हुए देख रफीक ने हसी ठिठोली की।
“भौजाई आज कईसे रास्ता भूल गई?”
“अरे मिठ्ठन भैया नही रहे, उन्हीं को आखिरी बार देखने जा रही हूं।” बक्क़न की अम्मा बिना रुके चलती बनी।
रफीक ने बनावटी हमदर्दी दिखाते हुए कहा कि “निहायत नेक आदमी थे लेकिन होनी को कौन टाल सकता है।” मन ही मन वह मुस्कुरा पड़ा। मिठ्ठन तो ठहरे चौधरी। आज बढ़िया कफन हाथ लगेगी।
आज चांद अपने उरूज पर था। मानो आज उसने सूरज से शर्त लगाई हो कि वह भी सारे जहान को रोशन कर सकता है। उजाला ऐसा मानो अगर किसी की सुई भी गिर जाए तो वह अपनी सुई ढूंढ लेगा।
वह अकेले ही निकल पड़ा था। खेल कूद कर आया अरजा आज जल्दी सो गया था। रफीक भी तो था बाप ही। गहरी नींद में सो रहा बेटे को भला कैसे जगा देता।
आज वह तेजी से चल जा रहा था। मानो उसके अंदर कोई ताकत लौट आई हो। चांदनी रात में भी वह रास्ते में पड़े एक पत्थर से टकरा गया। लेकिन उसने उस पर ध्यान न दिया। शायद उसके अंगूठे से खून भी निकल आया लेकिन उसे बस पर एक धुन सवार थी जल्दी से चौधरी के कब्र पर पहुंचना।
उसने चारों दिशाओं का मुवायना किया और आत्म संतुष्ट होने के बाद वह कब्रिस्तान में घुस गया।
उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। उसने जल्दी-जल्दी

कब्र से मिट्टी हटाने शुरू की। थोड़ी देर में मिट्टी हटाने के बाद लाश दिखाई देने लगी।
उसने जल्दी से चौधरी के लाश से कफन को उतारा। न जाने उसे क्या सूझी। उसने चौधरी के चेहरे की तरफ एक नजर डाली। इतने सालों से वह यह काम करता आ रहा था लेकिन उसने कभी मुर्दे से नजरें मिलाने की हिमाकत न की थी।
उसने पाया चौधरी का चेहरा उस पर मुस्कुरा रहा था। रफीक को लगा मानो चौधरी मुर्दा न हो कर जिंदा हो और उसको कफन चोरी करते पकड़ने के बाद मुस्कुरा रहा हो।
रफीक की धड़कने बढ़ने लगी। उसने जल्दी से मिट्टी डाली और बेतहाशा भाग पड़ा। वह जल्दी से जल्दी वहा से निकलना चाहता था। जितना तेजी से दौड़ सकता था जान लगा कर दौड़ा। रास्ते में पांव में कांटे घुसे या पांव किसी से टकराया। कुछ भी होश नही। कानों में सिर्फ दिल के धड़कने की आवाज सुनाई दे रही थी। घर पहुंचते ही उसने बीबी को आवाज लगाई और गश्त खाकर गिर पड़ा। ऐसा गिरा फिर कभी ना उठा सका।
3.
घर में अनाज का एक दाना भी न था। पिछले कई दिन से फांके ही करते आ रहे थे। खैर, पड़ोसी जुटे। रफीक जो कफन चुरा के लाया था लोगों ने उसको नहला कर वही कफन पहना दी।
लोगों को हैरत हुआ जिसने सारी उम्र चिथड़े ही पहने उसे आला किस्म के कफन कहां से मिले? लेकिन किसी के मातम में पर कौन अपना इतना सर खपाता।
रफीक के घर से एक छोटा सा हुजूम निकला और सीधा जाके कब्रिस्तान पहुंचा। वहां एक कब्र पहले से ही खुदी पड़ी थी। लोगों ने देखा चौधरी के लड़के बाप के कब्र के पास खड़े जानवरों पर दोषारोपण कर रहे थे। एक बोला “शायद किसी जानवर ने बाबा के कब्र को खोदने की कोशिश की है।” खैर लोग आपस में जिरह करते रहे और थोड़ी देर में रफीक को सुपुर्द ए खाक करके सब वापस अपने घरों को लौट आए।
आज चांद मध्यम था। उसकी चमक फीकी थी। तभी अचानक एक घर से एक साया बाहर आया और दबे पांव चलने लगा। बढ़ते बढ़ते कब्रिस्तान तक जा पहुंचा। चारों तरफ देखने के बाद झप से कब्रिस्तान में जा कूदा।
रफीक के कब्र के पास जाकर रुका। थोड़ी देर कब्र को घूरता रहा फिर जल्दी जल्दी मिट्टी हटाने लगा। मिट्टी हटते ही सामने रफीक की लाश नजर आई। साए ने अपने हाथ बढ़ाए। उसका हाथ थोड़ा सा हिचकिचाया लेकिन फिर उसने जल्दी से कफन खोला और फिर कर पहले जैसी कर की। जाने से पहले साया कब्र के पास बैठा।
“बाबा मुझे माफ कर देना। हम कई दिन से फांका कर रहे हैं और कोई रास्ता नही था।”
ये कहके अरजा चल पड़ा। वह चलता जा रहा था और उसे लग रहा था की मुर्दे मानो उसके बाप को ताना दे रहे हो कि तूने दूसरे के कफन छीने और और आज तुझे भी कफन नसीब नही हुआ। तेरा भी कफन तेरी ही औलाद छीन के ले जा रहा है।
(समाप्त)




