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हिन्दी अपने ही घर में बेघर

भाषा केवल संवाद का एक साधन मात्र नहीं होती, अपितु वह किसी भी राष्ट्र की आत्मा, उसकी वैचारिक समृद्धि और उसकी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत दर्पण होती है। स्वतंत्र भारत में यह स्वाभाविक अपेक्षा थी कि हमारी अपनी भाषाएँ, और विशेषकर हिन्दी, अपना खोया हुआ गौरव पुनः प्राप्त करेंगी। परंतु आज की विडंबना देखिए कि जो हिन्दी संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोने की ऐतिहासिक और व्यावहारिक क्षमता रखती है, वह आज अपने ही घर में, अपने ही लोगों के बीच बेघर हो गई है। हिन्दीभाषी क्षेत्रों में हिन्दी की वर्तमान स्थिति अत्यंत चिंताजनक, हृदयविदारक और हमारी सामूहिक चेतना पर एक गहरा प्रहार है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमने भौतिक स्वतंत्रता तो प्राप्त कर ली है, परंतु मानसिक दासता की बेड़ियों को आज तक नहीं तोड़ा है।

अपनी ही मातृभूमि पर मातृभाषा का यह तिरस्कार एक ऐसा संकट है, जो धीरे-धीरे हमारी पहचान को निगल रहा है।

भाषाई हीनभावना: एक मनोवैज्ञानिक दासता

आज हिन्दीभाषी राज्यों के नागरिकों में अपनी ही मातृभाषा के प्रति एक गहरी और अकारण हीनभावना ने घर कर लिया है। समाज ने एक अत्यंत भ्रामक मापदंड स्थापित कर लिया है, जिसके अंतर्गत अंग्रेजी भाषा को बुद्धिमत्ता, ज्ञान और सफलता का एकमात्र पर्याय मान लिया गया है, जबकि हिन्दी बोलने वालों को पिछड़ेपन और अशिक्षा की दृष्टि से देखा जाता है।

जब एक युवा अपनी मातृभाषा बोलने में संकोच या लज्जा का अनुभव करता है, तो वह केवल कुछ शब्द नहीं भूलता, बल्कि अपनी जड़ों से, अपनी परंपराओं से कट जाता है। यह हीनभावना अब इतनी प्रबल हो चुकी है कि लोग अपने ही देश और समाज में हिन्दी का प्रयोग करने में अपमान का अनुभव करते हैं। बौद्धिक विमर्शों, कुलीन वर्ग की गोष्ठियों और यहाँ तक कि सामान्य पारिवारिक आयोजनों में भी अंग्रेजी के प्रयोग को प्रतिष्ठा का विषय मान लिया गया है। इस झूठी प्रतिष्ठा की दौड़ में हमने उस हिन्दी को पीछे छोड़ दिया है, जिसने कभी स्वतंत्रता संग्राम में पूरे राष्ट्र की हुंकार का स्वरूप लिया था।

दैनिक जीवन और अंकों से टूटता संपर्क

हिन्दी की दुर्दशा का सबसे जीवंत और पीड़ादायक उदाहरण हमारा अपना दैनिक जीवन और व्यवहार है। आज समाज के कितने लोग अपने आधिकारिक हस्ताक्षर हिन्दी में करते हैं? उत्तर निराशाजनक है। बैंक का चेक भरना हो या पैसे जमा करने की पर्ची, लोग अनजाने ही या दबाव में अंग्रेजी का आश्रय लेते हैं। सरकारी और गैर-सरकारी आवेदन-पत्रों को भी अब हिन्दी में भरने वालों की संख्या नगण्य रह गई है।

इससे भी अधिक दुखद स्थिति अंकों के ज्ञान की है। आज की नई पीढ़ी अपने घर का दूरभाष क्रमांक या अपना मोबाइल नंबर हिन्दी के अंकों या शब्दों में धाराप्रवाह नहीं बता पाती। ‘अड़सठ’, ‘तिहत्तर’, ‘नवासी’ या ‘सत्तानवे’ जैसे सामान्य शब्द आज के युवाओं और बच्चों के लिए किसी अनसुलझी पहेली बन गए हैं। वे संख्या बताने के लिए अंग्रेजी पर ही पूर्णतः निर्भर हैं। जो समाज अपनी भाषा में गिनती न कर सके, उस समाज का भाषाई पतन किस स्तर तक पहुँच चुका है, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

सार्वजनिक परिदृश्य: अपने ही आँगन में बेगानी

यदि आप हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश या छत्तीसगढ़ जैसे विशुद्ध हिन्दीभाषी राज्यों का भ्रमण करें, तो आपको यह आभास ही नहीं होगा कि आप किसी हिन्दी प्रदेश में हैं। इन सभी राज्यों में घर, मकान, दुकानों, बड़े-बड़े मॉल, आवासीय सोसाइटियों, निजी अस्पतालों, विमानतलों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों व सलाहकारों के कार्यालयों पर लगे नामपट्ट अब हिन्दी में दिखाई नहीं देते।

इन सभी स्थानों पर अंग्रेजी का पूर्ण एकाधिकार स्थापित हो गया है। एक समय था, जब दुकानों और प्रतिष्ठानों के नाम मोटे अक्षरों में देवनागरी लिपि में लिखे जाते थे, जो वहाँ के स्थानीय निवासियों से सीधा संवाद करते थे। आज बड़े-बड़े विज्ञापन पट्ट और सूचना पट्ट केवल अंग्रेजी में रंगे हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हमने अपनी ही भूमि से अपनी भाषा को निष्कासित कर दिया है। अपनी मातृभूमि पर अपनी ही भाषा को सार्वजनिक स्थानों पर उचित स्थान न मिलना, एक राष्ट्र के रूप में हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक विफलता है। अब घरों में भी माता-पिता अपने बच्चों से संवाद केवल अंग्रेजी में करते हैं। विश्व में किसी भी मातृभाषा के प्रति हीनभावना का इससे बड़ा उदाहरण नहीं मिलेगा, जैसा हिन्दीभाषी राज्यों में अपनी भाषा के प्रति है।

शिक्षा के मंदिरों में मातृभाषा का तिरस्कार

किसी भी भाषा का भविष्य उसकी आने वाली पीढ़ी और शिक्षा प्रणाली पर निर्भर करता है, और दुर्भाग्य से यहीं हिन्दी अपनी सबसे बड़ी और निर्णायक लड़ाई हार रही है। हिन्दी माध्यम के सरकारी विद्यालय आज लगातार उपेक्षा के कारण धीरे-धीरे बंद हो रहे हैं। जो बचे हैं, उनमें संसाधनों का ऐसा अभाव उत्पन्न कर दिया गया है कि लोग अपने बच्चों को वहाँ भेजना ही नहीं चाहते।

दूसरी ओर, निजी विद्यालय पूरी तरह से अंग्रेजी में परिवर्तित हो चुके हैं। भारतीय संस्कृति, संस्कारों और मातृभाषा के संवाहक रहे ‘सरस्वती शिशु मंदिर’ जैसे विद्यालय या तो बंद हो चुके हैं या अपनी अंतिम साँसें गिन रहे हैं। स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि आज अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में बच्चों को हिन्दी बोलने पर कठोरता से प्रताड़ित किया जाता है। उनके साथियों के सामने अपमानित किया जाता है। अनेक विद्यालयों में तो अपनी मातृभाषा में बोलने पर एक प्रकार का अघोषित प्रतिबंध लगा हुआ है। जो शिक्षा तंत्र मासूम बच्चों को उनकी ही माता और मातृभाषा से घृणा करना सिखाए, वह भारत का नवनिर्माण कैसे कर सकता है? यह एक प्रकार की सांस्कृतिक हत्या है, जिसे शिक्षा के नाम पर वैधानिकता प्रदान कर दी गई है।

प्रशासनिक उपेक्षा और डिजिटल भारत का अंग्रेजी स्वरूप

लोकतंत्र का मूलभूत सिद्धांत है कि प्रशासन की भाषा लोकभाषा होनी चाहिए, ताकि अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी न्याय और सुविधा पा सके। परंतु हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में सरकारी कामकाज लगभग पूरी तरह से अंग्रेजी में किया जाता है। प्रशासन और जनता के बीच अंग्रेजी ने एक ऐसी गहरी खाई खोद दी है, जिसे पार करना आम नागरिक के लिए असंभव हो गया है।

डिजिटल युग में यह भाषाई छलावा और भी विकृत हो गया है। सरकारी वेबसाइटें, पोर्टल और अनुप्रयोग (एप्लीकेशन) केवल और केवल अंग्रेजी में बनाए जाते हैं। यदि कहीं जनदबाव या नियमों की खानापूर्ति के लिए हिन्दी का विकल्प दिया भी जाता है, तो उसका विकल्प किसी कोने में छुपा दिया जाता है कि सामान्य नागरिक उस तक पहुँच ही न सके और अंततः हार मानकर अंग्रेजी वेबसाइट का ही उपयोग करे। इन सभी हिन्दीभाषी राज्यों में, कुछ गिने-चुने अपवादों को छोड़ दें, तो अधिकांश सरकारी ऑनलाइन सेवाएँ केवल अंग्रेजी में उपलब्ध करवाई जा रही हैं। सरकारें भूल गई हैं कि उनकी डिजिटल योजनाएँ उन करोड़ों नागरिकों के लिए हैं, जिनको आज भी अंग्रेजी का ज्ञान नहीं है, भले ही वे अंग्रेजी को श्रेष्ठता, कुलीनता और प्रतिष्ठा मानकर चल रहे हैं।

संचार माध्यमों का पतन: ‘हिंग्लिश’ का विष

अतीत में संचार माध्यम, विशेषकर समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ, भाषा को समृद्ध करने और साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य करते थे। परंतु आज हिन्दी के सभी प्रमुख समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ ‘हिंग्लिश’ को जन-जन तक प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं और उसे बोलचाल की भाषा कहकर बढ़ावा दे रहे हैं। लोकप्रिय और परिष्कृत हिन्दी के शब्दों को जानबूझकर कठिन और अप्रचलित बताकर चलन से बाहर किया जा रहा है और उनके स्थान पर देवनागरी लिपि में अंग्रेजी के शब्दों को थोपा जा रहा है। धीरे-धीरे रोमन लिपि का प्रयोग निरंतर बढ़ाया जा रहा है और इसे कूल हिन्दी का छद्म नाम देकर वाहवाही लूटी जा रही है। बार-बार यही कहा जा रहा है कि हिन्दी में अंग्रेजी शब्दावली व रोमन लिपि का प्रयोग करना हिन्दी के हित में है; इससे हिन्दी अंतरराष्ट्रीय भाषा बन जाएगी।

अब समाचार-पत्रों व समाचार चैनलों पर आपको न्यायालय, समाचार, भारत, एकदिवसीय, अंतरराष्ट्रीय, मंत्रालय, विभाग, अनुसार, शिक्षा, प्रश्न-पत्र, परिचय-पत्र, मतदाता, मतदान जैसे हजारों शब्द अब पढ़ने या सुनने को नहीं मिलेंगे। कुछ समाचार चैनलों व समाचार-पत्रों की भाषा ऐसी हो चुकी है कि जैसे वे हिन्दी को पूरी तरह से रोमन में लिखने को आतुर हैं। उन्हें बस थोड़े समय की प्रतीक्षा करनी है, क्योंकि अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई ने ऐसी पीढ़ियाँ तैयार कर दी हैं, जिन्हें देवनागरी में लिखना ही नहीं आता है और पढ़ने में उनकी साँसें फूल जाती हैं। मीडिया ने भाषा के संरक्षण का अपना दायित्व त्याग कर इस भाषाई प्रदूषण को आधुनिकता का नाम दे दिया है।

जागृति और संकल्प का समय

हिन्दी का अपने ही घर से बेघर होना कोई अचानक घटी घटना नहीं है; यह दशकों की प्रशासनिक उपेक्षा, हमारी अपनी सांस्कृतिक हीनभावना और अंग्रेजी के बढ़ते व्यावसायिक वर्चस्व का परिणाम है। एक भाषा तब मरती है, जब उसके अपने बोलने वाले उसका प्रयोग करना बंद कर देते हैं। यदि यही स्थिति रही, तो आने वाले कुछ ही दशकों में हिन्दी केवल अनुवाद और कुछ पुरानी पुस्तकों की भाषा बनकर रह जाएगी।

भारत को यदि एक सशक्त और स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर खड़ा होना है, तो उसे अपनी भाषा का सम्मान पुनः स्थापित करना ही होगा। यह परिवर्तन किसी सरकारी आदेश मात्र से नहीं आएगा, इसके लिए जन-जागरण की आवश्यकता है। हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम अपने हस्ताक्षर हिन्दी में करेंगे, अपने घरों और कार्यालयों के नामपट्ट हिन्दी में लगाएंगे, बैंकों और सरकारी कार्यालयों में हिन्दी के प्रपत्र माँगेंगे और अपने बच्चों में अपनी मातृभाषा के प्रति गर्व का भाव भरेंगे। जब तक हम स्वयं अपनी भाषा को गले नहीं लगाएंगे, तब तक हिन्दी अपने ही घर में बेघर और वनवासी ही रहेगी। यह समय आत्ममंथन का है, अपनी खोई हुई भाषाई अस्मिता को पुनः प्राप्त करने का है।

प्रवीण कुमार जैन
(एम.कॉम., एफसीएस, एलएलबी)
भाषासेवी, कंपनी सचिव व कॉरपोरेट सलाहकार, मुंबई।

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