कविताएं और कहानियां

CORONA KA VISHWA PER DUSPRABHAV

                                                  कोरोनावायरस का दुष्प्रभाव

अमृत से वायु में किसने,
जाने विष कब घोला था।
जिसके घातक वार से सहमा,
जग का कोना कोना था।
पहले चीनी लोगों पर ,
कहर बन कर ये टूटा था।
जिससे सहस्त्र लोगों का,
धरा से नाता छूटा था।
कोरोनावायरस नाम सुन,
सभी देश सतर्क हुए।
किन्तु इसको रोकने को,
विफल थे सारे तर्क हुए।
बहुत जतन के बाद भी,
संक्रमण रोक न पाये थे।
यह लाइलाज़ सी व्याधि है,
यह सोच सभी घबराये थे।
यह फैलता नर से नर में तो,
दुरी बहुत जरूरी थी।
सब कार्य देश का रोककर,
ये लाकडाउन मजबुरी थी‌।
लगभग विश्व के हर हिस्से में,
कोविड का प्रकोप था।
जिससे त्राहि करता अमेरिका,
त्राहि करता युरोप था।
सड़कें थीं सुनसान सभी,
बाजार दुकानें बंद पड़ी,
वैश्विक अर्थव्यवस्था भी,
थी काफी हद तक मंद पड़ी।
भारत में मजदूरों का ,
कार्फ्यु से हाल बेहाल था,
अपने गांव पहुंचना तक भी,
उनके लिए मुहाल था।
इटली, अमेरिका में मृतकों की,
संख्या बढ़ती जाती थी।
जनता सहमे घर में बैठे,
राम राम गुहराती थी।
जहां मंदिरों में घंटी स्वर,
व जाप सुनाई देते थे।
वहीं सन्नाटे में चींटी,
पदचाप सुनाई देते थे।
पहली लहर ने ही जग में,
हाहाकार मचाया था।
निरंतर चिता भट्टी जलती,
कब्रीस्तान भर आया था।
सब विद्यालय बंद हुए थे,
कठिन था शिक्षा पाना भी।
व दूरवाणी से हर बच्चे को
न था सरल पढ़ाना भी।
दुसरी लहर तो भारत में,
मानो यम बन आई थी।
तभी तो मृत्यु की काली घन,
भारत ऊपर छायी थी।
प्राणवायु के किल्लत से,
सब रोगी जुझ रहे थे।
व कई नरपिशाच इसमें,
अवसर ढूंढ रहे थे।
मरघट पे चिता अग्नि,
सदा ही जलती रहती थी।
मृतकों की कई लाशें यूं ही,
गंगा में बहती रहती थीं।
कोटि ‌जनों के श्रमाश्रय,
थे छीन लिये तब इसने।
अपनों के दायित्वों का,
सब भार लिया था जिसने।
अभी भी इसके जख्मों से,
उबरी न दुनिया सारी है।
हमारी इस महामारी से,
जंग अभी भी ज़ारी है।

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