बाबूजी – एक लेख़
बाबूजी नारियल की तरह कठोर, नदी के पानी की तरह शीतल और वटवृक्ष की ऐसी छाँव थे, जिनके साये में अल्हड़पन, शोखियाँ और बचपना “पूरी तरह” “सुरक्षित था।”
मैट्रिक पास करने के बाद जब आगे की पढ़ाई के लिए पटना जाना तय हुआ, पहली बार उनकी आँखों में चिंता की लकीरें देखीं। पहली बार समझ आया, ऐसा इसलिए है कि उनके पास मैं “पूरी तरह” “सुरक्षित था।”

बाबूजी के मौन में जो चिंता की लकीरें थीं, उसमें मेरे शहरी जीवन की संभावित तकलीफों का बवंडर था, जो उनके पास “पूरी तरह” “सुरक्षित था।”
बाबूजी ने कभी अपनी परेशानियों को जाहिर नहीं होने दिया, बस खामोशी से मेरी जरूरतों को अपनी इच्छाओं में ढाल लिया। शायद इसीलिए उनके पास मैं “पूरी तरह” “सुरक्षित था।”
बाबूजी हमेशा घर के बरामदे में खड़े होकर मानो मेरे अरमानों के पूरे होने के सपने देखा करते। आँधी-बारिश, धूप, सर्दी—हर मौसम में अडिग। शायद इसीलिए उनके पास मैं “पूरी तरह” “सुरक्षित था।”
मेरे सपनों को बाबूजी अपनी आँखों से देखा करते थे। बाबूजी की परिश्रम की खुशबू समय रहते मैं महसूस न कर सका, मेरी मुस्कान में उनकी खुशी को भाँप न सका, मेरी हर जीत में उनके त्याग का आसमान भी मुझे न दिखा। यह न दिख सका, शायद इसीलिए उनके पास मैं “पूरी तरह” “सुरक्षित था।”
अब महसूस हुआ, शायद बाबूजी बाहर से इसलिए कठोर बन जाते होंगे कि अपने लाड़ले को दुनिया की कठोर सच्चाई से रू-ब-रू करा सकें, लेकिन अंदर से वे उतने ही कोमल होते हैं, जितनी वीणा की तान से निकली मधुर ध्वनि। उन्होंने सारे ग़मों से बचाकर रखा। शायद इसीलिए मैं उनके पास “पूरी तरह” “सुरक्षित था।”
बाबूजी के चट्टानी धुन को किसी शब्द से बयान नहीं किया जा सकता। उन्होंने हमें सिर्फ जीना नहीं सिखाया, बल्कि ठेस लगने पर संभलना, अंधेरे बादल को चीरकर रोशनी तक पहुँचना और नेक इंसान बनकर मानवता की सेवा करना भी उन्होंने ही सिखाया। शायद उनके पास इसलिए मैं “पूरी तरह” “सुरक्षित था।”
मैट्रिक पास करके शहर जाते वक्त बाबूजी की आँखों में जो चिंता की लकीरें थीं, वह यही थी कि अब भी उनकी झोली में कुछ शिक्षा बाकी है, जो शायद शहर में धूल-धूसरित न हो जाए? शायद इसीलिए मैं उनके पास “पूरी तरह” “सुरक्षित था।”
आज यह सोचकर गमगीन हो जाता हूँ कि क्या मैंने अपने बेटे को वह शिक्षा दी, जो बाबूजी से मुझे मिली? यह इबारत मेरा बेटा लिखेगा! बस मुझे यही दिखता है…
मंद-मंद मुस्कुराते हुए बाबूजी बाँहें फैलाकर मुझे गले लगाते हैं। उनका आलिंगन महसूसने भर से मुझे दुनिया जहान का सुकून महसूस होता है!
तन्द्रा टूटती है और मुझे रोते हुए महसूस होता है कि अब बाबूजी नहीं हैं….
शायद इसीलिए मैं उनके पास “पूरी तरह” “सुरक्षित था।”

Senior Journalist, Author, Actor, and
Administrative Officer
Magadh University, Bodh Gaya
डॉ. अमरनाथ पाठक
रचनाकार, शिक्षाविद, वरिष्ठ पत्रकार,
साहित्यकार व फिल्म कलाकार




