कविताएं और कहानियां

संवेदना की मौत

यह कहानी मेरी सर्वथा मौलिक एवं अप्रकाशित कहानी है

 

                                                                  संवेदना की मौत

पूर्णिमा की रात छत पर भावशून्य अकेला बैठा परवेश एकटक चांद को निहार रहा था चंद्रमा अपने पूर्ण यौवन पर तारों के बीच चांदनी की आगोश में सुध बुध भूल पृथ्वी के पोर पोर में समाने अकुला रहा था ।।मदिध्म संगीत की ध्वनि कमरे से सुनाई दे रही थी ।ऐसी ही कितनी रातें उसने शिवानी की आंखों में जागते जागते बिताई थी घंटों पूनम के चांद से बतियाते दोनों पूर्णिमा की पीयूष उज्जवला में दिल के तारों से सुलझते उलझते रहते पता ही न चलता सुबह हो जाती।

अब वही चांद तारे पूर्णिमा की श्वेत रश्मियां चुभन पैदा कर देती है वहीं संगीत कान में शीशा घोल देता है अब तो वर्षों से अश्कों की नदी भी सूखी पड़ी है दिल से उठी हिलोरें आंखों के द्वार तक आते-आते ठिठक जाती हैं। अनेक प्रश्नों की झड़ी लग जाती है आखिर क्यों और किसके लिए आंसू बहाऊं? बरसों रात रात भर तकिए गीले किए पर उसकी संवेदना ने झांका भी नहीं ।

शिवानी को मेरी कोई तकलीफ से सरोकार न था ,नहीं सोच सकता अब मैं उस विगत को जहां शिवानी को हर पल मेरा इंतजार रहता ,उसका प्यार मेरा संबल मेरी प्रेरणा होते थे ।पता ही न चला सब कुछ कब खत्म हो गया समय ने पंख लगाए और हमारे सपने उड़ गए आंधियों में। मैं दोष देता रहा परिस्थितियों को पर मेरे समझ से परे बात कुछ और ही थी इतने वर्षों बाद जान पाया हूं शिवानी ने मुझे कभी पसंद ही नहीं किया। अब तो खुलकर कहने लगी है तुम मेरे लायक थे ही नहीं, बस ढ़ो रही हूं तुम्हें।उसके यह शब्द वज्रपात की तरह मुझे तोड़ कर रख देते हैं मैं बिखर जाता हूं पर पुरुषत्व का अहंकार प्रत्युत्तर में कुछ उससे भी अधिक खरी-खोटी सुना देता ,अब तो नौबत हाथापाई पर आ गई है मुझे याद है जब मैंने पहली बार शिवानी पर हाथ उठाया था वह कितनी रोई थी देखकर मैं भी रो पड़ा था माफी मांगना गवारा न था तो हाथ पर हथौड़ी दे मारी थी ।

‘ऐसा काम ही क्यों करते हो कि पछताना पड़े’ कहकर शिवानी ने हथौड़ी छुड़ा ली थी।

मेंने शर्मिंदगी से दिन भर मुंह नहीं दिखाया था पर अब मुझे क्या हो गया है? आए दिन यही क्रम बन गया है , याद ही नहीं रहता घंटे भर बाद भूल जाता हूं ।विषाक्त वर्ताव मेरी आदत में शुमार हो गया है ,गुनगुनाने लगता हूं कुछ ही देर में ।,बातचीत का दायरा अवश्य बिल्कुल संक्षिप्त हो गया है शिवानी सूखकर कांटा होती जा रही है पर मैं भी विवश हूं ।वह अपनी कड़वी जवान चलाना भी तो नहीं रोक पाती । ईगो तो दोनों का ही टकराता है छोटी सी बात से महाभारत शुरू होने में देर नहीं लगती ,युद्ध भी तभी समाप्त होता है जब मैं घर से चला जाऊं और दो-तीन घंटे में वापस लौटूं। अब तो मैं न चाह कर भी अधिक समय घर से बाहर बिताने लगा ,बुराइयां अपनाने को तो बहुत पड़ी थी जिन में डूबकर मैं क्षणिक सुख और समय व्यतीत कर सकता था किंतु मैं वैसा इंसान बनना नहीं चाहता था।

‘बच्चे उसे पालना है मेरा कुछ काम करने का उसे वक्त नहीं ,बस खाना खिलाने की जिम्मेदारी वह नहीं भूली है वह तो मैं होटल में खा सकता हूं ।जरूरत उसे मेरी है मैं तो उसके बिना भी जी रहा हूं दोस्त यारों में समय काट लेता हूं।’
पर जिंदगी इतनी क्यों सिमट गई है उसके रूखे पन से,क्यों जीने की इच्छा समाप्त होती जा रही है? नहीं,,,,,नहीं ,,कुछ नहीं होगा परवेश का अंतः करण जागा “जिंदगी बहुत हसीन है जीने का तरीका आना चाहिए। किसी एक के पीछे दुनिया नहीं छोड़ी जा सकती, उठकर परिवेश चहल कदमी करने लगा। इस सकारात्मक विचार के आते ही उसका कुछ सैलाब वह निकला। वह बुदबुदाया,,,,,,
‘संवेदना तुम्हें क्या हो गया है तुम बीमार तो बहुत दिन से थी
अब क्या मर गई हो?,, हां अब तुम तो सचमुच मर गई हो ,,,,अगर तुम जीवित होती तो जरूर कोशिश करती मेरे अहंकार को मारने की ,बीमार पिता को देखने की ,और परदेस में रह रहे बच्चों की परवाह मुझे जरूर होती! पहले तो ऐसा नहीं था मेरी घंटों बातें होती थी फोन पर पिताजी से बच्चों से भी डिस्कस होता रहता था पर तुम्हारी मौत का सन्नाटा मुझे पहले ही महसूस हो चुका था।

मैं सोचता था” बात करने से हम उनकी पीड़ा तो दूर नहीं कर सकते कोसों दूर रहते पिता की सेवा भी नहीं कर सकते फिर क्या फायदा बच्चे अपने आप में खुश हैं उन्हें हमारी जरूरत नहीं है फिर क्या जरूरत है बात करने की’

‌‌‌शिवानी को मैं पसंद नहीं था पर वह ढ़ोती रही चौबीस वर्षों से मुझे, शायद इसी आधात ने मेरी संवेदना को मार डाला ,अच्छा ही हुआ जो तुम मर गई संवेदना ,अब तुम्हारी लाश काधों पर उठाए रखने से अच्छा होगा तुम्हारा दाह संस्कार करना न तुम होगी ना यादों के झरोखे ।जो बीता ,दुखद घटना थी दिल से रिश्ते जोड़े बगैर भी जीवन कोई दुश्वार नहीं ,जिंदगी चैन से गुजारने मन का सुकून चाहिए ।क्या दो प्राणी एक छत के नीचे बिना किसी संबंधों के इंसानियत की नाते साथ नहीं रह सकते?”

‌‌‌ याद है मुझे हॉस्टल के वह दिन जहां कोई मेरा परिचित न था एक कमरे में हम छै लड़के अपना आशियाना बनाए रहते,कभी किसी को सोना होता तो किसी को उसी समय गाना सुनना तो किसी को पढ़ना सब व्यवस्थाएं सब की जरूरत के मुताबिक बन जाती थी बीमार हुए तो कोई भी दवा खिला कर देता काम चल जाता ।मां बाबूजी तो बस यादों में रह गए बहुत रोया उनके बिना पर छूटा तो फिर कभी साथ ना रह पाया।।भूख लगती तो हम गिरते पड़ते जाकर कभी आधा तो कभी भरपेट ही खा लेते फिर भी मजे में रहते स्वतंत्र, जरूरत का थोड़ा सा सामान रखकर ।हां एक लक्ष्य जरूर था सामने जो शायद तकलीफों को नजर अंदाज कर जाता। ठीक उसी तरह क्या मैं आज भी जी नहीं सकता?

‘दस वर्ष भाई बहन मां बाप सबसे अलग रह कर संघर्ष किया था तो क्या अब नहीं रह सकता।’

‘तो क्या तुम सब से मुंह मोड़ लोगे ‘? संवेदना हंस पड़ी

‘नहीं संवेदना रिश्ते मरघट तक साथ नहीं देते यहां तक कि दुख बीमारी और मरण का दुख अकेले ही झेलना पड़ता है फिर रिश्तों का दर्द मात्र क्यों पालना ?सबसे समभाव रख अब मुझे जीवन के गूढ़ रहस्य खोजना है, लक्ष्य सामने होगा तो जीवन नीरस न होगा।’

‘क्या अपने परिवार के प्रति कर्तव्यों को भुला दोगे?’
संवेदना बोली

‘नहीं इसकी क्या आवश्यकता ,अपनी जवाबदेही का निर्वहन करते करते भी तो लक्ष्य खोजा जा सकता है अब तो मैंने दिल पत्थर का कर लिया है जो कष्ट मेरे बिछोह से मेरे माता-पिता और बच्चों को हुए होंगे वही अब मुझे हो रहे हैं। यदि यही चलता रहा तो मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा इसलिए संवेदना, तुम्हें मरना ही होगा।
तुम्हारा दाह संस्कार मुझे अभी करना होगा संवेदना,,,,
कहते हुए परिवेश ने एक पल को आंखें मूंद ली और शांत भाव से जैसे उसने सभी समस्याओं का हल खोज लिया था।
वह शरीर को ढीला छोड़ कर वह मौन प्राणायाम की मुद्रा में बैठ गया और विचार करने लगा ‘मुझे नए समीकरण गढ़ना होंगे जो शांति और सुकून भरे होंगे, यथार्थ जीवन के गंतव्य मार्ग होंगे ,अब ह्रदय के कोई तार नहीं टूटेंगे ,न ही हताशा बहुमूल्य मानव जीवन का उपहास करेगी ।अंतः करण की चेतना जो मार्ग प्रशस्त करेगी वही मेरा गंतव्य होगा। और जीवन की सार्थकता भी। एक ही झटके में परिवेश ने संवेदना को दफन कर दिया ।और शांत भाव से चंद्रमा को देखा मंत्रमुग्ध हो चांदनी को निहारने लगा जो उसके पोर पोर में शरद पूर्णिमा का प्रसाद विकीर्ण कर रही थी।

उस दिन उसे कई वर्षों बाद चैन की नींद आई सोने के पहले शिवानी के कमरे में झांका वह सर्दियों की रात में ठिठुरती सिकुड़ सी गई थी ।धीरे से कमरे में जाकर रजाई उसके ऊपर डाली अपने कमरे में आकर पुनः अपने लक्ष्य का स्मरण किया ‘ कौन हूं मैं कहां से आया हूं मर कर कहां जाऊंगा ?क्या है सृष्टि के सृजन विनाश के कारण ? कौन है इसे संचालित करने वाला ?’
अनेकों अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर अब मुझे खोजना होंगे कहते हैं अपने कर्मानुसार पुनर्जन्म होता है पर कैसे ?
मैं तो साइंस का स्टूडेंट रहा हूं और इनका वैज्ञानिक कारण जाने बगैर मुझे समाधान नहीं मिलेगा अब मेरे पास लक्ष्य भी है और जीवन जीने का उद्देश्य भी ,जो मेरे जीवन को रोमांचक बनाएगा और सार्थक भी।
कल से ही ऑफिस के बाद का समय मेरी इस यात्रा का होगा जिसमें मुझे वेद पुराणों की खाक भी छानना पड़ी तो पीछे नहीं हटूंगा।’

प्रातः की रश्मिया खिड़की से झांककर मेरा ललाट चूम रही थी, नींद खुली लक्ष्य याद करते ही मन स्पूर्ति और जोश से भर गया, शिवानी का ख्याल आते ही संवेदना फिर जीवित हो गई। रिश्ता भले ही भूल जाऊं पर मानवता नहीं। शिवानी आज अपने बच्चों से दूर अकेली हो गई है शायद इसलिए चिडचिडी भी ।उससे प्यार से बोल कर उसकी बातों को नजर अंदाज कर दूंगा सोचता हुआ परवेश उठा और आज बहुत वर्षों बाद उसने चाय बनाई , दोनों प्याली लेकर शिवानी को जगाने लगा।

नींद में आंखें मलते हुए शिवानी चाय की प्याली देख तमतमाई -‘आज क्या सूरज पश्चिम से निकल आया है जो तुमने चाय बना ली, क्या जरूरत थी मुझे राजाई उड़ाने की ,मरने दो मुझे।वैसे भी कितनी बार कहा मेरे कमरे में मत आया करो मुझे ऐसे ही रहने की आदत हो गई है ‘
‘ठीक है अब नहीं आऊंगा पर एक बात अवश्य कहूंगा शिवानी, जो तुम्हारे हमारे दोनों के हित में है ,तुम मुझे पसंद नहीं करती कोई बात नहीं ,मैंने भी अब दिल के रिश्ते खत्म कर दिए हैं पर क्या हम क्या हम दोनों मित्र की तरह नहीं रह सकते ?

तीन महीने से परिवेश की बदली दिनचर्या और शांत स्वभाव देख शिवानी अचंभित थी ।जिम्मेदारियों से विमुख अड़ियल ,अहंकारी कोई भी काम व्यवस्थित न करने वाला स्वार्थी सा लगने वाला कौन सी जड़ी बूटी खा बैठा है? शिवानी चुपचाप उसे देखती न चाहते हुए भी उससे रुखा व्यवहार करती कुछ जली कटी भी सुना देती ,पर उससे परवेश को कोई फर्क नहीं पड़ता ।वह शांत भाव से शिवानी के दैनिक कार्यों में सहयोग देता ,जो कभी किताबों को हाथ न लगाता था अब सोने के पहले घंटों उनमें सिर घुसाए रहता। दिन सरकते जा रहे थे परवेज का व्यवहार शिवानी को बेचैन कर रहा था।

आखिर उस दिन शिवानी से न रहा गया चाय की प्याली देकर जाते हुए परवेश को उसने टोक दिया ‘क्या दो मिनट का समय तुम मुझे दे सकते हो ‘
‘हां क्यों नहीं बोलो क्या बात है’
‘मुझे खुशी है कि तुम बदल गए और तुम्हारी संवेदनाएं हमारे प्रति जाग गई ‘
परवेश मुस्कुराया’ जाग तो मैं गया हूं शिवानी , संवेदना की मौत के बाद।
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कहानीकार- मीना गोदरे ,अवनि

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