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हिंदी का होना, हिंदी का रोना, हिंदी का ढोना

अंग्रेजी को केवल दिमाग तक सीमित रखिए पर अपनी भाषा को दिल और दिमाग दोनों में रखिए।संपर्क भाषा के रूप में भी सिकुड़ती जा रही है हिंदी।दक्षिण के राज्यों में ऐसे युवाओं-छात्रों की संख्या बढ़ रही है जो अपनी आगे की ज़िन्दगी में हिंदी की ज़रूरत महसूस करते हैं, उसे सीखना चाहते हैं।  जो भी युवा तमिलनाडु या केरल के बाहर जाकर देश के दूसरे हिस्सों में पढ़ने या काम करने की इच्छा रखता है वह समझता है कि उस स्थिति में हिंदी के बिना काम नहीं चलेगा।

सितंबर जा रहा है। भारत के केंद्रीय सरकारी विभागों, कार्यालयों, बैंकों, विश्वविद्यालयों में सितंबर एक खास सितम का महीना है। एक संवैधानिक कर्तव्य निभाने की कठिन विवशता का महीना है। इस कठिन काल में जय-हिंदी का जाप संवैधानिक मजबूरी का ताप शांत करता है। हिंदी का होना या हिंदी का रोना या हिंदी का ढोना, भीतरी भाव कुछ भी हो अनुष्ठान आवश्यक है।

इस अनुष्ठान के पुरोहित एक ऐसी शासकीय श्रेणी के सदस्य हैं जो शायद ही किसी दूसरे देश के प्रशासन में अस्तित्व रखती हो। ये हैं केंद्र सरकार के लगभग अनगिनत कार्यालयों, निगमों, संस्थानों, सरकारी बैंकों, विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में काम करने वाले राजभाषा अधिकारी। सरकारी सेवा की भाषा में यह एक संवर्ग है। इनकी कुल संख्या का एक अनुमान नौ से दस हज़ार तक है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के हिंदी विभाग तथा शिक्षक भी राजभाषा अधिकारी न होते हुए भी हिंदी से जुड़े होने के कारण इस पुरोहित वर्ग में आते हैं। सैकड़ों गैर-सरकारी, हिंदी सेवी, साहित्यिक संस्थाएं हैं जो राजभाषा दिवस के हिंदी दिवस के रूप में मनाती हैं। कुल मिला कर सितंबर में कई हज़ार कार्यक्रम होते हैं।

हिंदी दिवस के दिन हिंदी द्वेषी लोग सक्रिय हो जाते हैं ।

हिंदी के नाम पर हो या राजभाषा के, अधिकतर उत्सव और समारोह-माह-पखवाड़े-दिवस कवि सम्मेलनों, कवियों-लेखकों से भरे रहते हैं। अधिकांश लोगों के लिए भाषा का मतलब उसका साहित्य और हिंदी का मतलब कविता-कहानी-उपन्यास है। हिंदी लेखकों को भी साहित्य और अपनी रचनाओं-रचना प्रक्रिया आदि से थोड़ा हट कर जीवन-कर्म-चिंतन-ज्ञान-विज्ञान-व्यवसाय-शिक्षा की भाषा के रूप में हिंदी को देखने-समझने का अभ्यास नहीं है। दूसरे भाषाई समाजों की तुलना में हिंदी समाज में अपनी भाषा को समग्रता में देखने में रुचि और गति पीड़ाजनक रूप से कम है।

हिंदी का यह शोर, समारोह, उत्सव, केंद्रीय गृह मंत्री के भाषण, हिंदी के महत्व, ऐतिहासिक भूमिका आदि पर ऊंची-ऊंची बातें दूसरी भाषाओं के लोगों को चुभती हैं। सामाजिक माध्यमों में आलोचना, टिप्पणियां शुरू हो जाते हैं। दक्षिणी राज्यों, विशेषतः तमिल नाडु, कर्नाटक के हिंदी द्वेषी लोग सक्रिय हो जाते हैं। हिंदी लादे जाने के खिलाफ अभियान (स्टॉप हिंदी इंपोज़ीशन) चलने लगते हैं। किसी और भारतीय भाषा को ऐसा सरकारी समर्थन और प्रोत्साहन नहीं मिलता इसलिए अधिकतर हिंदीतर भाषाओं के लोग जो संविधान, संविधान सभा की बहसों, फैसले और संविधान के भाषा संबंधी अनुच्छेदों (343 से 351) के अस्तित्व तथा पृष्ठभूमि से परिचित नहीं होते उन्हें यह सब अपनी भाषा की उपेक्षा के रूप में दिखता है, हिंदी को उनकी भाषाओं से ज्यादा शक्तिशाली और वर्चस्वशाली बनाने के प्रयासों के रूप में दिखता है, हिंदी थोपने की केंद्रीय योजना लगता है। युवा पीढ़ी तो संविधान और उसकी ऐतिहासिक राजनीतिक-भाषिक परिस्थितियों, पृष्ठभूमि तथा संदर्भों से बहुत अधिक अपरिचित है। इसलिए इन भाषाओं की युवा पीढ़ी में हिंदी के प्रति तल्ख़ी और विरोध ज्यादा मुखर होती जा रही है।

दक्षिण के राज्यों के युवाओं को समझ आ रही है हिंदी की जरूरत।

लेकिन इसके एक उलट धारा भी मौजूद है। वह हिंदी-विरोधी धारा से ज्यादा बड़ी है लेकिन उतनी मुखर नहीं है। दक्षिण के राज्यों में ऐसे युवाओं-छात्रों की संख्या बढ़ रही है जो अपनी आगे की ज़िन्दगी में हिंदी की ज़रूरत महसूस करते हैं, उसे सीखना चाहते हैं। जो भी युवा तमिलनाडु या केरल के बाहर जाकर देश के दूसरे हिस्सों में पढ़ने या काम करने की इच्छा रखता है वह समझता है कि उस स्थिति में हिंदी के बिना काम नहीं चलेगा। दक्षिण भारत राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की कक्षाओं में लगभग चार लाख तमिल हिंदी पढ़ रहे हैं, उसकी परीक्षाएं दे रहे हैं। 

तमिलनाडु सरकार और तमिल राजनीतिक दलों का पारंपरिक हिंदी-संस्कृत-उत्तर भारत विरोध तो रस्मी तौर पर कायम है लेकिन समाज, विशेषतः व्यापारी और युवा, द्रविड़नाडु के पुराने सम्मोहन से आगे निकल आए हैं। वे उच्च शिक्षा और नौकरियों के लिए अंग्रेज़ी की और देश के दूसरे हिस्सों से संपर्क के लिए हिंदी की उपयोगिता समझते हैं। हिंदी फिल्मों, टीवी धारावाहिकों की लोकप्रियता बनी हुई है। बोली के रूप में हिंदी का विस्तार हो रहा है।

हिंदीतर प्रदेशों भी हिंदी संपर्क भाषा के रूप में सिकुड़ती जा रही है।

लेकिन हिंदीतर प्रदेशों में एक नई प्रवृत्ति भी बढ़ती हुई दिख रही है, पढ़े लिखे लोगों का एक वर्ग ऐसा है जो अपने प्रदेश के भीतर जीवन के लिए प्रादेशिक भाषा और बाकी देश और दुनिया से संपर्क के लिए अंग्रेजी को पर्याप्त मानता है, जिसकी प्रथम भाषा यह उच्च शिक्षा और काम की प्रथम भाषा अंग्रेजी हो गई। 

अंग्रेजी के व्रत से बाहर रहने और जीने वाले भारतीय यदि निम्न मध्यम वर्ग से जुड़ने के लिए उसको समझने के लिए उसके साथ सघन व्यवस्था व्यवहार के लिए उसे किसी दूसरी भारतीय भाषा की जरूरत महसूस नहीं होती ऐसे लोगों के लिए संपर्क भाषा के रूप में भी हिन्दी अब उपयोगी नहीं रही है। कई दशकों से बहुत तेजी से बढ़ रही और अब लगभग अनिवार्य हो चली अंग्रेजी माध्यम शिक्षा ने इस वर्ग की संख्या में जबरदस्त वृद्धि की है। डर ये है कि जैसे-जैसे लगभग सारा देश ही अंग्रेजी माध्यम शिक्षा की ओर बढ़ रहा है उसे अपना रहा है ये मानसिकता उतनी ही व्यापक होती जाएगी और जनसामान्य की राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में भी हिंदी का दायरा सिकुड़ता जाएगा. भले ही अभी यह परिघटना साफ-साफ दिख नहीं रही हो।

हिंदी के विरोधियों को अंग्रेजी का उपनिवेश वादी वर्चस्व क्यों नहीं दिखता।

यही वो अभिजन, प्रभुवर्ग है जो मीडिया में, राजनीतिक मंचों पर और सोशल मीडिया पर ‘स्टॉप हिन्दी इंपोजिशन’ अभियान चलाता है, बहुत आक्रामकता के साथ हिन्दी और हिंदी भाषी प्रदेशों पर अशिक्षित, गरीब और पिछड़े होने के आरोप लगाकर उन्हें ख़ारिज करता है। यह मुखर वर्ग हिन्दी और उत्तर के हिंदी वालों पर, भाजपा पर, वर्तमान केंद्र सरकार पर उनकी अपनी भाषाओं को दबाने का आरोप लगाता है। हिन्दी को उपनिवेशवादी भाषा कहता है। एक हास्यास्पद विडंबना यह है कि इस वर्ग को हिंदी का काल्पनिक उपनिवेशवाद तो दिखता है लेकिन पिछले 100 वर्ष से चलते और बढ़ते जा रहे अंग्रेजी के उपनिवेशवादी वर्चस्व से कोई समस्या नहीं होती। 

ऐसे कई महापुरुष तो अपनी तमिल- कन्नड़- तेलुगू से अंग्रेजी की नजदीकी ज्यादा देखते हैं। हिंदी उन्हें ज्यादा कठिन और पराई लगती है। भाषिक और बौद्धिक औपनिवेशिकता का यह स्पष्ट लक्षण है कि उसे अपने अपरिचित और दूर तथा वर्चस्वशाली पराए अपने ज्यादा परिचित और करीबी लगते हैं।

हिंदी दिवस पर जिनके पेट में मरोड़ उठते हैं वे केवल हिंदीतर प्रदेशों के इस अंग्रेजी-अंग्रेजियत भरे उच्चवर्गीय दिमागों तक ही नहीं है हिंदी प्रदेशों में भी एक वर्ग है जो इन उत्सवों से चिढ़ता है, भले ही उतना खुलकर व्यक्त न करता हो। हिंदी की 50 से ऊपर की सह-भाषाओं के बोलने वालों का एक वर्ग हिंदी पर ऐसी ही एक उपनिवेशवादी भाषा होने और उनकी भाषाओं के विकास को अवरूद्ध करने का आरोप लगाता है। इनमें सबसे प्रमुख है भोजपुरी, राजस्थानी तथा छत्तीसगढ़ी बोलने वालों का एक मुखर, महत्वाकांक्षी वर्ग। यह वर्ग कई दशकों से अपनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के प्रयासों में लगा है।

भाषा एक बहुत भावनात्मक और संवेदनशील मुद्दा है।

चुनावों के समय इन्हें ऐसे राजनेता और सांसद मिल जाते हैं जो इन आकांक्षाओं को संसद और विधानसभाओं में स्वर देते हैं। हर बार केंद्र सरकार के कुछ मंत्री, मुख्यतः गृहमंत्री, संसद में आश्वासन देते हैं कि इन भाषाओं के दावे पर सरकार सहानुभूतिपूर्वक विचार कर रही है, उनकी उपेक्षा नहीं की जाएगी। दो तीन बार तो तत्कालीन गृह मंत्रियों ने सदन में इन भाषाओं को अनुसूची में शामिल करने का ठोस आश्वासन भी दिया है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि तमाम आश्वासनों के बावजूद इन्हें सूची में शामिल करने के लिए किसी भी सरकार ने कोई गंभीर कदम नहीं उठाए हैं।

कारण स्पष्ट है, और उचित है। आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की इन भाषाओं की अपनी आंतरिक योग्यताओं और पात्रताओं को छोड़ भी दें तो भी एक ही बात इस कारण को स्पष्ट कर देती है। देश के लगभग हर हिस्से से 38-40 भाषाओं को अनुसूची में शामिल किए जाने के मांग पत्र गृहमंत्रालय की फ़ाइलों में दर्ज हैं।

भाषा एक बहुत भावनात्मक और संवेदनशील मुद्दा है। यह एक सार्वभौमिक तथ्य है। एक बहुत गहरे स्तर पर भाषा एक व्यक्ति या वर्ग की पहचान, आत्म-बोध तथा संस्कृति से जुड़ी होती है। सारी सरकारें ये समझती आई हैं कि इतने सारे दावों में से कुछ को मान लेना और कुछ को छोड़ देना एक बर्र के छत्ते में हाथ डालने जैसा काम होगा। इससे विभिन्न भाषाओं में आपस में ही संघर्ष शुरू हो जाएंगे। देश की एकता और अखंडता को चुनौती देने वाली शक्तियां और समस्याएं देश के विभिन्न हिस्सों में पहले ही सक्रिय हैं। उनमें अगर भाषाओं की आपसी लड़ाईयां भी शामिल हो गईं तो समाज में इतने तनाव और पारस्परिक विरोधी आंदोलन शुरू हो जाएंगे कि संभालना कठिन होगा। 60 के दशक में देश भाषाई विद्वेष को हिंसक आंदोलनों में बदलते कई बार देख चुका है। कई बार भाषाएं पहचान की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में अलगाववाद को भड़काने का भी माध्यम बनाई जा चुकी हैं। तमिल अलगाववाद इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है। इन बातों को देखते हुए फिलहाल ऐसी कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखती कि देशहित की इच्छुक कोई भी सरकार कुछ नई भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करके नए भाषाई तनावों और आंदोलनों को हवा देगी।

राज्य सरकारें हिंदी को शिक्षा से भी बाहर कर रही हैं।

लगभग हर बड़ी बात की तरह भारतीय भाषाओं का सवाल भी विडंबनाओं, विरोधाभासों और जटिलताओं से भरा हुआ है। एक ओर प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद से शिक्षा मंत्रालय तथा अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद इंजीनियरिंग के उच्च शिक्षा संस्थानों- आईआईटी, एनआईटी तथा निजी संस्थानों में भारतीय भाषाओं में इंजीनियरिंग की शिक्षा शुरू करने की तैयारियों में गंभीरता से लगे हैं। दूसरी ओर राज्य सरकारें प्राथमिक ही नहीं माध्यमिक और उच्च शिक्षा में भी अपनी अपनी प्रादेशिक भाषाओं को हटाकर अंग्रेजी को अनिवार्य माध्यम भाषा बनाने की ओर बढ़ रही हैं। जगन रेड्डी की आंध्र प्रदेश सरकार ने नीचे से ऊपर तक समूची शिक्षा में अंग्रेजी माध्यम को अनिवार्य बना दिया है. तेलुगू वहां अब केवल एक विषय के रूप में पढ़ाई जाएगी। यह कदम तेलुगू भाषा के दूरगामी भविष्य के लिए मृत्युदंड सिद्ध होगा।  लेकिन अंग्रेजी के मोह में अंधी हुई सरकार और नागरिको-अभिभावकों किसी को भी न तो यह दिखता है और न तेलुगू के लुप्त होने से होने वाली सांस्कृतिक-सामाजिक अपूरणीय क्षति की कोई चिन्ता और समझ उनमें दिखाई देती है।

लेकिन आंध्रप्रदेश पहला जरूर है अंतिम नहीं रहेगा। लगभग सभी राज्य सरकारे इसी दिशा में बढ़ रही हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि के शिक्षा विभाग अपने यहां सैकड़ों की संख्या में आदर्श मॉडल स्कूल बनाने की घोषणा कर चुके हैं। ये मॉडल सरकारी स्कूल सभी आधुनिक संसाधनों, सुविधाओं और तकनीक से संपन्न होंगे। इनमें शिक्षा का माध्यम केवल अंग्रेजी होगी। जिन प्रदेशों में अच्छी हिंदी सिखाने वाले शिक्षकों का ही जबरदस्त अभाव है वहां इतनी बड़ी संख्या में अच्छी अंग्रेजी सिखाने में सक्षम शिक्षक कहां से आयेंगे? इस व्यावहारिक समस्या को छोड़ भी दें तो यह बात समझ से परे है कि ये सरकारें अपने ही भाषा माध्यम विद्यालयों और शिक्षकों को स्वयं घटिया और अनुत्कृष्ट सिद्ध करने पर तुली हैं। जब हर जिले में एक मॉडल विद्यालय होगा तब कौन अभिभावक अपने बच्चों को उन पुराने सुविधा-संसाधनहीन, जीर्ण सरकारी स्कूलों में भेजना चाहेगा जहां प्रदेश भाषा माध्यम भाषा है? अब तक भारत में शैक्षिक असमानता सरकारी और निजी शिक्षा की थी, आर्थिक थी, अब सरकारी शिक्षा व्यवस्था के भीतर ही भाषा-आधारित असमानता को स्थापित किया जा रहा है।

अंग्रेज़ी की दासता से कब मुक्त होगा देश।

इन सरकारों के शिक्षा विभागों में बैठे अधिकारी-शिक्षाविद इस सार्वभौमिक, सर्व-स्वीकृत तथ्य से अनभिज्ञ नहीं हो सकते कि बच्चों के आरंभिक संवेगात्मक-ज्ञानात्मक विकास के लिए मातृभाषा ही सर्वश्रेष्ठ माध्यम है। एक बच्चे को अपने घर की भाषा के माहौल से एक घोर पराई, अपरिचित भाषा के माहौल में भेजना उसके मानसिक विकास के साथ घोर हिंसा करता है, उसे कुंठित करता है। वे यह भी समझते होंगे कि अपनी मातृभाषा माध्यम में पढ़ा हुआ बच्चा दूसरी भाषाओं और विषयों को बेहतर ग्रहण करता है, उसका अधिकतम बेहतर होता है। लेकिन सब जगह अंग्रेजी शिक्षा की विराट मांग के दबाव के चलते और शिक्षा मंत्रियों, विधायकों, सासंदों और नेताओं की शैक्षिक समझ के उथलेपन के कारण अंग्रेजी माध्यम शिक्षा की यह महामारी बढ़ते-बढ़ते असाध्य होती जा रही है।

हिंदी या राजभाषा दिवस को अगर भारतीय भाषा दिवस बना दिया जाए तो केवल हिंदी वालों का ही नहीं सभी 22 प्रमुख भाषाओं की वर्तमान स्थिति, चुनौतियों और आसन्न साझे संकट पर पूरे देश का ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। आठवीं अनुसूची से बाहर की सैकड़ों भाषाओं को भी इस राष्ट्रीय विमर्श और चिंता में शामिल किया जा सकता है। अंग्रेज़ी की उपयोगिता-आवश्यकता को बनाए रखते हुए भारतीय भाषाओं की वृहत्तर भूमिका को लोगों के दिलों-दिमागों में पुनर्प्रतिष्ठित किया जा सकता है। भारतीय देशज प्रतिभा की मौलिक सृजनशीलता को अंग्रेज़ी की दासता से मुक्त करके सच्चे भारतीय पुनर्जागरण को संभव बनाया जा सकता है।

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