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विकास या विनाश ? आमीः एक यायावर

बचपन से यायावरी करना सीख लिया था, चालीस साल पहले पिता के साथ कपास से भरी बैलगाड़ी में बैठकर संदलपुर से हरदा मंडी में जाता था। संदलपुर से हरदा की दूरी थी 10 मील (30 किलोमीटर)। उन दिनों हरदा क्षेत्र में भी कपास पैदा होता था, लगभग आधा दर्जन किसान बैलगाड़ियों से भुनसारे निकलते थे, नेमावर। नर्मदा नदी पर  तब नया-नया पुल बना ही था।

कोलीपुरा के पास इमलाही (सड़क पर दर्जनों इमली के पेड़) के पास एकमात्र पुरानी बावड़ी थी, इमली के नीचे बैल गाड़ी छोड़ कर सुस्ताते थे, इमलियों के दर्जन भर पेड़ बचपन से देखता आ रहा हूँ, चार दशकों से जब भी गुजरता हूँ तो यादें हरी हो जाती हैं।

इन्हीं इमलियों के नीचे दोपेरा (दोपहर का भोजन) करते थे। माँ नातने (कपड़े) में रोटियाँ बाँध कर दे देती थीं, उन दिनों टिफिन आम घरों में कहाँ होते थे, नातने में बँधी रोटियाँ, नींबू का अचार, लहसून, मिर्च की चटनी और कांदे के साथ दोपेरा करना। चार दशक के बाद आज भी वो स्वाद मुँह पर आ ही जाता है।

जब ये सिंगल रोड था, तब भी ये इमलियाँ बची रहीं, पंद्रह सालों पहले रोड को दुहरा बनाया गया। तब भी इमलियाँ बची रहीं, अब यहीं रोड फोर लेन में तब्दील हो रहा है, इंदौर नागपुर राजमार्ग (हाईवे) में तब्दील हो रहा है।

यह मार्ग पिछ्ले चार सौ वर्षों से बहुत महत्वपूर्ण रहा है। मराठा शासकों की उत्तर भारत में आवाजाही और मुगल शासकों के लिए बुरहानपुर होते हुए दक्षिण में प्रवेश का रास्ता यहीं से गुजरता था। नर्मदा के दक्षिणी घाट हंडिया में महीनों तक मुगल सेना पड़ाव डाले रहती थी। नर्मदा में बहाव कम होने पर पार उतरते थे, उस समय की कई इमारतें आज भी मौजूद हैं। हंडिया में ऋद्धनाथ मंदिर, तेली सराय, होशंगशाह का जीर्ण-शीर्ण किला, नर्मदा नदी के बीचोंबीच स्थित जोगा का किला और अकबर के नौ रत्नों में से एक मुल्ला-दा-प्याज़ा की कब्र के साथ ही सैकड़ों कब्र हंडिया में आज भी मौजूद हैं।हंडिया के पास ही हाईवे से लगे एक खेत में मांडू की प्रसिद्ध इमली का एकमात्र पेड़ हैं जो लगभग तीन सौ सालों से पुराना होगा। संदलपुर से हरदा तक लगभग 40 पेड़ इमली के हैं, ये पेड़ लगभग सौ से डेढ़ सौ सालों पुराने होंगे।

तब हरदा से इंदौर मंडी में बैल गाड़ियों से माल ढुलाई की जाती थी। मराठा जागीरदारों के लिए तब व्यापार के लिए एकमात्र यही रास्ता इंदौर जाने के लिए था।

हरदा क्षेत्र के हजारों लोगों के मन में इन इमलियों से जुड़ी मीठी यादें जेहन में हैं। हजारों लोगों ने इन इमलियों को चखा होगा। यहाँ दोपहर में सुस्ताते रहे होंगे, इन घने पेड़ों की छाँव में इसी इलाके के मारवाड़ियों ने भी खट्टी इमलियाँ चख-चख कर अपनी अकूत संपदा को बनाया है (जाट, खाती, विश्नोई, माहेश्वरी) ये सभी राजस्थान से चार सौ पाँच सौ सालों में यहाँ आकर बसे हैं। 

मेरी विचलन कुछ दिनों से बढ़ गयी हैं, फोरलेन के लिए मुआवजा वितरित होने लगा है और अब कभी भी कुछ ही दिनों में ये इन हजारों पेड़ों को काट दिया जाएगा, जिनमें नीम, कबीट, आम, इमली और बहेड़ा आदि हजारों पेड़ हैं।

ये महज पेड़ नहीं है, हमारे सैकड़ों सालों के बनते बिखरते इतिहास के साक्ष्य हैं। आजकल मैं रोजाना ही संदलपुर से हरदा आना-जाना कर रहा हूँ लेकिन इन इमलियों के पास से गुजरते हुए मन व्यथित होने लगता है। मैंने महीने भर पहले संदलपुर से हरदा तक के 28 किलो मीटर के इमलियों के पेड़ों की गिनती कर डाली। छोटे मोटे कुल 36 पेड़ इमलियों के हैं। बाकी सैकडों पेड़ अन्य हैं।

कुछ ही दिनों के बाद ये सभी पेड़ राजमार्ग की बलि चढ़ जाएँगें, हजारों पक्षियों को अपना सैकड़ों सालों पुराना आशियाना बदलना पड़ेगा। 

फैबेसी कुल का यह पौधा जैवविविधता की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इमली हमारे रक्त संचरण को बेहतर बनाने एवं लौह तत्व की कमी पूरा करने में सहायक होती है, जिससे हमारे शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण तेजी से होता है।

सैकड़ों सालों से इस इलाके के हजारों लोगों के खून का संचरण सुचारू करने वाले इन पेड़ों के लिए अभी तक कोई स्थानीय बाशिंदा आगे नहीं आया है।

भारत में राजमार्गों के किनारे लगे पेड़ों को व्यवस्थित व पुनर्स्थापित करने के लिए विदेश में उपयोग में लाई जा रही तकनीकों को अनिवार्य रूप से उपयोग में लाया जाना चाहिए ताकि हमारी अनमोल धरोहरों को बचाया जा सके!

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