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बद्री नारायण धाम – आचार्य रवि शंकर पाण्डेय

वैसे तो भगवान के अनंत अवतार हैं, श्रीमद् भागवत में विष्णु भगवान के 24 अवतारों का वर्णन है। विष्णु भगवान अपने सभी अवतारों को काल की मर्यादा में बाँधे हुए से दिखते हैं, किंतु नर-नारायण के अवतार में स्वयं को कालाबाधित रखते हैं।      

नर-नारायण भगवान के अवतार की समाप्ति नहीं हुई है। नर-नारायण भगवान आज भी हिमालय में प्रत्यक्ष विराजमान है। रामायण में कथा है कि भगवान राम अपनी लीला का संवरण करके स्वभाव पधारे हैं। अयोध्या में सरयू नदी के तट पर एक घाट है, उसका नाम गुप्त घाट है। अयोध्या के संत महात्मा ऐसा वर्णन करते हैं कि श्री सीताराम के अंतिम दर्शन यहीं हुए थे। यहाँ से श्री सीताराम जी स्वधाम पधारे, अंतर्धान हुए, गुप्त हुए। इससे इस घाट का नाम गुप्त घाट रखा गया है। 

श्री कृष्ण भगवान के स्वधाम पधारने का वर्णन व्यासजी ने स्वयं लिखा है, परंतु भरतखंड के स्वामी नर-नारायण आज भी हिमालय में कलाप नामक गाँव में तप कर रहे हैं। श्री शंकराचार्य स्वामी कलाप गाँव में नर-नारायण के दर्शन के लिए पधारे। वहाँ अत्यंत ठंड है, मनुष्य और साधारण देव ऐसी ठंड को सह पाने में असमर्थ हैं । महान योगी ही ऐसी ठंड सह सकते हैं। श्री शंकराचार्य स्वामी ने प्रभु से कहा यहाँ तक मनुष्यों का आगमन संभव नहीं है, कलयुग का मनुष्य यहाँ तक आ ही नहीं सकता। कलयुग में लोगों को आप के दर्शन कैसे होंगे

प्रभु ने श्री शंकराचार्य स्वामी से कहा सूर्यवंश में विशाल नाम के एक परम भक्त नरेश हुए हैं। उन्होंने बद्रीनारायण धाम में तपस्या करके मुझे प्रसन्न किया है, मेरे दर्शन किए हैं। मैंने जब उनसे वर माँगने को कहा तो राजा बोले महाराज! आपके दर्शन लाभ के बाद कुछ शेष बचा ही नहीं है, जिसे मैं माँगूँ। फिर मैंने आज्ञा दी तुम्हारी कोई इच्छा नहीं है पर मेरी इच्छा है कि वर माँगो! तब विशाल राजा बोले- आप इस तपोभूमि में अखंड रूप से विराजिए और यहाँ आए हुए अपने भक्तों को शीघ्र दर्शन दीजिए । मैं विशाल राजा को दिए गए वचन के अनुसार वहाँ नित्य निवास करता हूँ और आपको आज्ञा देता हूँ कि आप नारद कुंड में स्नान कीजिए। स्नान करते हुए आपको मेरा स्वरूप प्राप्त होगा ।आप उस स्वरूप की स्थापना कीजिए। आपके द्वारा स्थापित किए स्वरूप का दर्शन जो करेंगे उन्हें मेरे दर्शन का फल प्राप्त होगा।

      हम लोग जिन बद्री नारायण के दर्शन करते हैं, वह शंकराचार्य के द्वारा स्थापित स्वरूप है। श्री शंकराचार्य स्वामी ने ताम्रपत्र में आज्ञा की है कि बद्रीनारायण की पूजा करने के लिए हमारे गाँव का ब्राह्मण आना चाहिए। दूसरे किसी ब्राम्हण को नारायण की पूजा करने का अधिकार नहीं दिया गया है। इससे उत्तर भारत में बद्री नारायण की पूजा करने के लिए दक्षिण भारत से शंकराचार्य की जन्म भूमि से ब्राह्मण आता है। जिसने 3 वेद पढ़े हों, त्रिकाल संध्या ठीक से करता हो, वही बद्री नारायण की पूजा कर सकता है ।

राजा विशाल की तपोभूमि होने के कारण बद्रीनारायण धाम को विशालपुरी के नाम से भी जाना जाता है। बद्रीनारायण की यात्रा जिन वैष्णवों ने की है, उनको ज्ञात ही है कि जब ठाकुर जी की जय बोली जाती है, तब बद्री विशाल लाल की जय ऐसा भी बोला जाता है। विशाल राजा ने यह वर हम सब के कल्याण के लिए माँगा था । जिनका मन विशाल है, उसका हृदय भी विशाल होता है। ऐसे विशाल हृदय वाले संत दूसरों के कल्याण के लिए शरीर धारण करते हैं । दूसरों के कल्याण के समान कोई धर्म नहीं है। दूसरों को कष्ट पहुँचाने के समान कोई अधर्म नहीं है।

गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस में लिखते हैं, 

परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।

(श्रीरामचरितमानस ७.४१.१)

महर्षि वेदव्यास ने भी अठारह पुराणों में इन्हीं दोनों वचनों को कहा है।

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनम् द्वयं। परोपकाराय पुण्याय् पापाय  परपीड़नम।।

बद्री नारायण भगवान का स्वरूप दिव्य है। वे पद्मासन लगाकर बैठे हैं। बद्रीनारायण में आए हुए श्रद्धालु नारद कुंड के गर्म जल में स्नान करते हैं। पर ठाकुर जी के लिए ठंडे जल का ही प्रयोग किया जाता है। बद्रीनारायण में भगवान निरंतर तप करते हैं, ध्यान करते हैं। इससे उनके अंगों में गर्मी बढ़ जाती है। इस कारण ठंडे जल से ही भगवान का अभिषेक होता है। इसके बाद गले तक सर्वांग चंदन अर्पण किया जाता है ।

सभी स्थानों पर लक्ष्मी जी और नारायण जी साथ-साथ विराजते हैं पर बद्रीनारायण धाम में लक्ष्मी जी मंदिर के बाहर बैठी है। भगवान ने लक्ष्मीजी को आज्ञा दी है कि  आप मंदिर के बाहर बैठिए ! मेरे साथ मत बैठिए। मुझे जगत के समक्ष तप मार्ग का आदर्श दिखाना है, मंदिर के भीतर अकेले ही नारायण हैं। धन का संग, संतान का संग, स्त्री का संग, नास्तिकों का संग भक्तिमार्ग में विघ्न उपस्थित करते है।

नारद भक्तिसूत्र में श्रीनारदजी लिखते हैं.

स्त्रीधन नास्तिक चरित्रम न श्रवणीयम्।

(अध्याय ४ सूत्र संख्या ६३)

माया का संग बड़े-बडे़  तपस्वियों को भी मलिन कर देता है।

गोस्वामी तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानस में लिखते हैं-

संग ते जती कुमंत्र ते  राजा। मान ते ज्ञान पान  ते लाजा।।

(रामचरितमानस ३.२१.१०)

बद्रीनारायण धाम में पहले नारायण की सेवा की जाती है, फिर बाद में बाहर बैठी हुई श्री लक्ष्मी जी का पूजन होता है।

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