मेरी कलम से

परिणति – डॉ अनिता अग्रवाल

फूलों की माला से
फूलों की चादर तक का सफर
कितना हसीन, दिलकश और
कितना करीब हुआ करता था
सात फेरे, सात वचन और फिर
सात जन्मों का
वायदा
देखे, अनदेखे
हर पल का
संग
भरोसा
विश्वास
कहाँ गया सब कुछ
हमारा हृदय
उसके अंदर की भावनाएँ
संस्कार
और परम्परा
और अब
सब कुछ
बस पा लेने तक सीमित
“देना”
सिर्फ एक बैंक का नाम है

-डॉ अनिता अग्रवाल
सदस्य जज, स्थाई लोक अदालत
एवं साहित्यकार (गोरखपुर)

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