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जय जवान, जय किसान – By Balam Mohla

एक फिल्म बनाने में बहुत लोगों का हाथ होता है जैसे निर्माता, निर्देशक, लेखक, गीतकार और संगीतकार आदि। हमारी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे बहुत से निर्माता-निर्देशक हुए हैं जिन्होंने दूसरों के सहयोग से कड़ी मेहनत करके फिल्में बनाई लेकिन जो जीनियस होता है उनको सिर्फ एक प्रसंग, एक प्रेरणा मिल जाए तो वह अपने दम पर ही फिल्म तैयार कर लेता है बिना किसी पूर्व पटकथा और चरित्र के और फिल्म भी ऐसी कि हर दर्शक उससे जुड़ाव अनुभव करने लगता है।

ऐसे ही एक महान निर्माता-निर्देशक लेखक गीतकार हैं मनोज कुमार जी, जिन्हें हम भारत के नाम से भी पहचानते हैं। उन्होंने देश भक्ति से ओत-प्रोत बहुत सी फिल्में बनाई हैं, जो कि काफी लोकप्रिय भी रही हैं और उन फिल्मों की लोकप्रियता में आज भी कमी नहीं आई है। देशभक्ति की फिल्मों में लगातार काम करने के कारण उन्हें यह नाम मिला भारत।

मनोज कुमार जी के व्यक्तित्व का एक ऐसा ही अनसुना किस्सा है जो इस प्रकार से है-

यह बात उस समय की है जब भारत के प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी थे। उस समय मनोज कुमार जी ने एक फिल्म बनाई थी शहीद और उसका प्रीमियर दिल्ली में भी रखा गया था। उसमें शास्त्री जी को भी निमंत्रण दिया गया था। शास्त्री जी ने शहीद फिल्म देखी और बहुत खुश हुए। फिल्म देखने के बाद जब शास्त्री जी मनोज कुमार से मिले, तब उनकी आँखों में आँसू थे। उन्होंने मनोज कुमार से कहा कि कल सुबह आप मेरे घर नाश्ते पर आइए। तब प्रधानमंत्री जी का निवास तीन मूर्ति भवन में हुआ करता था। 

अगली सुबह मनोज जी प्रधानमंत्री जी के आवास पर नाश्ते के लिए पहुँच गए। शास्त्री जी ने कहा मनोज, तुमने इतनी अच्छी फिल्म बनाई कि मैं पूरी रात तुम्हारी फिल्म के बारे में ही सोचता रहा। फिल्म देखकर देशभक्ति की एक ऐसी लहर सी उठती है और हम सोचने लगते हैं कि हम भगत सिंह के समय में क्यों नहीं हुए, काश कि उस समय में भी हम भी हुए होते। मेरा सोचना है कि इस फिल्म को देखने के बाद हर भारतीय में भी यही भावना आएगी। 

“शास्त्री जी ने मनोज कुमार से कहा क्या आप मेरी एक प्रार्थना सुन सकते हैं?” 

“अरे आप ये क्या कह रहे हैं? आप तो बस आदेश कीजिए” मनोज जी बोले। 

तब शास्त्री जी ने कहा कि “मैंने देश की जनता को एक नारा दिया है जय जवान जय किसान। क्या मुमकिन है कि इसके ऊपर कोई फिल्म बने, वह भी व्यावसायिक।“ 

मनोज जी ने कहा क्यों नहीं श्रीमान जी! अवश्य बन सकती है। मैं ज़रा चाय पी लूँ फिर मैं आपको बताता हूँ। 

चाय पीते-पीते ही मनोज जी ने कहा ठीक है श्रीमान जी मेरी अगली फिल्म उपकार की होगी और उसके एक गाने के कुछ अंश में आपको सुनाना चाहता हूँ, जो इस प्रकार हैं-

रंग हरा हरीसिंह नलवे से, रंग लाल है लाल बहादुर से

रंग बना बसंती भगत सिंह, रंग अमन का वीर जवाहर से

मेरे देश की धरती, सोना उगले, उगले हीरे मोती

मेरे देश की धरती….

शास्त्री जी यह सुनकर बहुत खुश हुए और बोले, तुम तो कमाल हो मनोज और जीनियस भी।

मनोज जी बोले जी नहीं श्रीमान जी यह सब आप लोगों का आशीर्वाद है।

मनोज जी की एक कमजोरी थी कि वह हवाई जहाज से यात्रा करना पसंद नहीं करते थे, जहाँ तक संभव हो उससे बचने की कोशिश करते थे। भारत में तो कहीं भी जाना हो तो रेल से यात्रा करना ही पसंद करते थे। उस जमाने में दिल्ली से बंबई डीलक्स नाम की एक रेल चलती थी। मनोज जी ने दिल्ली से प्रथम श्रेणी की एक पूरी बोगी बुक करा ली। उस जमाने में दिल्ली से मुंबई तक पहुँचने में लगभग 30 से 32 घंटे लगते थे। उन्होंने बहुत सारे कागज और पेन लिए और अपनी श्रीमती शशि जी से कहा कि उन्हें बेवजह परेशान नहीं करना। बस जो भी मैं माँगू खाने बगैरह के लिए वह देती रहना।

  उस 30 घंटे की यात्रा में उन्होंने अकेले ही पूरी कहानी लिख दी। मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर उतरे तो उनके हाथ में उपकार की एक स्क्रिप्ट थी। उसके बाद उन्होंने शास्त्री जी को फोन करके बताया कि श्रीमान जी उपकार की पूरी कहानी लिख ली है और जल्द ही मैं फिल्म बनाने जा रहा हूँ। आज भी उपकार एक महान फिल्म कहलाती है जिसके हर गाने में कुछ न कुछ सीख अवश्य है। तो इस तरह के जो जीनियस फिल्म निर्माता होते हैं उनको जरूरी नहीं है कि पुरानी पटकथा या खरीदी हुई कहानी ही मिले, एक फिल्म बनाने के लिए।  वह अपने आप ही किसी भी एक प्रसंग या शीर्षक पर पूरी फिल्म लिखकर उसे मूर्त भी कर देते हैं।

तो ऐसे ही हैं हमारे महान प्रसिद्ध फिल्म निर्माता, निर्देशक, लेखक, गीतकार मनोज कुमार साहब।

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