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राष्ट्रपति/ प्रधानमंत्री ने प्रोटोकॉल तोड़ा…By Balam Mohla

 

 

हमारी हिंदी फिल्मों में एक से बढ़कर एक महान कलाकार हुए, इनमें से ही एक वे राजकपूर जी ।

राज कपूर की प्रतिभा ने चाहे वह पर्दे पर हो या असल जिंदगी में देश में हो या विदेश में हर जगह अपनी एक अलग ही पहचान बनाई थी, खासकर रूमी दर्शकों को अपनी और आकर्षित किया था। किसी भी कलाकार के लिए लोगों से जुड़ पाना तभी संभव होता है जब वह अपने काम के प्रति ईमानदार हो।

By Balam Mohra

वैसे तो राज कपूर ने लोगों को किस तरह से अपनी और आकर्षित किया। इसके बहुत सारे सुने, अनसुने किस्से सुनने को मिल जाएंगे, मैं यहाँ एक घटना का जिक्र कर बताना चाहता हूँ कि कैसे वे हम सबके राज कपूर साहब?

सन् 1955 राज कपूर जी की एक फिल्म आई थी श्री 420 इस फिल्म का एक गाना ‘मेरा जूता है जापानी, पतलून इंगलिस्तानी सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी इस फिल्म और इस गाने ने पूरे विश्व में धूम मचा दी थी खास तौर पर रूस में।

उस समय रूस के राष्ट्रपति थे निकिता खुव सन् 1956 में भारत के प्रधानमंत्री नेहरू जी रूस जाने वाले थे, उनके पास रूस के राष्ट्रपति का संदेश आया कि जब वो रूस आएँ तो अपनी टीम में खासतौर से राज कपूर और नरगिस जी को साथ लेकर आएँ जब प्रधानमंत्री रूस पहुंचे उनके साथ कई मंत्री, अधिकारी, उद्योगपति और अन्य लोगों के साथ राज कपूर और नरगिस जी भी साथ में थे पंडित नेहरू और उनके मंत्री मंच पर बैठे हुए थे ठीक उनके सामने मने राष्ट्रपति, उनकी पत्नी, परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बैठे हुए थे। उनके पीछे भारत और रूस के अधिकारी थे फिर उद्योगपतियों के पीछे सातवीं कतार में राज कपूर और नरगिस जी बैठे थे। जब नेहरू जी ने बोलना शुरू किया, तभी रूस के राष्ट्रपति और बाकी के अन्य लोग पीछे मुड़कर राजकपूर राज कपूर बोलने लगे। राज कपूर भी अपनी लाल टोपी सर से उठा उठा कर उनका अभिवादन करने लगे तो नेहरू जी को बड़ा अजीब लगा और गर्व भी हुआ।

नेहरू जी अंग्रेजी में भाषण दे रहे थे, उसे बीच में रोककर हिंदी में बोले राज और नरगिस में अपने सहायक को तुम्हारे पास भेज रहा हूँ, तुम इनके साथ आकर मंच पर मेरे पीछे बैठ जाओ ताकि मुझे कम से कम यह भ्रम तो हो जाए कि ये सब लोग मुझे भी देख रहे हैं।

इतना प्रभाव था राजकपूर, नरगिस और हमारी फिल्मों का जिसके लिए पंडित नेहरू और रूस के राष्ट्रपति ने प्रोटोकॉल तक तोड़ दिया। जबकि यह माना जाता है कि रूस में प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन किया जाता है, जो पहले कभी भी नहीं तोड़ा गया में समझता हूं कि भारत और रूस की जो दोस्ती रही उसमें बहुत बड़ा हाथ राज कपूर साहब और उनकी फिल्मों का भी था।

नेहरू जी जब भारत वापस आए और संसद में यह कहा कि मैंने अपनी आंखों से देखा है, महसूस किया है कि फिल्मों का क्या प्रभाव होता है ना कि जनता के ऊपर बल्कि बड़े-बड़े नेताओं पर भी। इसके लिए मैं यह अनुशंसा करता हूं कि फिल्मोद्योग के लिए सांस्कृतिक कोटे में से दो राज्य सभा सदस्य हर 6 साल के लिए निश्चित किए जाएं।

तो ऐसे थे हमारे हम सबके राज कपूर साहब।

दूसरी घटना …..

राष्ट्रपति भवन में दादा साहब फाल्के पुरस्कार घोषित किए जा रहे थे। तब एस. वेंकटरामन भारत के राष्ट्रपति थे। उस कार्यक्रम में राज कपूर भी शामिल हुए। राज साहब को अस्थमा था, वह अपनी पत्नी एवं परिवार के अन्य सदस्यों के साथ राष्ट्रपति भवन गए और जैसे ही उनके नाम की घोषणा हुई पूरा राष्ट्रपति भवन करतल ध्वनि से गूंज उठा। राष्ट्रपति जी भी यही उम्मीद कर रहे थे कि जब राज कपूर पुरस्कार लेने आएँगे तो उनसे कुछ बात करूँगा, हाथ मिला लूँगा। लेकिन जैसे ही राज कपूर उठे, अचानक लड़खड़ाकर नीचे गिर पड़े क्योंकि उन्हें अस्थमा के कारण चक्कर आ गया था। राष्ट्रपति जी ने इधर उधर न देखते हुए प्रोटोकॉल तोड़कर अपने सहयोगियों के साथ सीधे राज कपूर के पास जाकर ही उन्हें पुरस्कार दे दिया और प्रेस वालों से कह कर फोटो भी खिचवाई।

 

 

 

 

 

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