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गुमनाम नायक – शहीद अमरचंदजी बांठिया(जैन)

   

By…..SANJEEV JAIN

देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई एवं अन्य क्रांतिकारियों की आर्थिक मदद करने वाले महान धार्मिक प्रवृत्ति के “शहीद अमरचंद बांठिया” ने मातृभूमि को आजाद कराने के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। इतिहास में उनका नाम अमीर शहीदों में शामिल है।

     अमरचंद बांठिया का जन्म 1793 ईस्वी में बीकानेर में हुआ था। उनके पूर्वज सेठ श्री अमीरचंद बांठिया व्यापार के लिए ग्वालियर आए और यहां के सराफा बाजार में बस कर व्यापार करने लगे। व्यवसाय में अमरचंद बाठिया भी अपने पिता के साथ सहयोग करने लगे। शीघ्र ही व्यापार में उन्नति होने लगी।अमर चंद की दिनचर्या सामान्य थी। सुबह मंदिर में तो रात साधु संतों और मुनियों की सेवा में बीतती थी। अमर चंद जैन धर्म से थे,वह अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले धर्म निष्ठ, कर्तव्य प्रयायण, ईमानदार और दूसरे के लिए समर्पण भाव रखने वाले व्यक्ति थे। उनके चतुर कौशल और गुणों की चर्चा ग्वालियर में फैलने लगी। ग्वालियर  के राजा ने जब उनके बारे में सुना तो उन्हें रियासत के गंगाजली कोष का अध्यक्ष बना दिया। गंगाजली कोष  गोरखी महल के तलघरों में कड़ी सुरक्षा में रहता था।

  अंग्रेजों के अत्याचारों की खबरें सुन सुनकर अमरचंद का हृदय कराह उठता था परंतु जैन धर्म के संस्कारों के कारण मन मसोसकर रह जाते थे। लेकिन अंग्रेजों के प्रति उनके मन में नफरत का भाव था, वह भी मातृभूमि के लिए कुछ करना चाहते थे।

   जब देश में पहला स्वतंत्रता संग्राम छिड़ा तो युद्ध करते समय सेनाओं के पास रसद की कमी हो गई थी। इन सेनाओं में झांसी के साथ शिवपुरी व नरवर के स्वतंत्रता सेनानी शामिल थे। जब सेनानियों ने अमरचंद जी से गुहार लगाई कि उन्हें धन की जरूरत है तब अमरचंद जी ने अपनी निजी संपत्ति में से सेनानियों को राशि देकर उनकी भरपूर मदद की।

उस समय ग्वालियर में अंग्रेजों की ओर से ब्रिगेडियर नेपियर यहां पदस्थ था। वह अमरचंद की प्रसिद्धि से जलता था। उसने कुचक्र चलकर बड़ी चालाकी से दस्तावेजों में यह झूठ दर्ज दर्ज करवा दिया कि झांसी की रानी व अन्य सेनानियों को आर्थिक मदद अमरचंद ने की, वह राजकोष के खजाने से की थी।जबकि अमरचंद ऐसे नायक थे जिन्होंने राज परिवार को धोखा दिए बिना अपनी ओर से स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की थी। उस समय ग्वालियर में कोई अधिकृत शासक नहीं था। ग्वालियर रियासत का दीवान दिनकर राव राजबाड़े नाबालिग जयाजीराव सिंधिया को लेकर ग्वालियर छोड़कर चला गया था। रानी लक्ष्मीबाई की शहादत के 4 दिन बाद २२ जून १८५८ को ब्रिगेडियर मयर ने उन्हें राजद्रोही ठहरा कर सराफा बाजार में नीम के पेड़ पर लटका कर फांसी पर चढ़ा दिया। 

कहा जाता है कि अमरचंद को फांसी देते हुए प्रथम बार रस्सी टूट गई थी, दूसरी बार पेड़ की शाखा, तीसरी बार  नीम के पेड़ पर उन्हें फांसी दी गई। उनके शव को ३ दिन तक उसी पेड़ पर लटकने दिया ताकि जनता के बीच दहशत पैदा की जा सके

इतिहास तो यह भी बताता है कि अमरचंद को फांसी पर लटकाने के काफी समय बाद उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी। यह अन्याय पूर्ण कार्य लॉर्ड डफरिन ने पड़ाव स्थित सराय में कई साल बाद किया था।

    सराफा बाजार में व्यापार स्थापित करने और दूसरों की मदद करने के कारण लोग उन्हें ग्वालियर सेठ कहकर बुलाते थे। अमर चंद जी को राजस्थान का मंगल पांडे की भी संज्ञा दी गई थी।

     अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले अमर चंद जी के साथ अंग्रेजों का क्रूर, असभ्य बहिशियाना पन था, जिसे इतिहास शायद ही माफ कर सकें।

     हमारे लिए यह भी शर्म की बात है कि जिस नीम के पेड़ पर लटका कर उन्हें फांसी दी गई थी उस पेड़ को भी आसपास रहने वालों ने क्षति पहुंचाई। उसके बाद उसी स्थान पर शहीद स्मारक बनाया गया उस पर भी आज अतिक्रमण कर लिया गया जबकि देश भर से श्रद्धालु उनकी प्रतिमा पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने आते है।

    देश प्रेम और दूसरे के लिए समर्पित होकर अपना योगदान देने वाले शहीद भामाशाह अमर चंद बांठिया जी (जैन) को कैफे सोशल शत् शत् नमन करता है और आपसे निवेदन करता है कि भारत माता के इन वीरों के द्वारा किए गए कार्यों को पढ़ें, समझें और उनके वारे में जाने।

             ।।शत् शत् नमन।।

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