सांस्कृतिक आत्मसमर्पण
क्या अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं को लील जाएगी?

मेरी ये चिंताएँ केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक कड़वा धरातलीय सत्य हैं। जिन बिंदुओं को मैंने इस लेख में रेखांकित किया गया है, वे भारतीय समाज के ‘सांस्कृतिक आत्मसमर्पण’ की ओर संकेत कर रहे हैं। जिस गति से महानगरों में परिवारों ने मातृभाषा को ‘पिछड़ेपन’ की निशानी मानकर त्याग दिया है, वह स्थिति वास्तव में भयावह है। अब छोटे नगरों में भी परिवार अपनी मातृभाषाओं से छुटकारा पाना चाहते हैं, विशेष रूप से हिन्दीभाषी शहरों के लोग।
यदि हम इसी ढर्रे पर चलते रहे, तो आने वाले 2-3 दशकों में भारतीय भाषाओं की स्थिति निम्नलिखित रूप में बदल सकती है:
1. भाषाओं का ‘संग्रहालयी’ अस्तित्व
जैसे आज संस्कृत के प्रति हमारा सम्मान तो बहुत है, परंतु उसे दैनिक उपयोग में कोई नहीं लाता, वैसी ही स्थिति हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की हो सकती है। ये भाषाएँ केवल ‘रस्मों और रीति-रिवाजों’ तक सीमित रह जाएँगी। घर की दहलीज के भीतर ये ‘रसोई की भाषा’ बनकर रह जाएँगी, लेकिन पारिवारिक उपयोग, बौद्धिक विमर्श, विज्ञान, विधि-न्याय और व्यापार से इनका पूर्ण निष्कासन हो जाएगा।

2. ‘भाषाई दासता’ और पीढ़ियों का अंतर
यह पूर्णतः सही है कि ‘जेन-जी’ और उसके बाद की पीढ़ियाँ भारतीय भाषाओं के व्याकरण और शब्दों से पूरी तरह अपरिचित हैं। अब स्कूलों में अंग्रेजी व विदेशी भाषाओं की शिक्षा पर बहुत जोर दिया जाता है, पर भारतीय भाषा विषय की पढ़ाई केवल एक बोझ बन गई है।
लड़खड़ाती हिन्दी: आज का युवा ‘मैं’ और ‘मैंने’ या ‘है’ और ‘हैं’ के बीच का अंतर नहीं जानता।
सीमित शब्दावली: उनकी शब्दावली में केवल 200-300 शब्द बचे हैं, जो केवल बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। आज देश का हर शिक्षित व्यक्ति वाक्य तो हिन्दी का बोलता है, पर उसके सभी शब्द अंग्रेजी के होते हैं। यह क्षरण तेजी से हो रहा है क्योंकि अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग आधुनिक व शिक्षित होने की निशानी बन गया है।

3. आर्थिक और प्रशासनिक चोट
जब तक अर्थव्यवस्था और करियर (नौकरी) की भाषा अंग्रेजी रहेगी, तब तक माता-पिता अपने बच्चों को मातृभाषा की ओर नहीं मोड़ेंगे।
निजी क्षेत्र: निजी कंपनियों में हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग ‘अकुशल’ होने का पर्याय मान लिया गया है, इसलिए प्रतिभावान व्यक्ति भी नौकरी के लिए तब तक स्वीकार नहीं किया जाता है, जब तक उसकी अंग्रेजी अच्छी न हो। निजी क्षेत्र में तो भर्ती की पूरी प्रक्रिया अंग्रेजी में चलती है, अंग्रेजी न जानने वाला व्यक्ति चपरासी भी नहीं बन सकता है।
न्यायपालिका और बैंकिंग: यहाँ अंग्रेजी का एकाधिकार होने के कारण आम नागरिक अपनी ही भाषा में अपना अधिकार माँगने से डरता है। न्यायपालिका तो अपने प्रांगण में भारतीय भाषाओं के बोलने मात्र से ही क्रोधित हो उठती है।
सरकारी क्षेत्र: भारत सरकार व इसके अधीनस्थ कार्यालयों में भी नौकरी की पहली व अनिवार्य शर्त अंग्रेजी ज्ञान है, हिन्दी केवल नाम के लिए राजभाषा है। चौकीदार की नौकरी पाने के लिए भी अभ्यर्थी को अंग्रेजी ज्ञान की परीक्षा देनी पड़ती है। राजभाषा के रूप में हिन्दी की स्थिति कितनी दयनीय है, वह किसी से छुपी नहीं है, जानते सब हैं, पर चिंता किसी को नहीं है।
वैसे भी केंद्र सरकार का सारा कामकाज तो आज भी अंग्रेजी में ही किया जाता है और तमिलनाडु से निकलकर हिन्दी का विरोध अब कर्नाटक, केरल, आंध्र, तेलंगाना, पंजाब, पश्चिम बंगाल और ओडिशा तक अपनी विजय पताका फहरा रहा है। हिन्दी का नाम सुनकर ही तलवारें खींचने वाले लोग अंग्रेजी के नाम पर एक छाते के नीचे आ जाते हैं, अतः आगामी 10-12 वर्षों में अंग्रेजी को आधिकारिक रूप से राजभाषा बनाने का प्रस्ताव संसद में पारित हो जाए, तो बड़ी बात नहीं है।
4. मनोरंजन जगत का भटकाव
हिन्दी सिनेमा का नाम न केवल हॉलीवुड की नकल करते हुए ‘बॉलीवुड’ किया गया है, बल्कि उसकी आत्मा भी विदेशी हो चुकी है। जब फिल्मों के संवाद लेखक और निर्देशक स्वयं अंग्रेजी में सोचते हैं, तो वे दर्शकों को जो परोसते हैं, वह केवल ‘रोमन में लिखी हिंग्लिश’ होती है। इसमें न तो भाषाई गहराई होती है और न ही सांस्कृतिक गौरव।
हिन्दी फिल्म में आज भी फिल्म का नाम ही पर्दे पर सबसे पहले अंग्रेजी में बड़े अक्षरों में उभरता है, फिर वही नाम बाद में देवनागरी में छोटे अक्षरों में दिखाना पड़ता है, क्योंकि निर्माता-निर्देशक तो देवनागरी में कुछ लिखना ही नहीं चाहते हैं। हिन्दी सिनेमा के सितारे तो हिन्दी बोलने में अपने आप को अपमानित अनुभव करते हैं।

क्या वास्तव में सब समाप्त हो जाएगा?
हालाँकि अंधकार घना है, लेकिन दो बिंदु ऐसे हैं जो इस ‘विलुप्ति’ को रोक सकते हैं या उसे धीमा कर सकते हैं:
1. डिजिटल लोकतंत्रीकरण
छोटे शहरों और गाँवों के जो युवा इंटरनेट पर आ रहे हैं, वे अपनी बात अपनी भाषा में कह रहे हैं, पर वहाँ भी अंग्रेजी शब्दावली तेजी से घुसपैठ कर चुकी है। यूट्यूब, इंस्टाग्राम और पॉडकास्ट के माध्यम से क्षेत्रीय बोलियों का एक नया उभार दिख रहा है, जो ‘अंग्रेजीदां’ वर्ग को चुनौती दे रहा है।
2. तकनीकी विवशता
अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वास्तविक समय में अनुवाद के कारण अंग्रेजी की वह ‘अनिवार्यता’ समाप्त हो सकती है, जो पिछले 100 वर्षों से बनी हुई थी। यदि मशीन आपकी मातृभाषा को तुरंत वैश्विक भाषा में बदल सकती है, तो शायद भविष्य में भाषा ‘करियर’ की बाधा नहीं रहेगी।
निष्कर्ष
यह बात सही है कि अगली 1-2 पीढ़ियाँ यदि पूरी तरह अंग्रेजी माध्यम से निकलीं, तो वे अपनी जड़ों से कट जाएँगी। भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है, वह संस्कृति की वाहक है। जिस दिन भाषा मरती है, उस दिन उस समाज का इतिहास, दर्शन और संस्कार भी मर जाते हैं।
यदि आज भी हम (समाज और सरकार) शिक्षा और रोजगार को अनिवार्य रूप से भारतीय भाषाओं से नहीं जोड़ते, तो भविष्य में ये भाषाएँ केवल ‘बोलियाँ’ बनकर रह जाएँगी, एक जीवंत सभ्यता की पहचान नहीं।

(एम. कॉम, एफसीएस, एलएलबी)




