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स्वर्गलोक में आमरण अनशन

स्वर्गलोक में आमरण अनशन

प्रो. राजेश कुमार

धर्मराज ने बाहर शोरगुल सुना, तो बड़े अचंभे में आ गए, क्योंकि मृत्यु लोक में इस तरह का शोरगुल कभी होता नहीं था। उन्होंने सेवक को बुलाकर कहा कि पता करें कि माजरा क्या है। सेवक ने बाहर जाकर पता किया और फिर धर्मराज को आकर बताया कि बाहर बहुत सारी आत्माएँ धरने पर बैठी हुई हैं। उन्होंने अपने पीछे बैनर लगा रखा है – धर्मराज के अन्याय के ख़िलाफ़ आमरण अनशन।

“यह क्या बात हुई?” धर्मराज ने भृकुटियाँ चढ़ाते हुए कहा, “हमने ऐसा क्या अन्याय कर दिया कि लोगों को आमरण अनशन पर बैठना पड़ रहा है! और अचंभे की बात तो यह है कि यहाँ स्वर्गलोक में लोग मरने के बाद आते हैं, यहाँ आमरण अनशन करके ये आखिर कहाँ जाना चाहते हैं? यह तो वैसी ही बात हो गई जैसे किसी कवि ने कहा है – मर के भी चैन न पाया तो कहाँ जाएँगे?”

नियम है कि सेवक को स्वामी के चुटकुले, मज़ेदार बातों आदि पर हँसना चाहिए भले ही उनमें कोई मज़ा न हो0, इसलिए वह सेवक भी खी-खी करके हँसने लगा। उसकी इस स्वामिभक्ति से धर्मराज प्रसन्न हुए। फिर उन्होंने पूछा, “लेकिन ये लोग अनशन पर बैठे क्यों है?”

“इनका कहना है कि इन्हें ग़लत तरीके से स्वर्गलोक में ले आया गया है, जबकि अभी उनकी मृत्यु नहीं हुई है।” सेवक ने बताया।

“ऐसा भला कैसे हो सकता है? और उन्हें यह बात पता कैसे चली?” धर्मराज के चेहरे पर चिंता की रेखाएँ छा गईं।

“जी मुझे तो इस बारे में कोई जानकारी नहीं पता चली?” सेवक ने विनम्रतापूर्वक सिर झुकाते हुए बताया।

“हाँ, वह ठीक है।” धर्मराज ने बात को समझते हुए कहा, “जाओ और चित्रगुप्त को भेजो।”

चित्रगुप्त हाजिर हुए तो धर्मराज ने उनसे भी वही सवाल पूछे, जो वे सेवक के सामने कह चुके थे।

“स्वामि, मुझे भी इस बात का पता चला था और तब से मैं हिसाब-किताब लगाने में लगा हुआ हूँ।” चित्रगुप्त ने बताया, “हमारा हिसाब-किताब बिल्कुल सही है। जितने लोगों की मृत्यु हुई है, उतने ही लोगों की आत्माएँ हमारे यहाँ पहुँची हैं।”

प्रमाण के रूप में चित्रगुप्त ने वर्चुअल स्प्रैडशीट धर्मराज के सामने खोलकर हिसाब-किताब दिखा दिया, जो बिल्कुल सही थी और उसने किसी तरह की ग़लती या रेड सेल नहीं थे।

“मुझे तुम्हारे काम पर पूरा भरोसा है,” काम में कोई ग़लती नहीं दिखी, तो धर्मराज ने चित्रगुप्त की तारीफ़ की, और पूछा, “तो फिर यह माजरा क्या है? और यह किस क्षेत्र की आत्माएँ हैं?”

“जी ये आत्माएँ आपकी प्रिय देवभूमि भारतवर्ष की हैं।” चित्रगुप्त उलाहना जैसा देते हुए कहा, “हमारा हिसाब-किताब बिल्कुल सही है, और इस बारे में कोई स्पष्टीकरण शायद यमराज दे सकते हैं, क्योंकि आत्माओं को लाने का काम उन्हीं का है।”

धर्मराज ने कलाई पर बने अपने वर्चुअल फ़ोन पर यमराज को अपने पास आने का आदेश दिया।

यमराज बहुत अस्त-व्यस्त और परेशानी की हालत में आए। धर्मराज ने प्रबंधन शास्त्र के इस नियम का पालन करते हुए कि अपने मातहतों का हाल-चाल लेते रहने से उनकी कार्य-क्षमता बढ़ती है, आत्मीय सरोकार के साथ पूछा, “क्या बात है यमराज, सब खैरियत तो है? घर में तो सब ठीक है ना।”

“जी वह सब तो ठीक है।” यमराज ने बताया, “बस में कोरोना के कारण काम बहुत बढ़ गया है, इसलिए काम का दबाव बढ़ जाने के कारण ठीक से नींद पूरी नहीं हो पाती, और इसी वज़ह से बेचैनी रहती है।”

“लेकिन कोरोना के बारे में तो हमें पहले से जानकारी थी, और इसलिए आपको पहले से इसकी तैयारी कर लेनी चाहिए थी।” धर्मराज ने स्पष्टीकरण जैसा माँगते हुए पूछा, “टेंपरेरी यमदूत वगैरह भर्ती कर लेने चाहिए थे, ताकि काम का बोझ ना पड़े। इसका तो बजट भी हम सैंक्शन कर चुके हैं।”

“वह सब तो हम कर चुके हैं,” यमराज ने अपनी कर्मठता को रेखांकित करते हुए बताया, “बस मामला यह है कि देवभूमि भारतवर्ष में हमारे अनुमान से अधिक मृत्यु हुई हैं।”

“और इसका कारण क्या है?” धर्मराज ने बात को समझते हुए पूछा, क्योंकि अनुमान से अधिक मृत्यु होना दुर्लभ बात थी।

“हमारे अनुमान के अनुसार कोरोना से जितनी मृत्यु होनी चाहिए थी, भारतवर्ष में उतनी मृत्यु तो ज़रूर हुईं, लेकिन इसके अलावा अपने सुशासन के कारण उन्होंने इस मृत्यु की संख्या में बहुत बड़ा इजाफ़ा किया।” यमराज ने थके हुए स्वर में बताया, “एक तो उन लोगों के पास पूरे अस्पताल नहीं थे, अस्पताल थे तो उनमें डॉक्टर नहीं थे, डॉक्टर थे तो वहाँ दवाइयाँ और बाकी उपकरण नहीं थे, उनके वेंटिलेटर काम नहीं करते थे, वे लोग अस्पताल की बेड ब्लैक में बेच रहे थे, दवाइयों की कालाबाज़ारी चालू हो गई थी, लोग खुद ही अपने घर पर इलाज करने में लगे हुए थे, अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी हो गई हालाँकि बाहर ब्लैक में बहुत आराम से मिल रही थी, अपने नेताओं की प्रेरणा से लोग गोमूत्र और गोबर से अपना इलाज कर रहे थे हालाँकि नेता खुद अस्पतालों में इलाज के लिए जा रहे थे, और एक महात्मा ने तो बिना किसी शोध और परीक्षण के लिए कोरोना की दवाई बना दी थी, उसके कारण भी इस संख्या में वृद्धि हुई।”

“अरे यह तो बहुत दुख की बात है। और यह वही देश है ना जो खुद को विश्व गुरु वगैरह कहता रहता है?” धर्मराज ने उपहास जैसा करते हुए कहा।

“जी हाँ, बिल्कुल वही है।” यमराज ने बताया, “इसके अलावा वहाँ डॉक्टरों को तनख्वाह नहीं दी जाती और डॉक्टर खुद कोरोना के कारण मर रहे हैं, बड़े-बड़े नेता चुनाव की रैलियाँ कर रहे हैं जिनमें पैसे देकर भारी भीड़ जमा की जाती है और वह जाते समय अपने साथ कोरोना मुफ़्त में ले जाती है, लोगों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाता इसलिए उन्हें आंदोलन करने पर मजबूर होना पड़ता और वे इस तरह कोरोना को बढ़ाते हैं, हर रोज़ वहाँ कोई-न-कोई त्यौहार चलता रहता है और उनमें भी भारी भीड़ जमा होती रहती है और कोरोना बाँटती है, इसके अलावा शादी-ब्याह, मृत्यु भोज जैसे अवसरों पर भी कोरोना का विस्तार इफ़रात से किया जाता है। वैक्सीन मिलती नहीं है या लोग वैक्सीन लगवाने से डरते हैं, तो भी कोरोना थम नहीं पाता।”

“अच्छा तो मरने वालों की संख्या में इन्हीं कारणों से बढ़ोतरी हुई है, जिनका हमने अनुमान लगाते हुए ध्यान नहीं रखा था।” धर्मराज ने बात को समझा, “वैसे कोई भी इन अभिनव विचारों के बारे में कैसे सोच सकता है कि लोग खुद ही मृत्यु को गले लगाने के लिए आगे बढ़ कर आएँगे! खैर, यह बताओ कि बाहर जो आमरण अनशन जैसा कुछ चल रहा है, उसका क्या मतलब है?”

“जी मैंने भी अपना हिसाब-किताब लगाया है।” यमराज ने शांतिपूर्वक जवाब दिया, “हमें चित्रगुप्त जी ने जितने लोगों को वहाँ से आत्माएँ वहाँ से लाने के लिए कहा है, हम वे सब लेकर आए हैं। इसके अलावा एक भी अतिरिक्त आत्मा नहीं है।”

“अगर हिसाब सारा ठीक है, तो ये आत्माएँ क्यों अनशन कर रही हैं?” यमराज ने कुछ क्रोधित होते हुए कहा, “या ये सिर्फ़ अनशन के लिए अनशन कर रहे हैं, जिसका कोई उद्देश्य नहीं है? या कोई हिंदू-मुसलमान का मसला तो नहीं है।”

“नहीं वह नहीं हो सकता, क्योंकि जैसा कि आप जानते हैं, यहाँ आने से पहले आत्माओं को अपने सब राग-द्वेष मृत्युलोक में ही छोड़कर आने पड़ते हैं। मैंने इसका पता लगाया है।” यमराज ने अपनी जानकारी साझा करते हुए कहा, “दरअसल एक यमदूत के भैंसे से चिपककर कोई अख़बार का पन्ना यहाँ आ गया, जिस पर किसी आत्मा की नज़र पड़ गई। उस अखबार में रिपोर्ट छपी हुई थी कि सरकार जो कोरोना से होने वाली मृत्यु की संख्या दे रही है, वह वास्तव में अस्पतालों, मुर्दाघरों, अख़बारों में छपने वाले श्रद्धांजलि विज्ञापनों आदि में मृत्यु की संख्या से बहुत कम है। यह पढ़ने के बाद ये लोग माँग कर रहे हैं कि जब सरकार यह कहती है कि ये लोग मरे ही नहीं हैं, तो इन्हें वापस धरती पर भेज दिया जाए।”

“तो सरकार अपनी संख्या की क्यों नहीं कर लेती?” धर्मराज ने समस्या का सीधा-सा हल बताया, “तब यह सारी परेशानी दूर हो जाएगी, और यह अनशन भी समाप्त हो जाएगा।”

“ऐसा नहीं हो सकता!” यमराज ने अपनी जानकारी को और आगे बढ़ाया, “दरअसल सरकार जानबूझकर संख्या कम दे रही है और सही संख्या को छिपा रही है, क्योंकि अगर वह पूरी संख्या देगी तो इससे उसकी काबिलियत पर शक होगा, लोग उसे कामकाज पर प्रश्न करने लगेंगे, पूरी दुनिया में देश की छवि ख़राब हो जाएगी, और उसे अगली बार चुनाव जीतने में परेशानी होगी।”

“यह क्या मतलब हुआ?” क्या किसी बात को छिपा देने से वह सच ख़त्म हो जाता है!” धर्मराज ने दार्शनिक भाव से कहा, “और तुम लोग कहते हो कि यह देश सत्यमेव जयते के सिद्धांत को मानता है!”

यमराज और चित्रगुप्त दोनों ही सिर झुकाए खड़े थे, क्योंकि उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। दरअसल उनके पास ही नहीं, किसी के पास भी इस बात का कोई जवाब नहीं था।

“तो अब क्या किया जाए?” धर्मराज ने प्रबंधन में सामूहिक फ़ैसले के सिद्धांत का अनुसरण करते हुए सबकी राय लेने की गरज से पूछा।

“इन्हें तो हम किसी भी सूरत में वापस नहीं कर सकते, क्योंकि ये लोग वास्तव में मर चुके हैं, इनके दाह संस्कार हो चुके हैं, इनके सगे-संबंधी इनका शोक मना चुके हैं। वापस भेज दिया, तो लोग इन्हें भूत-प्रेत मानकर इनसे डरते फिरेंगे।” चित्रगुप्त ने सरकारी नियम को उद्धृत करते हुए बताया।

“और तुम्हारी क्या राय है?” धर्मराज ने यमराज को भी फ़ैसले में शामिल करने की कोशिश की।

“जैसा आप कहें?” यमराज आदर्श कर्मचारी की भूमिका में थे, इसलिए उन्होंने कोई सुझाव नहीं दिया।

“तो ठीक है, इन अनशन करने वालों को कहो कि अगर तुम्हें अपने देश में जाने की इतनी ही बेचैनी है, तो हम ज़्यादा-से-ज़्यादा तुम लोगों को नरक में भेज सकते हैं, क्योंकि वहाँ भी तुम्हें अपने देश जैसा ही अनुभव होगा।” धर्मराज ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा।

“जी, ठीक है।” चित्रगुप्त और यमराज दोनों ने एक साथ कहा और जाने के लिए मुड़े।

“और सुनो!” धर्मराज ने यमराज की ओर देखते हुए कहा, “जाकर उसे उठा लाओ!”

यमराज को समझने में देर नहीं लगी कि इशारा किसकी तरफ़ है। उन्होंने सिर हिलाकर आदेश को शिरोधार्य किया, और कमरे से निकल गए।

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