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विश्व मानचित्र पर भारत का बढ़ता प्रभाव

“यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

                      [ भगवदगीता 3:21]

अर्थात श्रेष्ठ मनुष्य आचरण करते हैं दूसरे मनुष्य वैसा हीं आचरण करते हैं | वह जो कुछ प्रणाम कर देता हैं दूसरे मनुष्य उसी के अनुसार आचरण करते हैं |

श्रेष्ठता या प्रभाव एक क्षणिक मात्र में स्थापित होने वाली विषय वस्तु नहीं हैं|जहाँ तक भारत के विश्व पर प्रभाव का प्रश्न हैं तो यह उसकी हड़प्पा कालीन तत्कालीन अति उन्नत नगरीय संस्कृति से लेकर महान प्राचीन मंदिरो, समारको, आलीशान महलों, वृहद किलों और ताज महल तक | वैदिक ज्ञान एवं दर्शन से प्रारम्भ होकर मंगल गृह पर पहुँचने तक | महाभारत के धर्म युद्ध से लेकर आज की सैन्य और परमाणु महाशक्ति होने तक | भगवदगीता के दर्शन, गौतम बुद्ध, महावीर, संत कबीर, गोस्वामी तुलसीदास, आदिशंकराचार्य, गुरु नानक देव, और स्वामी वेवकानंद के महान विचारों से लेकर महात्मा गाँधी के विचारों की वेश्विक स्वीकार्यता तक|चन्द्रगुप्त मौर्य के अखंड भारत के एकीकरण से लेकर वर्तमान भारत सरकार तक, भारत कम से कम ज्ञात 7 से 8000 वर्षों से विश्व मानचित्र पटल एक उगते सूर्य के समान अपने प्रभाव को विस्तारित करता रहा हैं, परन्तु अपने प्रभाव का विस्तार कई महत्वपूर्ण चुनौतीयों से संघर्षशील रहा हैं |

यह विस्तार ऋग्वेद के दर्शन से प्रारम्भ होता हैं जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रहस्यमयी ज्ञान का समावेश हैं, यह ऐसा ज्ञान हैं जिसे वेदव्यास, वशिष्ठ, विश्वामित्र, अगस्त्य आदि महान ऋषियों ने अपनी अप्रतिम एकाग्र शक्तियों से प्रकृति एवं अंतरिक्ष से अर्जित किया एवं इसे आने वाली पीढ़ियों तक ऋचाओं के माध्यम से पहुँचाया जो आज के ज्ञान एवं विज्ञान का आधार हैं | जिस समय पृथ्वी के अन्य क्षेत्र के लोग पाषाणिक संस्कृति में जीवन यापन कर रहें थे उस समय भारत में वेदों, अरण्यकों, उपनिषदो, भगवदगीता आदि महान दार्शनिक ग्रंथो की रचना की जा चुकी थी | सामवेद संगीत का मूल आधार हैं | आयुर्वेद एवं उसके ज्ञान से समृद्ध सुषेण, चरक, सुश्रुत एवं जीवक जैसे महान वैद्यो ने चिकित्सा एवं शक्य चिकित्सा का उपयोग आज से हजारों वर्षों पूर्व करना प्रारम्भ कर दिया था |आश्रम शिक्षा पद्धति में गुरु शिष्य परम्परा के अंतर्गत हजारों वर्षों पूर्व वेदों, 64 कलाओ, गणित, ज्यामिति, त्रिकोणमिती, राजनीति, योग,दर्शन एवं नीति शास्त्र की शिक्षा प्रदान की जाती थी | रामायण महाभारत काल क्रमशः त्रेता युग और द्वापर युग में धर्म एवं अधर्म के मध्य संघर्ष को समाप्त करने के लिए अधर्म को पराजित करके धर्म की पुनः स्थापना करते हैं |

धर्म की भारतीय संकल्पना पश्चिमी संकल्पना से भिन्न हैं | पश्चिमी संकल्पना में धर्म ईश्वर में विश्वास, आस्था, एवं उससे सम्बंधित विचारों व्यवहारों और सम्प्रदायोँ की बात करती हैं, वहीं भारतीय संकल्पना प्रत्येक परिस्थिति में मानव द्वारा किये गए कर्मों की नैतिकता और विचारों की शुद्धता को जन्म देती हैं | मानव द्वारा विचारों की शुद्धता के साथ अपने नैतिक कर्मों का पालन हीं धर्म की भारतीय संकल्पना हैं | अर्थात कर्म हीं धर्म हैं जिसके आधार पर भारत में चार वर्णी सामाजिक ताने बाने का निर्माण हुआ जिसमें कर्म की प्रधानता थी, दुर्भाग्यवश उत्तर वैदिक काल में कर्म की प्रधानता का स्थान जन्म की प्रधानता ने ले लिया और समाज कई सारी कुरीतियों और अन्धविश्वासो से ग्रसित हो गया, इसी पृष्ठभूमि पर महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी एवं आदिशंकराचार्य ने सत्य, अहिंसा, समानता, मानवता एवं भक्ति के विचारों का प्रसार जनमानस में करके विश्व के प्रथम सामजिक-धर्मिक सुधार आंदोलन एवं पुनर्जागरण को जन्म दिया जो आज 14 वीं सदी के यूरोपीय पुनर्जागरण से लगभग 1800 वर्षों पूर्व हुआ |
धर्म के अंतर्गत राज धर्म ऐसा मौलिक धर्म हैं जो की किसी राष्ट्र की मूल प्रकृति का निर्माण करता हैं | उत्तर वैदिक काल के पश्चात् गंगा नदी के सहारे मगध साम्राज्य का उद्भव भारत के प्रथम राजनीतिक एकीकरण को बातलता हैं आगे चलकर चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा एक महान साम्राज्य की स्थापना की जो लगभग सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर फैला था | कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार मौर्य शासन में आज से लगभग 2300 वर्षों पूर्व जो प्रशासनिक ढांचा स्थापित किया वो तत्कालीन विश्व में अन्य कहीं नहीं था | सम्राट अशोक ने अपने धम्म एवं उस पर आधारित राज्यादेशो से जो कि अफगानिस्तान से लेकर सुदूर दक्षिण भारत शिलालेखों और अभिलेखों के रूप में हैं शासन में नैतिकता, समानता,धर्म एवं समस्त प्रजा को अपनी संतान मानने की संकल्पना को स्थापित किया जो कि आज प्रत्येक देश की शासन व्यवस्था की नींव हैं |
मौर्य काल से लेकर विजयनगर साम्राज्य तक भारत में निर्मित स्थापत्य जिसमें मन्दिर, स्तूप, अजन्ता की गुफाए एवं उनकी अद्वितीय चित्रकारी, एलोरा की गुफाए एवं उनकी मूर्तिकला, एलोरा का कैलाश मंदिर जो अपनी बनावट के लिए विश्व में अद्वितीय स्थान रखता क्यूंकि तत्कालीन तकनिकों एवं उपलब्ध साधनों से यह असम्भव सा प्रतीत होता हैं, महबलीपुरम के रथ मन्दिर, साँची का स्तूप, खजुराहो के मन्दिर, राजस्थान के राजपूती शान झलकाते वृहद किले एवं महल, भारत के शासन का प्रतिक अशोक चिन्ह जो सम्राट अशोक के सिंह सतम्भ से लिया गया हैं, लाल किला, ताज़ महल फतेहपुर सिकरी की इमारते आदि वेश्विक स्थापत्य के लिए अद्वितीय उदहारण प्रस्तुत करते हैं |

                भारत प्राचीन काल में अपनी प्रयद्वीपीय स्थिति एवं रेशम मार्ग का मुख्य भाग होने के कारण विदेश व्यापार में सबसे अग्रणी रहा | प्लिनी की लेटीन भाषा में लिखी प्राचीन पुस्तक “नेचुरल हिस्टोरिका ” एवं ग्रीक भाषा में लिखी अन्य पुस्तक “पेरिप्लस ऑफ़ एरिथरियन सी” के विवरणों के अनुसार प्राचीन रोम साम्राज्य का सारा स्वर्ण भारत से मसालो, सूती वस्त्रों, औषधियों, रत्नो, हस्तशिल्प एवं आभूषणो का आयात करने पर व्यय होता था, भारत में बना सूती वस्त्र सम्पूर्ण विश्व में अति बहुमूल्य एवं लोकप्रिय था | रोमन साम्राज्य में आम जनता को इसके मालिकाना हक़ पर रोक एवं भारी भरकम अर्थदंड का प्रावधान था | उस समय भारत विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक देश था, भारत के इसी व्यापार के साथ लाभ अर्जन के इरादे से यूरोपीय लोग भारत आये और भारत को आगे चलकर 200 वर्षों तक सम्राज्यवादी शोषण का शिकार होना पड़ा |

                  आधुनिक इतिहास लैंगिक समानता एवं शिक्षा की वकालत करता हैं, परन्तु भारत में ऋग्वेदिक काल से हीं स्त्रियां समाज की मुख्य धारा का भाग रहीं हैं केवल यही नहीं विश्वारा, लोपमुद्रा, घोषा, सिकता एवं अपाला जैसी स्त्री ऋषियों ने ऋग्वेद की रचना में योगदान दिया, स्त्रिया सभा – समिति में सक्रियता से भाग लेती थी जो कि शासन की कार्यकारिणी इकाईया थी | उन्हें देवी माना गया एवं उनकी पूजा शक्ति एवं मात्र देवी के रूप में की गयी, परन्तु यहाँ पर यह भी बातलना उचित होगा कि आने वाले समय में स्त्रियों की दशा दयनीय होती गई, इस दशा को भारत के स्वतंत्रता एवं राष्ट्रवादी आंदोलन के महान नेताओं द्वारा समाप्त करने के सफल प्रयास किये |

                  प्रकृति पूजा की बात की जाए तो यहां प्राचीन भारतीय प्रकृति संरक्षक व्यवहारों एवं परम्परा का वर्णन ना किया जाए ऐसा हो नहीं सकता क्यूंकि वेश्विक तापन (ग्लोबल वर्मिंग) की समस्या वर्तमान वेश्विक चिंतन विषयों में सबसे महत्वपूर्ण हैं और जिसका मूल कारण पश्चिमी देशों द्वारा 1760-1950 के मध्य औद्योगिक क्रांति के मध्याम से गहन प्रदुषण और ग्रीन हाउस गैसो का उत्सर्जन हैं | भारत में प्राचीन काल से हीं बरगद, पीपल, नीम आदि प्रणवायु दायक वृक्षों का रोपण एवं पूजन की परम्परा रहीं हैं इसके साथ हीं नदियों की पवित्रता एवं देवीय संकल्पना, प्राणी पूजा सर्प,सिंह,गाय, बैल एवं वनो की पवित्रता पूजा औषधियों का रोपण और संरक्षण, भारत की जनजातीय और ग्रामीण जीवनशैली पर्यावरण संरक्षण का मौलिक सन्देश विश्व को सदियों से देती आ रहीं हैं |
                     पर्यावरण के बचाव के साथ साथ भारत ने विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान ज्योतिष आदि के क्षेत्र में अर्जित ज्ञान को ग्रंथो में लिपिबद्ध करके विश्व को प्रदान किया | पाँचवी सदी में महान गणितज्ञ, और खगोलविद और भौतिक विज्ञानी आर्यभट्ट ने मात्र 23 वर्ष की आयु में ‘आर्यभट्टीय’ नामक गणित ग्रन्थ की रचना की, इन्होने हीं सर्व प्रथम सूर्यकेंद्रित सिद्धांत का प्रतिपादन किया कि सभी गृह सूर्य की परिक्रमा करते हैं ना कि पृथ्वी की, ‘पाई’ का मान ज्ञात किया, शुन्य की विस्तृत अवधारणा प्रस्तुत की | वरहमिहिर ने अपनी रचना ‘पंचसिद्धांतिका’ में यह बताया कि चन्द्रमा एवं अन्य ग्रहो का स्वयं का कोई प्रकाश नहीं होता वे सूर्य से प्रकाश प्राप्त करते हैं |ऋषि कणाद ने अणु सिद्धांत (एटॉमिक थ्योरी) की खोज जॉन डालटन से कई सदियों वर्ष पूर्व हीं कर ली थी | ब्राह्मगुप्त ने 6वीं सदी में गणित के सम्बन्ध में कई महत्वपूर्ण रचनाओं एवं सिद्धांतों को प्रस्तुत किया | भास्कराचार्य ने 12वीं सदी में ‘सिद्धांतिशिरोमणि’ में बीज गणित (अलज़ेबरा) अंक गणित और ग्रहों से सम्बंधित गणितीय सिद्धांतो की रचना की भारत का यह ज्ञान आगे चलकर यह अरबों ने सीखा एवं अरबों से ये यूरोप पहुंचा | श्रीनिवास रामानुजन एक ऐसे भारतीय गणितज्ञ थे जिन्होंने काफ़ी कम आयु में हीं गणित की जटिल समस्याओ को सुलझाया एवं नये सिद्धांतो की रचना की और सबसे बढ़के उन्होने अनंत (इंफिनिटी)श्रेणी के रहस्य को ज्ञात किया | भारत के कई महान आधुनिक वैज्ञानिको जैसे, सी वीं रमन (1930-भौतिकी -प्रकाश प्रकिर्णन ), डॉ हरगोविंद खुराना (1968-चिकित्सा-अनुवंशिकी एवं प्रोटीन निर्माण प्रकिया), सुब्रमण्यम चंद्रशेखर (1983-भौतिकी -ब्लैक होल से सम्बंधित गणितीय सीमा) को उनकी महान खोजो के लिए विश्वविख्यात नोबल पुरस्कारों से नावाजा गया | भारतीय वैज्ञानिक डॉ. स्तयेंद्रनाथ बोस ने बोसोन कणों की खोज करके ब्रह्माण्ड के रहस्यो को समझने के लिए एक नवीन दिशा प्रदान की |
भारत ने अपने बलबूते पर अंतरिक्ष, रक्षा, परमाणु, ऊर्जा, विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी कार्यक्रमो को ना केवल निर्मित किया वरन विश्व में नये कीर्तिमान भी स्थापित किये | इसरो, बार्क, C-DAC, ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV), भूस्थतिकीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV), स्वादेशी क्रायोजनिक इंजन का विकास, अग्नि मिसाइल, चंद्रयान I, मंगल यान, 104 उपग्रहो को एक साथ पृथ्वी की कक्षा में प्रक्षेपित करना, GSLV मार्क III, 30 मीटर टेलीस्कोप, गगनयान मिशन से भारत प्रथम बार मानव को अपने स्वादेशी तकनिकी समर्थन से अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी कर रहा हैं | भारत अब उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया हैं जिनके पास स्वयं की उपग्रह आधारित नोवाहन दिशा निर्देशन एवं संचार प्रणाली हैं (IRNSS)| को-वैक्सीन एवं कोविशील्ड जैसे स्वदेशी कोविड टीको के अविष्कार ने ना केवल कोविड-19 जैसी प्राण घातक बीमारी से लड़ने में सहायता की वरन भारत की वेश्विक प्रतिष्ठा को भी बढ़ाया हैं |C-DAC द्वारा ‘परम’ नामक प्रथम स्वदेशी सुपर कंप्यूटर का निर्माण किये जाने से लेकर वर्तमान के ‘परमसिद्धि-AI’, ‘प्रत्युश’ एवं ‘मिहिर’ नामक सुपर कंप्यूटर अब तक के सबसे तेज़ भारतीय सुपर कंप्यूटर हैं जिनमे से ‘परमसिद्धि-AI’ विश्व के टॉप 100 सुपर कंप्यूटर में शामिल हैं |

                  भारत की राजव्यवस्था की बात करें तो यह विश्व का सबसे बड़ा गणतान्त्रिक लोकतंत्र हैं जो कि विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान से संचालित होता हैं | इस संविधान में प्राचीन वैदिक सिद्धांतों, प्राचीन गणतंत्रो जैसे लिछवि राज्य, शाक्य, मल्ल राज्य आदि की व्यवस्था की मौलिकता जो आज से लगभग 2500 वर्षों पूर्व अस्तित्व में थे, अशोक का धम्म, बुद्ध की शिक्षाओं, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, गाँधी, लोहिया के आदर्शो एवं अन्य देशों के संविधानों के विशेष एवं उपयोगी प्रावधानों को भारतीय स्वरूप का मिश्रण हैं | इन सबके साथ भारत का संविधान इसके लोकतंत्र को 1950 के पश्चात् से लगातार मजबूती प्रदान कर रहा हैं एवं लोकतंत्र परिपक्वता की और अग्रसर कर रहा हैं | भारतीय संविधान के मौलिक ढांचे के अनुसार चुनी गई भारत की सरकारों ने भारत को विकास एवं प्रगति के पथ पर निरंतर आगे बढ़ाया हैं | आर्थिक नियोजन, राज्य आधारित औद्योगिक विकास, बैंको का राष्ट्रीयकारण, औद्योगो के साथ साथ क़ृषि का विकास, हरित क्रांति, दुग्ध क्रांति को अपनाकर भारत में साम्राज्यवादी शोषण से लगभग रुक चुकी आर्थिक प्रगति को तीव्र गति प्रदान की एवं 1992 के आर्थिक संकट के पश्चात निजीकरण,उदारीकारण, वेश्विकरण, बजारीकरण को अपनाकर भारतीय अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर वेश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया | वर्तमान में भारत का 600 बिलियन $ से ज्यादा का विदेशी मुद्रा भंडार इसकी आर्थिक प्रगति का साक्षी हैं |

                   भारतीय आर्थिक प्रगति के पीछे भारतीय कूटनीति का महत्वपूर्ण योगदान रहा हैं, जो स्वतंत्रता के तत्काल पश्चात पंचशील, और गुटनिरपेक्ष जैसे शान्ति एवं आदर्शवादी सिद्धांतों से प्रारम्भ होती हैं जिसको आधार बनाकर भारत ने विश्व के सभी देशों से आर्थिक एवं विकाशील सम्बंन्धो को स्थापित किया | इस दौरान 1948, 65 के युद्ध में पाकिस्तान को पराजित किया परन्तु आदर्शवादी कूटनीति पर अति विश्वास का नतीजा 1962 में चीन से पराजय का सामना करके भुगतना पड़ा | इसके पश्चात् भारत ने अपनी कूटनीति में यथार्थवादी तत्व को प्रमुखता देते हुए ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया 1971 के युद्ध में बांग्लादेश को स्वतंत्र करवाया एवं पोखरण-I के माध्यम से परमाणु शक्ति की अनिवार्यता को स्वीकार्य किया |आगे चलकर भारत ने आतंकवाद की समस्या को भी कठोरता से समाप्त करने के प्रयास प्रारम्भ किया | भारत ने कारगिल युद्ध विजय एवं पोखरण के सफल परिक्षण की सफलता से भारत ने विश्व की महाशक्ति बनने की और पहला कदम बढ़ाया | भारत ने अब वर्तमान में अपनी शांत एवं सहनशील देश की छवि को पुलवामा एवं उरी हमलो के बाद सर्जिकल स्ट्राइक्स के माध्यम से बदलने का सफल प्रयास किया हैं | आज भारत कई वेश्विक मंचों जैसे UNO, WTO, G20, ASIAN, WEF, ब्रिक्स, BIMSTEC आदि में अपनी नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन कर चूका हैं | आज भारत – अमेरिका सम्बन्ध, भारत – फ्रांस सम्बन्ध, भारत- जर्मनी सम्बन्ध, भारत – रूस सम्बन्ध एवं भारत- चीन सम्बन्ध आदि विश्व कूटनीतिक पटल पर नवीन गठजोड़, गर्मजोशी, और बदलती विश्व व्यवस्था की और संकेत करते हैं, वर्तमान में कोई भी महत्वपूर्ण राष्ट्र अपनी कूटनीतिक, आर्थिक एवं रणनीतिक नीतियों को भारत को नजरअंदाज करके नहीं बना सकता | आज भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के अपने लक्ष्य की और गंभीरता से प्रयासरत हैं | हाल हीं में भारत सरकार ने ना केवल अपने कोविड टीकाकरण को अपनी 100 करोड़ की जनता तक पहुंचाया बल्कि विश्व के अन्य जरूरतमंद देशों को भी टीको की आपूर्ति की हैं जो भारत की उदार नेतृत्व छवि को स्थापित करता हैं |

               उपरोक्त सम्पूर्ण विवेचना निश्चितौर पर भारत के बढ़ते वेश्विक प्रभाव को बतलाता हैं, किन्तु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बनने की और अग्रसर हैं जिसके पास प्रकृतिक एवं भौतिक संसाधनों की सिमित आपूर्ति हैं जो हाल हीं के कोयला संकट से देखी जा सकती हैं, इसके साथ हीं भारत की एक बहुत बड़ी आबादी के समक्ष ग़रीबी, अशिक्षा,स्वच्छ पेयजल की अनापूर्ति, कमजोर स्वास्थ्य सुविधाये, जलवायु परिवर्तन एवं कृषि पर इसका बढ़ता नकारात्मक प्रभाव, अनिश्चित मानसून, बदलता एशियाई रणनीतिक परिदृश्य जैसे अफगानिस्तान में तालिबान की वापिसी, चीन के साथ सीमा तनाव, पाकिस्तान की चीन एवं रूस से बढ़ती नजदीकी, अमेरिका में बदली सरकार, आतंकवाद की समस्या, बढ़ता आंतरिक साम्प्रदायिक संघर्ष, आंतरिक क्षेत्रीय संघर्ष भारत की विश्व आकांक्षाओं की राह में सबसे बड़ी बाधाए हैं,अतः भारत को सर्व समावेशी आर्थिक विकास, आत्मनिर्भर भारत अभियान की सफलता , वैकल्पिक ऊर्जा संसाधनों को विकसित करके, और अपनी कूटनीति को वर्तमान परिदृश्य से साम करते हुए स्थायी समधान आधारित तीव्र और व्यावहारिक प्रयास करने होंगे जो भारत को विश्व का नेतृत्व करने से पहले सम्पूर्ण एशिया का नेतृत्व करने का सशक्त आधार प्रदान करेंगे |

रचनाकार :- राहुल वर्मा

9015457601,8826825696

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