हिंदी प्रतियोगिता

बहती नदिया

हाँ मैं बहती नदिया हूँ
लहरें करती मेरा श्रंगार
सागर में मिलने से पहले
करनी है बाधायें पार

चली हिमालय से जब मैं
थी निर्मल कोमल जल तरंग
विदा हुई बाबुल के घरसे
ले संस्कारों के सब रंग
हर पग सँभल सँभलकर रखती
जग दूषित करने तैयार
हाँ मैं बहती नदिया हूँ
लहरें करती मेरा श्रंगार

हिलोर भरें भावों की लहरें
अपना लेती मिले राह जो
ऊँचाई से गिरने पर भी
सह जाती निकले आह जो
निर्झर झरना बन बहती हूँ
देती हूँ जीवन उपहार
हाँ मैं बहती नदिया हूँ
लहरें करती मेरा श्रंगार

ठहर जाऊँ दो पल जहाँ भी
बन जाते है कितने घाट
मटकी भरभरकर ले जायें
हूँ हरियाली का ठाटबाट
बदले में बस इतना चाहूँ
न करे कोई हद को पार
हाँ मैं बहती नदिया हूँ
लहरें करती मेरा श्रंगार

राह जो रोके पर्वत कोई
कैसे किनारा करना है
समय सिखाता गया समय पर
कैसे आगे बढना है
फेंक गंदगी मेरे अंदर
चाहा मुझसे ही उद्धार
हाँ मैं बहती नदिया हूँ
लहरें करती मेरा श्रंगार

बाँधना चाहे हर कोई पर
लगती न लहरों में गाँठ
हूँ मैं उन्मुक्त सदियों से ही
पढती आई बस प्रेम पाठ
देना ही सीखा है हरदम
न चाहूँ मानो उपकार
हाँ मैं बहती नदिया हूँ
लहरें करती मेरा श्रंगार

अन्तर्मन का ही शोर है
लहरें आपस में लड़ जायें
मीठे से कलकल के स्वर में
छुपी हैं कितनी ही वेदनायें
आँसू मेरे मीठे लगते
छिपा लिया मन में ही खार
हाँ मैं बहती नदिया हूँ
लहरें करती मेरा श्रंगार

चाह यही बदले में तुम दो
नारी शक्ति को सम्मान
माँ तनया भगिनी संगिनी
रखो हृदय से इनका मान
छुपा तुम्हारे पापकर्म सब
जीवनभर करती है प्यार
हाँ मैं बहती नदिया हूँ
लहरें करती मेरा श्रंगार

माला अज्ञात….

 

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