परमवीर चक्रशूरवीरो की गाथा

परमवीर चक्र विजेता – असीम साहस एवं अद्वितीय नेतृत्व क्षमता के धनी मेजर रामास्वामी परमेश्वरन

पूर्वपीठिका :

                    मातृभूमि पर मर मिटने वाले जाँबाजों में सिर्फ़ सरहद पर तैनात भारतीय सैनिक शामिल नहीं हैं, कई देशों में शांति स्थापित करने के लिए विभिन्न मिशन पर जाने वाले भारतीय शांतिरक्षक बल (इंडियन पीसकीपिंग फ़ोर्स – IPKF) के जवान भी हैं. श्रीलंकाई गृहयुद्ध के समय भारतीय शांतिरक्षक बल द्वारा चलाया गया ‘ऑपरेशन पवन’ ऐसा ही एक मिशन था, जिसमें मेजर रामास्वामी परमेश्वरन जैसे वीर सपूत मातृभूमि के लिए खून के आख़िरी कतरे तक लड़ते रहे. श्रीलंका का गृहयुद्ध इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जो भारत के साथ अटूट रूप से जुड़ा हुआ है. इस युद्ध में न सिर्फ हमने अपने सैनिकों की शहादत देखी बल्कि इसके लम्बे राजनीतिक परिणामों में पूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी की शहादत भी देखनी पड़ी. लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (LTTE) नामक तमिल उग्रवादी संगठन ने तमिलों पर हुए सिंहलियों के अत्याचार और तमिलों को उनका वाजिब हक़ दिलाने के उद्देश्य से जाफ़ना प्रांत को स्वतंत्र कराने के लिए 1983 में गृहयुद्ध छेड़ दिया. यह युद्ध 2009 तक चला जब तक कि लिट्टे (LTTE) का पूरी तरह सफाया नहीं हो गया. श्रीलंकाई सरकार ने तमिलों को निशाना बनाया. कई तमिल शरणार्थी के रूप में तमिलनाडु पहुँचे. इस स्थिति से निबटने के लिए भारत-श्रीलंका के मध्य 29 जुलाई 1987 को शांति समझौता हुआ. समझौते के अनुसार, भारतीय शांतिरक्षक बल को श्रीलंका में शांति स्थापित करने और शरणार्थियों के प्रवाह को रोकने हेतु भेजा जाना था.

मेजर रामास्वामी परमेश्वरन उर्फ़ ‘पैरी साहब’ का परिचय :

                  मेजर रामास्वामी का जन्म 13 सितंबर 1946 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के बंबई राज्य में हुआ था। उनके पिता का नाम के.एस.रामास्वामी और मां का नाम जानकी था। उन्होंने स्कूली पढ़ाई एसआईईएस (साउथ इंडियन एजुकेशन सोसायटी) हाई स्कूल, मुंबई से 1963 में की। उसके बाद उन्होंने 1968 में एसआईईएस कॉलेज से विज्ञान में ग्रैजुएशन किया। मेजर रामास्वामी पर 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ने वाले सैनिकों के साहस और बलिदान का बहुत प्रेरणादायी प्रभाव पड़ा. उन्होंने 1971 में ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकैडमी (ओटीए) जॉइन की जहाँ से वह 16 जून, 1972 को पास हुए। इसके बाद भारतीय थल सेना की सबसे विख्यात 15 महार रेजिमेंट में वह कमिशंड ऑफसर के तौर पर नियुक्त हुए। वहां उन्होंने आठ सालों तक अपनी सेवा दी. उनकी सेवा स्थाई करते हुए उन्हें रेगुलर कमीशन के अंतर्गत उनको 5 महार में ले लिया गया। 12 अक्टूबर 1979 को उन्हें कैप्टन के पद पर प्रोन्नति दी गयी। 1981 में वो शादी के बंधन में बंधे. उनकी पत्नी का नाम था उमा.  31 जुलाई 1984 को रामास्वामी मेजर के पद पर प्रोन्नत हुए।

                15 महार और 5 महार बटालियन में सेवा के दौरान मेजर परमेश्वरन ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में विभिन्न उग्रवाद निरोधी अभियानों में हिस्सा लिया। इन अभियानों ने मेजर परमेश्वरन को मजबूत संकल्प और नेतृत्व के लिए प्रसिद्धि दिलाई. मेजर परमेश्वरन के साथी जवान उनको प्यार से ‘पैरी साहब’ कहते थे। उनकी बहादुरी, साहस, नेतृत्व और दृढ़ निश्चय की चर्चा हर तरफ होने लगी थी. मेजर परमेश्वरन तमिल भाषा अच्छी प्रकार जानते थे. इन्हीं कारणों से, जब श्रीलंका में भारतीय थल सेना की ओर से  की शुरुआत हुई तो मेजर परमेश्वरन को 8 महार बटालियन में अपनी सेवा देने के लिए चुना गया। उल्लेखनीय है कि 8 महार ही पहली बटालियन थी जिसे 1987 में श्रीलंका भेजा गया था।

ऑपरेशन पवन : तमिल टाइगर्स के गढ़ में मेजर परमेश्वरन का अद्वितीय नेतृत्व 

                 भारत-श्रीलंका समझौते के तहत भारत की ओर से भेजे गए शांतिरक्षक बल के मेजर परमेश्वरन के नेतृत्व वाली बटालियन को 24 नवंबर, 1987 को को सूचना मिली कि जाफना के उडुविल शहर के करीब कांतारोडाई नाम के गांव में किसी घर में बड़ी मात्रा में हथियार और गोलाबारूद की खेप उतारी गयी है. सूचना मिलते ही कैप्टन डी. आर. शर्मा के साथ 20 सैनिकों का एक दल इस सूचना की सत्यता और उससे जुड़े तथ्य पता करने रवाना कर दिया गया। इस गश्ती दल पर, उस संदिग्ध घर के पास एक मन्दिर के परिसर से गोली बरसाई गई जिससे इस दल को भी गोलियां चलानी पड़ीं। उस समय भारत की बटालियन उडूविल में थी। वहाँ इस दल ने सूचना भेजी कि संदिग्ध मकान में उग्रवादियों का अड्डा है और वहाँ इनकी गिनती हमारे अनुमान से कहीं ज्यादा है। इस सूचना के आधार पर मेजर रामास्वामी तथा ‘सी’ कम्पनी के कमाण्डर ने यह तय किया कि इस स्थिति का मुकाबला नियोजित ढंग से किया जाना चाहिए। मेजर रामास्वामी का पूरा दल उस मकान के पास रात को डेढ़ बजे 25 नवम्बर 1987 को पहुँच गया। वहाँ कोई हलचल उन्हें नजर नहीं आई, सिवाय इसके कि एक ख़ाली ट्रक घर के पास खड़ा हुआ था। मेजर रामास्वामी के दल ने उस मकान की घेरा बन्दी कर ली और तय किया कि सवेरे रौशनी की पहली किरण के साथ ही वहाँ तलाशी अभियान शुरू कर दिया जाएगा।

               सुबह पाँच बजे तलाशी का काम शुरू हुआ लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं मिला। आखिर वे लोग वापस चल पड़े। तभी मन्दिर के बगीचे से गोलीबारी शुरू हो गई। इस दल ने भी जवाबी कार्रवाई की। दुश्मन की अचानक गोलीबारी से इस दल का एक जवान मारा गया था और एक घायल हो गया था। लिट्टे उग्रवादी एके-47, ग्रेनेड, गोलाबारूद और भारी मशीन गनों का इस्तेमाल कर रहे थे। उन्होंने उस इलाके में बारूदी सुरंग भी बिछा दी थी जिससे उस इलाके में सैनिकों का प्रवेश कर पाना लगभग असंभव था. एलटीटीई के उग्रवादी घात लगाकर हमले करने में माहिर थे। ऐसे में मेजर परमेश्वरन ने बेहद चतुराईपूर्वक एलटीटीई को उनकी ही चाल से मात देने की योजना बनाई। मेजर परमेश्वरन ने अपने 10 जवानों को लिया और चारों तरफ से हो रही भारी गोलीबारी के बीच निर्भय होकर मेजर परमेश्वरन पेट के बल नारियल की झाड़ी की ओर बढ़े जहां से उग्रवादी घात लगाकर गोलीबारी कर रहे थे. इस प्रकार अचानक मेजर परमेश्वरन ने उग्रवादियों को चारों तरफ से घेर लिया और उग्रवादियों के लिए यह बहुत चौंकाने वाली बात थी। लेकिन उसी वक्त नारियल के पेड़ पर बैठे एक स्नाइपर ने मशीन गन से हमला कर दिया और गोली मेजर परमेश्वरन की बायीं कलाई में लगी। उनका बायां हाथ पूरी तरह से बेकार हो गया। इस की परवाह न करते हुए मेजर परमेश्वरन ने अपने करीब खड़े उग्रवादी का हथियार झपटा और उसे मार गिराया लेकिन तभी उनके सीने पर दूसरी गोली आकर लगी. गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने आदेश देना जारी रखा और अंतिम सांस लेने तक अपना काम जारी रखा. 25 नवम्बर 1987 को माँ भारती का यह लाल श्रीलंका में शत्रुओं से दुर्धर्ष संघर्ष करते हुए शहीद हो गया.

                अकल्पनीय साहस और जिजीविषा से ओतप्रोत मेजर रामास्वामी परमेश्वरन के अद्वितीय नेतृत्व के कारण ही बेहद जानलेवा, विषम और विपरीत परिस्थितियों में भी भारतीय शांतिरक्षक बल ने पाँच उग्रवादी मार गिराए और कई खतरनाक हथियार और गोला-बारूद बरामद किए. मेजर रामास्वामी परमेश्वरन ने युद्धभूमि में विशिष्ट वीरता और प्रेरक नेतृत्व का परिचय दिया. उन्होंने मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया, जिसके लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. मेजर परमेश्वरन एकमात्र भारतीय शांतिरक्षक (IPKF) सैनिक थे जिन्हें यह सम्मान दिया गया। वह एकमात्र महार रेजिमेंट सैनिक भी थे जिन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. मेजर परमेश्वरन को श्रद्धांजलि देते हुए सेना कल्याण हाउसिंग बोर्ड ने आर्कोट रोड, चेन्नई में एक कॉलोनी का निर्माण किया और मेजर रामास्वामी परमेश्वरन के सम्मान में वर्ष 1998 में इसका नाम एडब्ल्यूएचओ परमेश्वरन विहार रखा। ‘परी साहब’ जैसे शहीदों के कारण ही आज भारत अपने पड़ोसियों और तमाम अन्य देशों की अपेक्षा शांति, सुरक्षा, स्थिरता और विकास की राह पर अग्रसर हो सका है. कृतज्ञ राष्ट्र ऐसे वीर सपूतों का बलिदान सदैव याद रखेगा. आने वाली पीढ़ियाँ इन बलिदानों को अपने हृदय में सँजोए राष्ट्रहित के कर्त्तव्य पथ पर आगे बढ़ती रहेंगी क्योंकि – “बलिवेदी पर विह्वल-जनता जीवन तौल उठी है / आज देश की मिट्टी बोल उठी है”.

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